प्रेरणाओं को ग्रहण करने का पावन पर्व

MOTIVATION| प्रेरणा : राम नवमी का पावन एवं मंगलकारी पर्व इस माह आ रहा है। भगवान राम का यह जन्मदिवस संपूर्ण वसुधा के लिए एक मंगलमय अवसर के रूप में है। भारतीय संस्कृति के आदर्शों को अपने जीवन में मूर्तिमान करने वाले, भारतीय धर्म के आकाश में सूर्य की तरह चमकने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जीवन से प्रेरणाओं को ग्रहण करने का पावन पर्व इसे कह सकते हैं।ध्यान से देखें तो वर्तमान समय में भी लगभग वैसी ही परिस्थितियाँ हैं, जिस तरह की परिस्थितियों में भगवान राम के अवतरण के कथानक को लिखा गया था।
जिन परिस्थितियों में भगवान राम ने अपने पुण्यचरित्र को जनमानस के सम्मुख प्रस्तुत किया था, वर्तमान समय भी कुछ-कुछ वैसा ही है।रावण सही पूछा जाए तो एक व्यक्ति से ज्यादा ऐसी विकृत मानसिकता का नाम है- जो छोटे उद्देश्यों, छोटे कार्यों, स्वार्थ, अहंकार, लोभ, लालच, हिंसा से परिभाषित होती है। गंभीरता से सोचें तो क्या ऐसा नहीं लगता कि आज की परिस्थितियाँ और आज का वातावरण- वैसी ही मानसिकता का प्रतीक बन गए हैं।आज के समय को देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि मानो स्वार्थ और संकीर्णता फैशन में आ गए हैं और अपने हितों को पूरा करने की अंधी दौड़ में लोग सज्जनता और मानवता का जनाजा निकालने में संकोच भी नहीं करते हैं।
ये ठीक है कि आज के समय में धन बढ़ा है, साधन बढ़े हैं, सुविधाएँ बढ़ी हैं, परंतु क्या यह सत्य नहीं है कि आज उतनी ही तेजी के साथ चरित्र का पतन हुआ है, भावनाएँ संकुचित हुई हैं और परस्पर के स्नेह-विश्वास का स्थान शक, संदेह और कठोरता ने ले लिया है।कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि आज ईमानदारी, कर्त्तव्यपरायणता और विश्वसनीयता इतनी तेजी से गिर रहे हैं कि व्यक्ति के मन में न समाज का संकोच है, न प्रशासन का भय है और न ही उसके मन में ईश्वरीय न्याय-व्यवस्था पर जरा भी भरोसा रह गया है। परिणाम यह है कि वो मानवीय जीवन, जिसको हम परमेश्वरप्रदत्त सौभाग्यों में सबसे ऊपर गिनते थे, उसका मूल्य शून्य हो गया है और यह देवदुर्लभ जीवन मात्र उलझनों, परेशानियों, झंझटों और पापों को इकट्ठा करने में ही चला जाता है।
हो सकता है कि किसी को ये बातें आलंकारिक लगें तो ऐसे में हमें स्वयं से पूछ करके देखने की आवश्यकता है कि क्या हमें हमारे मन में सुकून, दिल में शांति और चिंतन में स्थिरता अनुभव होती है। ऐसा अनुभव नहीं हो पाता; क्योंकि आज का वातावरण अंधकार का, तमस् का वातावरण है। ये परिस्थितियाँ लगभग वैसी ही परिस्थितियाँ हैं, जैसी कभी भगवान राम के अवतरण के समय में थीं। आज भी एक वैसे ही प्रयास की जरूरत है, जैसा प्रयास भगवान राम के लीला प्रसंग के समय में किया गया था।अवतारी सत्ताओं के आगमन का उद्देश्य भी कुछ वैसा ही होता है। यही अंतर महापुरुषों में एवं अवतारों में होता है।
महापुरुषों के जीवन निश्चित रूप से प्रेरक होते हैं, अनुकरणीय होते हैं, प्रख्यात एवं लोकप्रिय भी होते हैं, परंतु अवतारों के जीवन में इन सारी विशेषताओं के अतिरिक्त भी एक विशेषता होती है कि वो कालचक्र की दिशा को परिवर्तित करने के लिए आते हैं। सारांश में कहें तो इसे ऐसे कह सकते हैं कि महापुरुषों और अवतारों- दोनों के जीवन का उद्देश्य लोक-शिक्षण होता है, परंतु अवतार इसके अतिरिक्त एक और कार्य संपन्न करते हैं- वो है वातावरण के प्रवाह को परिवर्तित करना।अवतारों के जीवन प्रसंग का उद्देश्य मात्र अच्छी सोच एवं शुभ शिक्षाओं को प्रसारित करना ही नहीं होता, बल्कि उनका कार्य वातावरण को नूतन एवं सकारात्मक दिशा प्रदान करना भी होता है।
परिस्थितियाँ अंधकार की होती हैं तो न केवल वे एक प्रकाशपुंज की तरह चमकते हैं, बल्कि वे प्रकाश को स्थापित भी करते हैं।इसे कुछ ऐसे समझ सकते हैं कि अंधकार में प्रकाश लाने का काम एक मोमबत्ती भी करती है, एक टॉर्च भी करती है और एक मशाल भी करती है, पर इन सबसे अँधेरा थोड़ी देर के लिए ही दूर * होता है। इसके विपरीत जब भगवान सूर्य का उदय होता है तो न केवल वे प्रकाश लाते हैं, बल्कि वे * सवेरे को स्थापित भी करते हैं।भगवान राम का जीवन इसीलिए युगांतकारी हो जाता है; क्योंकि उनके आगमन के साथ न केवल असुरता का अंत होता है, लंका का अंत होता है, बल्कि रामराज्य का प्रारंभ भी होता है। अवतारों के अवतरण का प्रयोजन ही यह है कि वे अपने जीवन के माध्यम से ऐसे उदाहरण जनसामान्य के सम्मुख रखते हैं कि जिनसे प्रेरणा प्राप्त करके व्यक्ति नर-से-नारायण, मानव-से-महामानव और क्षुद्र से महान बन सकता है
साथ ही वे ऐसे अभियानों को भी जन्म देते हैं, जिनका अंग बनकर मनुष्य में दिव्य भावनाएँ, उत्कृष्ट विचारणाएँ एवं आदर्शवादी क्रिया चेष्टाएँ दृष्टिगोचर होने लगती हैं। इसीलिए तो रामचरितमानस में भगवान राम का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं- , ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता । अखिल अमोघसक्ति भगवंता ।। कुछ ऐसा ही महर्षि वाल्मीकि भी उनके द्वारा रचित रामायण में लिखते हैं। वे कहते हैं कि ‘त्रयाणामपि लोकानां कार्यार्थं मम संभवः ।’ इसीलिए रामचरितमानस में काकभुशुंडि जी के द्वारा यह वचन निकला है कि – . उदर माझ सुनु अंडज राया। . देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया ॥ . अति बिचित्र तहँ लोक अनेका। . रचना अधिक एक ते एका ॥
शुद्धौमुक्तः सदैवात्मा न वै बध्यते कर्हिचित । बन्धमोक्षौ मनस्सस्थौ तस्मिञ्छान्ते प्रशाम्यति ॥ . -श्रीमद्भागवत
अर्थात आत्मा तो शुद्ध और मुक्त है। वह कभी भी बंधन को प्राप्त नहीं होती। बंधन और मोक्ष तो मन के गुण हैं।
. कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा।अगनित उडगन रबि रजनीसा ।। . अगनित लोकपाल जम काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला ॥
इस दृष्टि से देखें तो भगवान राम का चरित्र हमें हर प्राणी में उन्हीं परमात्मा के दर्शन की प्रेरणा देता है। कण-कण में भगवान को देखते हुए, हर अंश में परब्रह्म को देखते हुए जो जीवन जीता है, उसके अंदर सद्भावनाएँ, सद्विचारणाएँ एवं सत्प्रवृत्तियाँ स्वतः ही विकसित होती चली जाती हैं। ‘सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी ।।’ के भाव से इस राम नवमी पर इसी प्रेरणा को आत्मसात् करने का प्रयास हमें करना चाहिए।
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