सत्संग का होता है अद्भुतप्रभाव
एकनाथ एक उच्च कोटि के संत थे। उनकी निर्मलता, सहृदयता व समदर्शिता सदा उनके आचरण से प्रस्फुटित हुआ करती थी। एक दिन रात्रि में उनके यहाँ हरिकीर्तन हो रहा था।

MOTIVATION| प्रेरणा : उसमें कई श्रद्धालु, भक्त, शिष्य शामिल थे। उसी समय तीन चोर कहीं से आए और कीर्तन मंडली में यह सोचकर शामिल हो गए कि कीर्तन समाप्त हो जाने पर जब सभी कीर्तनकार चले जाएँगे तब वे इस घर से चोरी कर भाग जाएँगे।कीर्तन समाप्त होने पर सभी कीर्तनकार चले गए। रात्रि 2 बजे के लगभग चोरों ने एकनाथ के घर में चोरी करना आरंभ किया।
घर में जो भी बरतन, कपड़े दिखाई पड़े उन्हें बाँधकर ले जाने लगे, पर उन्हें लगा कि घर में अभी और भी सामान हो सकता है और ऐसा सोचकर वे दरवाजे से पुनः घर में घुसकर इधर-उधर सामान ढूँढ़ने लगे। उसी क्रम में वे उस पूजागृह, देवगृह में पहुँच गए, जहाँ बैठकर संत एकनाथ पूजा-पाठ एवं भगवद्ध्यान किया करते थे।चोरों ने देखा कि उस घर में एक दीपक जल रहा है और संत एकनाथ आसन पर बैठकर समाधि के आनंद में मग्न हैं। यह दृश्य देखते ही चोरों की दृष्टि बाधित हो गई और उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं देने लगा। वे वहाँ से भागने के चक्कर में वहाँ रखे बरतनों पर गिर पड़े। चोरों ने समझा कि शायद यहाँ बैठे महात्मा (संत एकनाथ) के प्रभाव से ही उन्हें कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा और वे अंधे हो गए हैं।
वे सभी वहीं पास में ध्यान-समाधि के आनंद में निमग्न संत एकनाथ के चरणों पर गिर पड़े, रोने * लगे और माफी माँगने लगे ध्यान में मग्न सहृदय संत एकनाथ ने आँखें खोलीं और उन चोरों की दशा देखकर द्रवित हुए। उन्होंने उन चोरों की आँखों पर हाथ फेरा, उनके हाथ फेरते ही चोरों की दृष्टि वापस लौट आई। यह चमत्कार देखकर चोर चकित हुए। । उन सबने संत एकनाथ को सारी बातें बताईं कि कैसे वे चोरी कर उनके घर से भाग रहे थे।सहृदय संत एकनाथ ने चोरों से कहा- “तुम लोग बहुत थक गए होगे, इसलिए पहले भोजन कर लो, फिर जो भी सामान ले जा रहे थे, वह सब लेकर जाना।
हम तुम्हें सामान ले जाने से रोकेंगे नहीं, बल्कि मैं तुम्हें सामान ले जाने में मदद भी कर सकता हूँ। कोई संकोच मत करो। तुम प्रेमपूर्वक भोजन ग्रहण करो, फिर जाओ।”इतना कहते हुए संत एकनाथ ने अपनी उँगली की अँगूठी निकालकर उन चोरों की ओर रख दी। संत एकनाथ के उस व्यवहार को देखकर उन चोरों के मलिन चित्त में भी हलचल हुई। हम जैसे चोरों के प्रति भी ऐसा प्रेम-व्यवहार ! भला यह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हो सकते। चोरों ने मन-ही-मन यह सोचा। ग्लानि के भाव से उन सबकी आँखें भर आईं।
वास्तव में गलत संगति से यदि कोई गलत मार्ग पर जा सकता है तो सत्संगति पाकर कोई सत्मार्ग पर क्यों नहीं चल सकता। कई बार दुर्जन या बुरे लोगों की संगति पाकर लोग बुरे मार्ग पर चल पड़ते हैं, पर यदि बुरे मार्ग पर चलने वाले लोगों, दुर्जन लोगों को गलती से भी संतों की संगतिमिल जाए तो उनका जीवन सुधर सकता है; क्योंकि जैसे जल में चट्टानों को फोड़ने की ताकत है, वैसे – ही सज्जनता में, सत्संग में, साधु पुरुषों की संगति में, सद्विचारों में दुर्जनता को जीतने की अद्भुत सामर्थ्य है।बुराई या दुर्जनता से मुक्त होने के लिए सत्संग या संतों की सज्जनता, संगति ही एकमात्र कारगर इलाज है। इसके अतिरिक्त इस मृत्युलोक में दुर्जनता का कोई दूसरा उपचार नहीं है।
संत एकनाथ के मधुर व्यवहार और उनके चारों ओर फैली घनीभूत आध्यात्मिक आभा के प्रभाव से चोरों को अपनी भूल का एहसास हुआ और उन चोरों का मन बदल गया।संत एकनाथ ने अपनी पत्नी गिरिजाबाई को जगाकर रात्रि में रसोई तैयार कराई और चोरों को भोजन कराया। चोर अपने साथ कुछ भी नहीं ले गए। यदि वे कुछ साथ लेकर गए तो संत एकनाथ की सहृदयता, उदारता का स्मरण। उस स्मरण से शुद्ध होकर उन सबने चोरी करना छोड़ दिया। वे सदाचारपूर्वक रहने लगे और बार-बार एकनाथ महाराज के कीर्तन और उपदेश सुनते हुए अंत में सद्गति को प्राप्त हुए। सचमुच सत्संग की कैसी अद्भुत महिमा है। संतों की संगति से सचमुच बुरे से बुरे व्यक्ति का जीवन भी बदल सकता है।
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