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ग्लूकोमा या काला मोतियाबिंद आंखों की एक गंभीर बीमारी

ग्लूकोमा या काला मोतियाबिंद आंखों की एक गंभीर बीमारी है, जो आंखों में तरल पदार्थ के बढ़ते दबाव के कारण होती है। दरअसल, आंखों में एक तरल पदार्थ भरा होता है, जो इसे पोषण देता है और आकार देता है।

शरीर इस तरल पदार्थ को रोजाना तरोताजा करता रहता है। पुराना तरल पदार्थ आंखों में मौजूद एक जालीदार परत और एक छोटे से छेद के जरिए बाहर निकल जाता है और नया तरल पदार्थ उसकी जगह ले लेता है। जब किसी वजह से आंखों का यह तरल पदार्थ बाहर नहीं आ पाता है, तो आंख के अंदर दबाव (इंट्राओक्यूलर प्रेशर) बढ़ने लगता है। इस दबाव के कारण आंख के पीछे की नसें क्षतिग्रस्त होने लगती हैं और उनके काम करने की क्षमता खत्म हो जाती है। अगर समय रहते इस दबाव को कम नहीं किया जाए, तो ऑप्टिक नर्व के तंतु हमेशा के लिए क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। इसके कारण मस्तिष्क को सिग्नल मिलना बंद हो जाता है। हम जो कुछ भी देखते हैं, ये नसें उसका सिग्नल मस्तिष्क तक भेजती हैं, जिससे एक छवि बनती है। ग्लूकोमा होने पर यह प्रक्रिया मुश्किल हो जाती है। डॉक्टरों के मुताबिक, अगर समय रहते ग्लूकोमा की समस्या पर ध्यान न दिया जाए या इसका इलाज न किया जाए, तो इससे अंधापन भी हो सकता है। अन्य नेत्र रोगों में उपचार से खोई हुई दृष्टि वापस लाई जा सकती है, लेकिन ग्लूकोमा में दृष्टि वापस पाना मुश्किल होता है।

■बच्चों को भी है खतरा: बच्चों में ग्लूकोमा के मामले वयस्कों की तुलना में अपेक्षाकृत कम हैं, लेकिन फिर भी इसके लक्षणों की जांच करते रहें। बच्चों में इसके लक्षणों की बात करें तो उनकी आंखें बड़ी दिखाई देने लगती हैं। लगातार आंसू आते रहते हैं। उन्हें रोशनी में आंखें खोलने में दिक्कत होती है।

■लक्षणों पर नजर रखें: ग्लूकोमा से पीड़ित ज्यादातर लोगों को शुरुआत में कोई परेशानी महसूस नहीं होती। इसके लक्षण तब दिखते हैं, जब समस्या अत्यधिक बढ़ जाती है। ग्लूकोमा में अक्सर सिरदर्द, आंखों में तेज दर्द या भारीपन, धुंधला दिखाई देना, अचानक से दिखाई न देना, जी मिचलाना या उल्टी होना, चश्मे का नंबर बार-बार बदलना, रात में कम दिखाई देना या दिखाई न देना, आंखें लाल हो सकती हैं।

■कारण भी जानें: ग्लूकोमा आनुवांशिकी, आंखों में चोट, उम्र बढ़ने, उच्च रक्तचाप, मधुमेह और आंखों में संक्रमण के कारण हो सकता है। अगर किसी के परिवार में ग्लूकोमा का इतिहास रहा है, तो उन्हें अपनी आंखों की जांच कराते रहना चाहिए। आंखों में चोट लगने से ग्लूकोमा का खतरा बढ़ सकता है, इसलिए खेलकूद और अन्य गतिविधियों के दौरान चश्मा पहनें।

■ ग्लूकोमा या ग्लूकोमा: ग्लूकोमा और ग्लूकोमा दोनों में ही दृष्टि धीरे-धीरे कम होती जाती है, लेकिन दोनों में बहुत अंतर है। ग्लूकोमा होने पर सर्जरी के बाद दृष्टि वापस आ जाती है, लेकिन ग्लूकोमा के कारण खोई दृष्टि कभी वापस नहीं आती। इसका मुख्य कारण आंखों की अंदरूनी नसों का पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाना है। इसका इलाज बहुत मुश्किल है।

खानपान और व्यायाम से बचाव संभव – धूम्रपान, अनियमित खान-पान और तनाव ग्लूकोमा के खतरे को बढ़ा सकते हैं। इसलिए स्वस्थ जीवनशैली अपनाने और हरी सब्जियां खाने से ग्लूकोमा से बचाव हो सकता है। इसके अलावा रोजाना भ्रामरी या अनुलोम-विलोम प्राणायाम करने से कॉर्टिसोल हार्मोन संतुलित रहता है और ग्लूकोमा का खतरा कम होता है। हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और थायरॉयड से पीड़ित लोगों को ग्लूकोमा का खतरा ज्यादा होता है, इसलिए इन्हें नियंत्रित रखें। मोटापा ग्लूकोमा के खतरे से जुड़ा है, इसलिए स्वस्थ वजन बनाए रखें। तनाव से भी आंखों की सेहत पर असर पड़ता है, इसके लिए अपनी दिनचर्या में मेडिटेशन को शामिल करें। अगर आपकी उम्र 40 साल से ज्यादा है, तो साल में एक बार नियमित रूप से आंखों की पूरी जांच करवाएं। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि कई बार हम आंखों पर बढ़ते दबाव को महसूस नहीं कर पाते और समस्या बढ़ती चली जाती है। जांच करवाने से ग्लूकोमा का जल्दी पता चल जाता है और समय पर सही इलाज मिल जाता है।

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