1857 की क्रांति में सरगुजा के राजकुमारों का विद्रोह

छत्तीसगढ़ के उत्तरांचल में स्थित उदयपुर सरगुजा रियासत का एक करद राज्य था। सन् 1852 में ब्रिटिश कम्पनी की सरकार ने यहाँ के शासक कल्याणसिंह और उसके दो भाईयों शिवराज सिंह, धीरजसिंह पर मानव वध का अपराधी होने का मनगढंत आरोप लगाया था। कल्याणसिंह, धीरजसिंह और शिवराज सिंह को गिरफ्तार कर रांची जेल में बंद कर दिया गया। उनका राज्य उदयपुर को ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर लिया गया। सन् 1857 की क्रांति की गुंजे रांची पहुंची। क्रांतिकारियों ने रांची पर कब्जा जमा लिया। परिणामतः अंग्रेजों को रांची छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा। अंग्रेजों का प्रभाव कम होते ही रांची जेल में कैद कल्याणसिंह, धीरज सिंह और शिवराज सिंह जेल फांदकर उदयपुर आ गए।
अपने खोए हुए क्षेत्र को प्राप्त करने में सफल रहे, कम्पनी प्रशासक का प्रतिनिधि शासक (तहसीलदार) उदयपुर छोड़कर भाग गया। उदयपुर के इन वीर सपूतों ने अंग्रेजों के विरुद्ध संगठित रूप से विद्रोह करने की तैयारी की। उनकी गतिविधि से कम्पनी प्रशासन की नींद हराम हो गई। कम्पनी शासन ने उन्हें नियंत्रित करने व पकड़ने के लिए सेना भेजी परन्तु यह सेना नाकाम साबित हुई। इस विकट परिस्थिति में अंग्रेजों ने रायगढ़ के गोंड़ शासक देवनाथ सिंह से सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया। कल्याणसिंह और धीरजसिंह अंग्रेजों के साथ संघर्ष करते हुए रण क्षेत्र में बलिदान हो गए। सन् 1859 ई. में रायगढ़ के गोंड़ शासक देवनाथ सिंह की सेना ने शिवराज सिंह को परास्त कर बंदी बना लिया। उस पर मुकदमा चलाया गया तथा उसे कालापानी की सजा देकर अण्डमान द्वीप भेज दिया गया। रायगढ़ के शासक देवनाथ सिंह की गद्दारी, देशद्रोहिता एवं अंग्रेजों की स्वामी भक्ति से उदयपुर राज्य के वीर सपूत कल्याणसिंह, शिवराज सिंह और धीरज सिंह के विद्रोह का दमन हो गया।
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