1857 की क्रांति में छत्तीसगढ़ की भूमिका

सन् 1857 का वर्ष भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण वर्ष था। इस वर्ष हजारों, लाखों स्वाधीनता प्रेमी भारतीयों ने क्रांति की मशाल अपने हाथों में थाम कर ब्रिटिश दासता से मुक्ति पाने के लिए प्रथम प्रयास किया था। अंग्रेजों की कुत्सित नीति, अत्याचार व शोषण से समूचे भारत का वातावरण विषाक्त हो गया था। सन् 1857 में भारत वासियों ने अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ एक महान क्रांति की। कम्पनी प्रशासन के दमन, शोषण एवं अत्याचारपूर्ण नीति से ‘धान का कटोरा’ कहे जाने वाले शांतिमय छत्तीसगढ़ के खेत-खलिहान विद्रोह की ज्वाला से धधकने लगे। यहां के लोगों ने भी स्वराज्य और स्वधर्म की कामना से उत्प्रेरित होकर विद्रोह का शंखनाद किया था।
सोनाखान का विद्रोह– सोनाखान जमींदारी महानदी घाटी में स्थित एक महत्वपूर्ण जमींदारी थी। इस जमींदारी की स्थापना रतनपुर के शासक वाहरसाय के कार्यकाल में बिसई ठाकुर बिंझवार ने सैन्य सेवाओं के बदले प्राप्त भू-भाग से सन् 1490 ई. में की थी। सन् 1818 ई. में सोनाखान जमींदारी पर अंग्रेजों का प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित हुआ। तत्कालीन जमींदार रामाराय ने सन् 1819 में ब्रिटिश प्रशासन के खिलाफ बगावत की। कैप्टन मैक्सन की सेना ने रामाराय के विद्रोह को कूचल दिया। सन् 1830 ई. में रामाराय की मृत्यु हो गई, उसके पश्चात नारायण सिंह जमींदार बना। सन् 1856 ई. में सोनाखान समेत समूचे छत्तीसगढ़ में भयानक सूखा पड़ा, जिससे चारों ओर भीषण अकाल की स्थिति हो गई। सोनाखान के गरीब आदिवासियों को कंद-मूल, फल और यहां तक की पीने के लिए पानी मिलना कठिन हो गया। अकाल से पीड़ित जनता का दुख-दर्द जमींदार वीरनारायण सिंह द्वारा देखा नहीं जा सका। उसने भूख से पीड़ित किसानों को राहत देने के लिए समीपस्थ गांव करौद के व्यापारी माखन साव से अनाज की मांग की। माखन साव की आनाकानी से नारायणसिंह क्रुद्ध हो गया। उसने जबरदस्ती अनाज का गोदाम खुलवाकर केवल इतना ही अनाज लिया जो उन जरूरतमंद किसानों के लिए आवश्यक था।
डिप्टी कमिश्नर ने तुरन्त ही वीरनारायण सिंह के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी किया। एक पुलिस का दल उसके घर भेजा जो कुछ कठिनाईयों के पश्चात उसे लूट व डकैती के आरोप में बंदी करके रायपुर लाया तथा बंदी गृह में डाल दिया। डिप्टी कमिश्नर इलियट ने नागपुर स्थित कमिश्रर प्लाउडन को सूचित किया ‘सोनाखान के जमींदार को पकड़ने के लिए घुड़सवारों की सेना को सम्बलपुर भेजा गया। 24 अक्टूबर 1856 को बंदी बना लिया गया और तहकीकात के लिए रखा गया है।’रायपुर तीसरे रेजीमेंट का मुख्यालय था । देशव्यापी विप्लव की लहर से इस रेजीमेंट के सिपाही भी अछूते नहीं रहे। यहां के कुछ सैनिकों ने वीर नारायण सिंह को स्वतंत्रता संग्राम का नेता मानकर उसे जेल से मुक्त करने की योजना बनाई। इस योजना के अंतर्गत जेल की दीवार में सुरंग बनाई गई और 27 अगस्त की रात वीरनारायण सिंह बंदी गृह से बाहर निकाल दिए गए। सोनाखान की जनता ने अपने जमींदार का ह्रदय से स्वागत किया।
वीरनारयण सिंह सोनाखान पहुंचकर शांत नहीं बैठा। उसने अंग्रेजों से लड़ने के लिए आदिवासियों को संगठित किया तथा आदिवासियों के सहयोग से 500 हथियार बंद सैनिकों का दल गठित किया। वीरनारायण सिंह इस सैनिक तैयारी से ही संतुष्ट नहीं हुआ। उसने सोनाखान की ओर आने वाले हर मार्ग पर नाकेबंदी, निकट के गांवों में रसद, शस्त्र, गोला-बारूद इकट्टा कर मजबूत मोर्चा सम्हाला ।डिप्टी कमिश्नर इलियट ने वीरनारयण को तत्काल गिरफ्तार करने के लिए लेफ्टिनेट स्मिथ को आदेश दिया। तदानुसार स्मिथ और लेफ्टीनेट नैपियर, 53 पुलिस घुड़सवार, 4 दफादार तथा एक जमींदार की सेना के साथ 20 नवम्बर 1857 को सोनाखान रवाना हुआ। रास्ते में खरौद थाने में रूका।वीरनारायण सिंह ने सोनाखान को खाली कर पहाड़ी पर मोर्चा लेने की तैयारी की थी। उसने अपने परिवारजनों का माल असबाब अपने पुत्र गोविन्द सिंह के साथ बाहर भेज दिया था।
सोनाखान के आदिवासियों ने स्मिथ को रास्ते में रोकने के प्रयत्न किए। सोनाखान के नाले के पास वीरनारायण सिंह की एक टुकड़ी ने गोलियों की बौछार की। उससे बचते हुए स्मिथ ने सोनाखान में प्रवेश किया। वीरनारायण सिंह ने पहले ही इसे खाली कर दिया था। लेफ्टीनेंट स्मिथ पर पहाड़ी के ऊपर से गोलीबारी की गई। अंग्रेजी फौज ने सोनाखान के सूने पड़े घरों में आग लगा दी। सारा गांव जलकर राख हो गया। लेफ्टीनेंट स्मिथ और सहयोगी जमींदारियों की विशाल सेना से वीरनारायण सिंह लम्बे समय तक संघर्ष नहीं कर सकता था। प्रतिरोध व्यर्थ समझकर वीरनारायण सिंह ने आत्म समर्पण कर दिया। उसे गिरफ्तार कर पुनः रायपुर लाया गया जहां एटोशियस एक्ट (सन् 1857 का 14 वॉ) के अधीन उसके विरुद्ध राजद्रोह तथा विद्रोह का आरोप लगाया गया और मृत्युदण्ड दिया गया ।10 दिसम्बर 1857 को वीरनारायण सिंह को रायपुर के एक प्रमुख चौराहे पर बंदी की स्थिति में लाया गया और वहीं पर सेना और जनता के सामने क्रांतिवीर को फांसी दे दी गई।
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