प्रेरणा

जीवन की हर यात्रा जीत या हार की ओर ले जाती है

एक व्यक्ति अपने जीवन जीने के लिए एक रास्ता चुनता है और हमेशा उस पर चलकर कुछ हासिल करना चाहता है। हर व्यक्ति बुद्धि की एक इकाई है और उसे अपने आप को जिस तरह से चाहे वैसा आकार देने का अधिकार है।

MOTIVATION/प्रेरणा : जब भी मैं ‘सड़क‘ शब्द सुनता हूं तो मुझे गांव की वो पगडंडियां याद आ जाती हैं जो गांव की धूल भरी जमीन से शुरू होकर आम के बगीचों या हरे-भरे खेतों में खो जाती हैं। शायद ये मेरे बचपन के संस्कार हैं, जो आज भी अपनी जगह सुरक्षित हैं। फिर मुझे कस्बे की वो कंकड़-पत्थर वाली सड़क याद आती है, जहां मैं हाईस्कूल में जाता था। भला कैसे याद न करूं। तुलसीदास ने कहा है- ‘मार्ग सोइ जाको जो भव’। आखिर तुलसीदास के इस ‘मार्ग’ का क्या अर्थ हो सकता है? इसका अर्थ है कि मनुष्य अपना जीवन बिताने के लिए एक रास्ता चुनता है और उस पर चलकर हमेशा कुछ हासिल करना चाहता है। हर मनुष्य बुद्धि की एक इकाई है और उसे अपने आप को जिस तरह से ढालना है, उसे ढालने का अधिकार है। ये ईश्वर द्वारा दी गई व्यक्तिगत स्वतंत्रता है। यानी भूगोल पर जितने लोग रहते हैं, जीवन के उतने ही

रास्ते हैं। मनुष्य की हर इकाई को अपने तरीके से जीने का अधिकार है, यानी मार्ग सोइ जाको जो भव इस पंक्ति के माध्यम से उन्होंने बौद्धिक अराजकतावादियों की निंदा की है। शायद वैसा ही कटाक्ष जैसा मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना में सुनने को मिलता है। तो फिर मनुष्य की मानसिक यात्रा के मार्ग क्या होने चाहिए? प्रश्न विचारणीय है। इस विषय पर संसार भर में लोग बड़ी उत्सुकता से विचार कर रहे हैं। कुछ लोगों का मानना ​​है कि यदि मनुष्य को यात्री बनना है तो उसे मात्र यात्री बनना चाहिए। उसका कर्तव्य तो बस चलते रहना है। वह कहां और कैसे जा रहा है, इसके बारे में क्यों सोचे। मनुष्य की इस यात्रा के बारे में विचार करने वालों में राजनीतिज्ञ, समाजशास्त्री और साहित्यकार प्रमुख हैं।

विश्व की वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि राजनीतिज्ञ इस प्रश्न के संबंध में आदेश अधिक देते हैं और विचार कम। राजनीति सत्ता से जुड़ी होती है। सत्ता द्वारा निर्देशित विचार हमेशा मानसिक कुंठा का कारण सिद्ध होता है। समाजशास्त्री द्वारा वैज्ञानिक आधार पर सत्य की घोषणा की जाती है, परंतु उस सत्य के आरोपण में संयमित तटस्थता होती है। साहित्यकारों की विचार प्रक्रिया तटस्थ होती है, परंतु उनका उद्घोष विश्वसनीय होता है। कुछ बुद्धिजीवी तर्क की भूमि पर यात्रा करना पैरों का कर्तव्य कह सकते हैं। एक प्रचलित कहावत है- कहां जा रहे हो? कहीं नहीं। क्या चाहते हो? कुछ भी नहीं। ऐसी मानसिक स्थिति ही मृत्यु की चेतना है।

हम जीवधारियों की बात करते हैं, तो हमें उत्तर देना ही होगा कि कहां जा रहे हो और क्या चाहते हो। यही जीवन की मांग है। फिर हर वर्ग के बुद्धिजीवियों के लिए पथ की एक शर्त है कि पथ के प्रति प्रतिबद्ध होना ही होगा। यदि हम मानव यात्रा की बात करें, तो यह स्वयंसिद्ध है कि वह विजय या पराजय की ओर होगी। पराजय की ओर दौड़ने वाले मृत्यु-उन्मुख विचारकों और दार्शनिकों के लिए तो फूलों की तरह खिलने वाले मानव समाज में शून्यता का आसन है। तब यह आवश्यक हो जाता है कि हम ज्ञान या कर्म की जो भी पद्धति अपनाएं, हमें मानव जाति की विजय यात्रा के प्रति प्रतिबद्ध होना ही होगा। यदि ऐसा नहीं है, तो ये बड़े शहर, रेलगाड़ियां और जहाज, साहित्यिक ग्रन्थ सब बेकार हैं।

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