भगवन की कृपा

MOTIVATION/प्रेरणा : अमृतनाथ जी महाराज का जन्म जयपुर के पिलाणी नामक गांव में हुआ था। जन्म के समय उनका शरीर छह माह के हृष्ट-पुष्ट बालक के समान बड़ा और बेहद आकर्षक था। पिता ने उनका नाम बचपन में यशराम रखा था। वह जब युवा हो गए, तब उनकी माता का देहांत हो गया, जिनके साथ वह जन्मसिद्ध योगी होते हुए भी बड़ा स्नेह संबंध रखते थे। माताजी के देहांत के बाद यशराम उसी वर्ष अपने घर से निकल पड़े और स्वामी चंपानाथ जी महाराज से संन्यास की दीक्षा ली और अपना नाम यशराम से बदलकर ‘अमृतनाथ’ रख लिया।तदनंतर उन्होंने चौबीस वर्षों तक पर्वत-गुफाओं में निवास करके घोर तपस्या की।
इस तपस्या से उन्हें सभी प्रकार की सिद्धियां सुलभ हो गई। कुछ समय बाद अमृतनाथ जी के दर्शन करने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ने लगी। उनके पास हजारों रोगी, दुखिया आदि आया करते थे और वह किसी को निराश नहीं करते थे। उनके पास आने वाले हर इन्सान की समस्या का निदान हो जाता। अमृतनाथ जी लोगों से कहते, सब भगवान की कृपा है, मैं कुछ नहीं करता, वही सब ठीक करते हैं। स्वयं को भगवान की भक्ति में समर्पित कर दो। अमृतनाथ जी की ख्याति सुनकर राजा माधव सिंह ने उनकी सेवा में कुछ मकान और एक गांव भेंट करने की इच्छा जताई। काफी अनुनय-विनय करने पर भी उन्होंने राजा की भेंट स्वीकार नहीं की। उन्होंने राजा से कहा, राजन, मुझे इसकी जरूरत नहीं है, इसे जरूरतमंद लोगों को भेंट कर दो।
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