प्रेरणा

ध्यान में ही जीवन का परम आनंद

MOTIVATION/प्रेरणा :  ध्यान में कुछ अनिवार्य तत्व हैं, विधि कोई भी हो, वे अनिवार्य तत्व हर विधि के लिए आवश्यक हैं। पहली है विश्रामपूर्ण अवस्था मन के साथ कोई संघर्ष नहीं, मन पर कोई नियंत्रण नहीं, कोई एकाग्रता नहीं। दूसरा, जो भी चल रहा है, उसे बिना किसी हस्तक्षेप के बस शांत सजगता से देखो भर। शांत होकर, बिना किसी निर्णय और मूल्यांकन के, बस देखते रहो। तुम्हारे भीतर की सारी हलचल समाप्त हो जाती है।

तुम हो, लेकिन ‘मैं हूं’ का भाव नहीं है। बस एक शुद्ध आकाश है। ध्यान की एक सौ बारह विधियां हैं, मैं उन सभी विधियों पर बोल रहा हूं। उनकी संरचना में भेद है, परंतु उनके आधार वही हैंः विश्राम, साक्षित्व और एक निर्विवेचनापूर्ण दृष्टिकोण। लाखों लोग ध्यान सेचूक जाते हैं। लगता है, ध्यान बस उन्हीं लोगों के लिए है, जो या तो मर गए हैं-उदास हैं, गंभीर हैं। ध्यान बहुत गंभीर लगता है, उदास लगता है, जिनके चेहरे लंबे हो गए हैं, जिन्होंने उत्साह, मस्ती, प्रफुल्लता, उत्सव सब खो दिया। यही तो ध्यान के गुणधर्म हैं। जो व्यक्ति वास्तव में ध्यानी है, वह खेलपूर्ण होगा। जीवन उसके लिए मस्ती है, एक लीला, एक खेल है। वह जीवन का परम आनंद लेता है।

वह गंभीर नहीं होता, विश्रामपूर्ण होता है। जल्दीबाजी मत करो। बहुत बार जल्दीबाजी करने से ही देर हो जाती है। जब तुम्हारी प्यास जगे, तो धैर्य से प्रतीक्षा करो। जितनी गहन प्रतीक्षा होगी, उतनी जल्दी ही वह आएगा। तुमने बीज बो दिए, अब छाया में बैठे रहो और देखो क्या होता है! बीज टूटेगा, खिलेगा, लेकिन तुम प्रक्रिया को तेज नहीं कर सकते। क्या हर चीज के लिए समय नहीं चाहिए? तुम कार्य करो, लेकिन परिणाम परमात्मा पर छोड़ दो। जीवन में कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता। विशेषतः सत्य की ओर उठाए गए कदम। परंतु कई बार अधैर्य उठता है, प्यास के साथ ही आता है अधैर्य, पर वह बाधा है।

प्यास को बचा लो और अधैर्य को जाने दो। अधैर्य को प्यास के साथ मिलाओ मत। प्यास में उत्कंठा तो होती है, परंतु कोई संघर्ष नहीं होता। अधैर्य में संघर्ष होता है और कोई उत्कंठा नहीं होती।अभीप्सा में प्रतीक्षा तो होती है, परंतु कोई मांग नहीं होती। अधैर्य में मांग होती है और कोई प्रतीक्षा नहीं होती। प्यास में तो मौन आंसू होते हैं। अधैर्य में बेचैन संघर्ष होता है। सत्य पर आक्रमण नहीं किया जा सकता। वह तो समर्पण से पाया जाता है, संघर्ष से नहीं। उसे समग्र समर्पण से जीता जाता है। यही कारण है कि शिक्षित लोग चालाक हो जाते हैं, क्योंकि वे छोटे मार्ग खोजने में सक्षम होते हैं।

यदि तुम न्यायोचित ढंग से धन कमाओ, तो तुम्हारा पूरा जीवन भी इसमें लग सकता है। लेकिन यदि तुम तस्करी से, जुए से या किसी और ढंग से राजनेता, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनकर धन कमा सको, तो सभी छोटे मार्ग तुम्हें उपलब्ध होंगे। शिक्षित व्यक्ति चालाक हो जाता है। वह बुद्धिमान नहीं बनता, बस चालाक हो जाता है। वह इतना चालाक हो जाता है कि बिना कुछ किए सब कुछ पा लेना चाहता है। ध्यान उन्हीं लोगों का घटता है, जो परिणामोन्मुख नहीं होते। ध्यान परिणामोन्मुख न होने की दशा है।

सही मार्ग का चुनाव करें- अहंकार परिणामोन्मुख है, मन सदा परिणाम के लिए लालायित रहता है। मन का कर्म में कोई रस नहीं होता। यदि कृत्य से गुजरे बिना ही मन परिणाम पा सके, तो वह छोटे मार्ग का ही चुनाव करेगा। मन को कर्म की ओरसूत्रप्रेरित करें और जीवन में सही मार्ग का चुनाव करें।

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