छत्तीसगढ़ में असहयोग आंदोलन

छत्तीसगढ़ इतिहास : असहयोग आंदोलन और छत्तीसगढ़ – कलकत्ता में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन (4-9 सितम्बर 1920):- असहयोग के संबंध में अंतिम निर्णय लेने के लिए लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में 4 से 9 सितम्बर 1920 तक कलकत्ता में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन हुआ। इस विशेष अधिवेशन में भाग लेने के लिए शीर्ष नेता कलकत्ता गए। महात्मा गांधी, मोहम्मद अली, शौकत अली और अन्य नेता बम्बई हावड़ा मेल द्वारा छत्तीसगढ़ होते हुए कलकत्ता गए। छत्तीसगढ़ से भी कई लोग उसी ट्रेन से कलकत्ता अधिवेशन में भाग लेने गए। इनमें डॉ. छेदीलाल बैरिस्टर, ई. राघवेन्द्र राव, डॉ. शिवदुलारे मिश्र, सर्वदत्त बाजपेयी प्रमुख थे। इस अधिवेशन में उपस्थित 2,728 प्रतिनिधियों में से 1,855 प्रतिनिधियों ने गांधीजी के असहयोग प्रस्ताव के पक्ष में तथा 873 ने प्रस्ताव के विरुद्ध मतदान किया। महात्मा गांधी का प्रस्ताव बहुमत से स्वीकार कर लिया गया। मुख्य प्रस्ताव इस प्रकार थे:-
1. 1. पदों का त्याग कर देना चाहिए और सरकार द्वारा स्थापित संस्थाओं में मानद पदों से त्यागपत्र दे देना चाहिए। 2. सरकारी अदालतों और अन्य सभाओं में उपस्थिति पर प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए। 3. सरकारी स्कूलों और कॉलेजों से विद्यार्थियों को निकाल लेना चाहिए। इन स्कूलों और कॉलेजों के स्थान पर प्रत्येक प्रान्त में राष्ट्रीय स्कूल और कॉलेज स्थापित किए जाने चाहिए। 4. वकीलों को सरकारी अदालतों में मुकदमेबाजी का बहिष्कार करना चाहिए और इन अदालतों के स्थान पर आपसी झगड़ों को निपटाने के लिए पंचायत व्यवस्था स्थापित करनी चाहिए। सैनिक लिपिकों और मजदूरों को काम के लिए मेसोपोटामिया जाने से मना कर देना चाहिए। 5 . उम्मीदवारों को परिषद की सदस्यता के लिए खड़ा नहीं होना चाहिए और यदि सभी उम्मीदवार कांग्रेस की सलाह के विरुद्ध खड़े भी हो जाएँ, तो भी मतदाताओं को उन्हें वोट नहीं देना चाहिए। 6 . विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया जाना चाहिए। कांग्रेस का यह मत है कि स्वदेशी आन्दोलन भी चलाया जाना चाहिए क्योंकि इस आन्दोलन से लोगों में त्याग करने की शक्ति उत्पन्न होगी और प्रत्येक पुरुष, स्त्री और बच्चा आन्दोलन में भाग ले सकेगा। इस समय देश में इतने स्वदेशी कारखाने नहीं हैं कि भारत की समस्त जनसंख्या को स्वदेशी वस्त्र उपलब्ध करा सकें। इसलिए, कांग्रेस का मत था कि हर जगह स्वदेशी कारखाने स्थापित किए जाने चाहिए। कलकत्ता में असहयोग प्रस्ताव स्वीकार होने के बावजूद, प्रस्तावों पर तुरंत अमल नहीं किया गया। इसके लिए मुख्य कार्य पूरे देश में उपयुक्त वातावरण बनाना था। यह कार्य कांग्रेस के शीर्ष नेताओं और प्रांतीय नेताओं ने उत्साहपूर्वक किया।
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