प्रेरणा

दिल को शुद्ध और इंद्रियों पर नियंत्रण रखें

जब आप वर्तमान में सही दृष्टिकोण विकसित करते हैं, तभी भविष्य में अपनी भूमिकाएं ठीक से निभा पाएंगे। इसलिए अपने दिल को शुद्ध करें। अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखें। यही सही रास्ता है।

MOTIVATION/प्रेरणा : बच्चा जब जन्म लेता है, तो वह सभी इच्छाओं से मुक्त होता है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे उसकी इच्छाएं भी बढ़ती जाती हैं। इन इच्छाओं को एक सीमा के भीतर ही रखना चाहिए। जीवन एक लंबी यात्रा है और इस यात्रा में आप जितना कम सामान लेकर जाएंगे, उतना ही आरामदायक सफर होगा। मुझे लगता है कि इच्छाओं को कम करना ही सभ्यता की असली पहचान है। इच्छाओं की कोई सीमा नहीं है। शिक्षा के माध्यम से इच्छाओं को समझकर उसे सीमित करना चाहिए। हमें समझना चाहिए कि शरीर के हर अंग की एक सीमा होती है, वह क्या कर सकता है। उस सीमा से परे उसका उपयोग करना खतरनाक साबित हो सकता है।

यह बात जीवन में लगभग हर चीज पर लागू होती है। जब भी सीमा पार की जाती है, तो इसके विपरीत परिणाम होते हैं।प्रकाश अंधेरे को दूर करने के लिए जरूरी है, लेकिन अत्यधिक प्रकाश में आप देख नहीं सकते। संगीत सुनने में काफी प्रिय लगता है, लेकिन अत्यधिक आवाज में वह कान के पर्दो को नुकसान पहुंचा सकता है। आज जहां भी आप देखें, अव्यवस्था और निराशा है। इन्सान को दो वरदान मिले हैं, सुख और शांति। दुनिया का हर वह व्यक्ति, चाहे वह राजा हो या भिखारी, इन दोनों की ही कामना करता है। लेकिन वह कौन-सा सुख है, जिसकी उसे तलाश करनी चाहिए? क्या यह शारीरिक, मानसिक या भौतिक सुख है? लोग चिंता से मुक्ति को ही शांति मानते हैं। शांति के बिना सुख नहीं मिल सकता है। और शांति कैसे प्राप्त की जा सकती है? जब इच्छाएं कम होंगी, तभी शांति प्राप्त होगी।

हमारी इच्छाएं बढ़ेंगी, तो जीवन से शांति खोती जाएगी। इन्सान अतृप्त इच्छाओं का शिकार है। वह एक इच्छा पूरी करता है, तो दूसरी आकर्षक चीज की इच्छा करने लगता है। वह विधायक बनना चाहता है। विधायक बनते ही वह मंत्री और फिर मुख्यमंत्री बनना चाहता है। इस तरह इच्छाएं कभी पूरी नहीं होती हैं और इन्सान संतुष्ट नहीं हो पाता। इन इच्छाओं का कोई अंत नहीं है। इन्सान को संतोष करना चाहिए। असंतुष्ट व्यक्ति हर तरह से हारता है। एक विद्यार्थी उच्च अंक पाने की इच्छा तो कर सकता है, लेकिन यदि वह सोचता है कि अन्य विद्यार्थी अच्छे अंक प्राप्त न करें, तो यह स्वार्थी रवैया उसे एक दिन भारी पड़ेगा। दूसरे विद्यार्थी भी बेहतर करें-यह उदार दृष्टिकोण होना चाहिए।

विद्यार्थी की अवस्था कोमल पौधे की तरह होती है। जब उसकी उचित देखभाल की जाती है, तो वह एक अच्छा पेड़ बन जाता है। इस छोटी-सी उम्र से ही ध्यान रखना चाहिए कि हमारा मन भटक न जाए। ईर्ष्या, घृणा और अहंकार को अपने भीतर न आने दें। दूसरों की सफलता पर खुश रहें। सफलता अपने आप आपके पास आएगी। जब आप एक व्यापक दृष्टिकोण विकसित करेंगे, तभी आप नेता के रूप में उभर पाएंगे। अगर आप वर्तमान में सही दृष्टिकोण विकसित करते हैं, तभी आप भविष्य में अपनी भूमिकाएं ठीक से निभा पाएंगे। इसलिए अपने दिल को शुद्ध करें। अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखें। यही सही रास्ता है।

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