1857 की क्रांति में सुरेन्द्रसाय का विद्रोह

सन् 1905 ई. तक सम्बलपुर का भू-भाग छत्तीसगढ़ का हिस्सा था। वाइसराय लार्ड कर्जन की शासनावधि में यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ से पृथक कर उड़ीसा में समाहित किया गया। सम्बलपुर पूर्वी क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण रियासत रही है। इस रियासत में चौहान वंश का शासन था। 18 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सम्बलपुर व उसके आसपास के इलाके पर नागपुर के अधिपति भोंसले का प्रभाव स्थापित हुआ था। सन् 1833 ई. में अंग्रेजों ने मोहन कुमारी को राजगद्दी से उतार दिया और नारायण सिंह को राजा बनाया। नारायणसिंह सम्बलपुर के राजा बलियार सिंह के ज्येष्ठ पुत्र विक्रम सिंह की रखैल का पुत्र था।नारायणसिंह का राजा बनाया जाना गोंड़ों ने अपना अपमान समझा। सुरेन्द्रसाय के समर्थक गोंड़ों की क्रोधाग्नि भड़क उठी। उन्होंने लखनपुर के गोंड़ जमींदार बलभद्र दाऊ के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया बाड़ पहाड़ नामक पहाड़ियों ने इन गोंड़ों को आश्रय दिया जहाँ से वे अंग्रेजी सेना के खिलाफ बहुत दिनों तक लड़ते रहे। इन पहाड़ियों की सबसे ऊँची चोंटी पर देवरीगढ़ नामक एक दुर्ग था।
इस दुर्ग को बलभद्र दाऊ ने बनवाया था। अंग्रेजी फौज ने इसकी घेराबंदी की। यहाँ हुए संघर्ष में सुरेन्द्रसाय का प्रबल समर्थक बलभद्र दाऊ वीरगति को प्राप्त हुआ। बलभद्र दाऊ के मौत के बाद सुरेन्द्र साय ने गोंड विद्रोहियों का नेतृत्व किया। विद्रोही सुरेन्द्र साय, उदवन्त साय और बलराम सिंह गिरफ्तार किए गए। उन पर मुकदमा चला और आजीवन कारावास का दण्ड देकर हजारी बाग जेल में बंद कर दिया गया। 10 दिसम्बर 1849 को नारायणसिंह (सम्बलपुर का शासक) की मृत्यु हो गई। नारायण सिंह की कोई सन्तान नहीं थी। उसकी रानी ने किसी को गोद लेना पसन्द नहीं किया । अतः लार्ड डलहौजी ने गोद निषेध प्रथा के अंतर्गत सम्बलपुर का वृहद राज्य हस्तगत कर लिया। सन् 1857 ई. में देशव्यापी महान विप्लव का आरंभबैरकपुर व मेरठ के सैनिकों ने किया। इसकी सूचना हजारीबाग स्थित देशी सिपाहियों को प्राप्त हुई।
यहाँ के सैनिकों ने 30 जुलाई 1857 को विद्रोह कर दिया।विद्रोही सैनिकों ने खजाने पर कब्जा किया और जेल को तोड़कर कैदियों को मुक्त कर दिया। इन मुक्त होने वालों में सुरेन्द्रसाय और उनके भाई उदवन्त साय भी थे। अपनी मुक्ति के बाद दोनों भाई सम्बलपुर पहुंचे। यहाँ आकर सुरेन्द्रसाय और उसके भाईयों ने अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह आरंभ कर दिया। उसका विद्रोह जन समर्थित व्यापक आंदोलन था, उसे सम्बलपुर के आसपास के गोंड़ गौटियों, जमींदारों का प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सहयोग व समर्थन प्राप्त था। घींस, बुसडक, केला, खरसल, पटकुलुण्डा, पहाड़, सिरिगिड़ी मेमदी माहुल, लुईसिंगा, कोलवीरा, मोचिन्दाविण्डा, खिण्डा और तालवीरा आदि गांव व जमींदारियां विद्रोह के प्रमुख केन्द्र थे। इन गांवों के गौटियों और जमींदारों ने सहयोग व समर्थन ही नहीं किया अपितु सशस्त्र विद्रोह में शरीक भी हुए। कम्पनी प्रशासन के अधिकारी काकवर्न के आदेश पर इन गांवों की गौटियाई और जींदारियां छीन ली गई। क्योंकि उनपर विद्रोहियों का साथ देने और ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध संघर्ष करने का गंभीर आरोप था।
सुरेन्द्र साय के नेतृत्व में जिन जमींदारों और गौटियों ने 1857 की क्रांति के समय विद्रोह किया वे इस प्रकार थे।(1) दीवान मनोहरसिंह गोंड (भेंडन) (2) खगेसर राय गोंड (बोन्दा,) (3) पीतमर सिंह गोंड (पाठकोड़ा) (4) चमरुराय पहारथ (सिणडगिड़ा) (5) माधोवरिहा (धींस) (6) हठेसिंह नरिहा (धींस) (7) कुंजलसिंह वरिहा (धींस) (8) कंवल सिंह दाऊ गोंड़ (सम्बलपुर) (9) दाऊ गजराजसिंह गोंड़ (द्वारी) (10) बुटी गोंड (11) सिरदार दयालसिंह गोंड (खरसल) (12) जगबंधु (सिरदार) (13) कर्मा गोंड गौटिया (कोलबीरा) (14) रामपुर के गोंड गौटिया (15) मोहनसिंह दाऊ (कोड़ेबंधा) (16) नरहरदाऊ (बांदो) (17) विक्रमसिंह बाबू (सम्बलपुर) (18) महादेव दाऊ (मीचदा) (19) निलाम्बर सिंह दाऊ गोंड (नसेकेता) (20) हरिसंह (खरसल) (21) नेमीसिंह सिरदार (22) महादेव गौटिया (कोरकोट)।अंग्रेजी फौज ने अपने गौटियों, प्रभावशाली व्यक्तियों को गिरफ्तार कर फांसी की सजा दे दी और उनकी सम्पत्ति जप्त कर ली। 17 दिसम्बर 1857 को कैप्टन ली ने विद्रोहियों पर आक्रमण किया। बड़ी संख्या में विद्रोही मारे गए। कोड़ापाली विद्रोहियों का एक महत्वपूर्ण गढ़ था।
कैप्टन बुड की नेतृत्व वाली ब्रिटिश फौज ने इस गढ़ पर हमला किया। विद्रोहियों और अंग्रेजी फौज के बीच जमकर संघर्ष हुआ। कोड़ापाली दुर्ग के संघर्ष में अनेक विद्रोहियों की मृत्यु हो गई तथा अनेक गिरफ्तार किए गए। सुरेन्द्रसाय का छोटा भाई छबिल साय शहीद हो गया। छबिल साय की मृत्यु और विजय से अंग्रेजों का उत्साह बढ़ गया। 12 फरवरी 1858 को कैप्टन बुडब्रिज कैप्टन ली के सात पहाड़ सिरगिरा की ओर कुच कर रहा था, विद्रोहियों की गोली का शिकार हो गया। सुरेन्द्र साय का विद्रोह 1857 से 1864 तक जारी रहा। उसने सारंगढ़ रियासत की सीमावर्ती इलावे जरिया परगना, लखीमपुर, खरियार रोड की पहाड़ियों आदि क्षेत्रों में विद्रोह की गतिविधियां की। उसे कुंजलसाय, गोविन्दसिंह (नारायण सिंह सोनाखान जमींदार का पुत्र) कमलसिंह, हाथी सिंग जैसे उत्साही साथियों का सहयोग व समर्थन प्राप्त हुआ। उसके व्यापक विद्रोह से ब्रिटिश हुकूमत की नींद उड़ गई। उसने खरियार, पटना, वृन्दा, नवागढ़, फूलझर, सारंगढ़, रायगढ़ सक्ति के राजाओं को परवाना भेजकर विद्रोहियों को गिरफ्तार करने का हुक्म दिया।
खरियार के राजा कृष्णचन्द सिंह और वृन्दानवागढ़ के राजा उमरावसाय ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोहियों को पूर्ण समर्थन व सहयोग किया।मातृभूमि के लिए इनकी सेवाएं उतनी ही प्रशंसनीय है जितनी की सुरेन्द्र साय की। इन दोनों ने ब्रिटिश हुकूमत के भय, आतंक को दर किनार कर आर्थिक सैनिक सहायता प्रदान की। उनके इस कार्य से ब्रिटिश सरकार हैरान व परेशान हो गई। उन्हें परवाना भेजकर जमींदारी समाप्त कर देने, सम्पत्ति छीन लेने की धमकी चमकी दी गई। परन्तु आजादी के इन दीवानों पर इसका कोई प्रभाव नही पड़ा।अंग्रेजों की सेना चार साल तक विद्रोहियों से लड़ती रही और उनकी सेना को तितर-बितर करती रही फिर भी वे लड़ते रहे। जो भी अंग्रेजों की सहायता करता, वह सुरेन्द्र साय के हाथ मारा जाता, उसके परिवार के लोग भी मारे जाते और अंग्रेजों की मदद करने वाले गांव में आग लगा दी जाती। अंग्रेजों ने लम्बे समय तक सुरेन्द्र साय और उसके साथी विद्रोहियों से संघर्ष किया वे थक गए, परन्तु सुरेन्द्र साय अंग्रेजों के हाथ नहीं आया.|
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