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चौरी-चौरा कांड का छत्तीसगढ़ पर प्रभाव तथा सिहावा सत्याग्रह

छत्तीसगढ़ इतिहास : बिलासपुर जिला राजनीतिक सम्मेलन- मई 1921 में जनजागृति के उद्देश्य से बिलासपुर के शनिचरी पड़ाव में एक ज़िला राजनीतिक सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन की अध्यक्षता बुरहानपुर के वकील अब्दुल कादिर सिद्दीकी ने की थी। इस सम्मेलन में पं. माखनलाल चतुर्वेदी, घनश्याम सिंह गुप्त, पं. रविशंकर शुक्ल, ई. राघवेंद्र राव, ठाकुर छेदीलाल, पं. सुंदरलाल शर्मा ने जनजागृति के उद्देश्य से भाषण दिए। माखनलाल चतुर्वेदी के भाषण के दौरान बिजली चली गई। उस समय माखनलाल चतुर्वेदी ने कहा था – ‘जिस तरह यह ब्रिटिश बिजली चली गई है, उसी तरह ब्रिटिश राज भी चला जाएगा।’

पं. माखनलाल चतुर्वेदी की गिरफ्तारी (1921):- पं. माखनलाल चतुर्वेदी को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनता को आंदोलित करने तथा आपत्तिजनक भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। बिलासपुर के मुख्यालय प्रभारी श्री आर.एम. पाण्डेय की अदालत में उनके विरुद्ध मुकदमा दायर किया गया। दिनांक 5 जुलाई 1921 को उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 24 (ए) के अंतर्गत 8 माह के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई। जिस दिन पं. माखनलाल चतुर्वेदी की सजा का फैसला हुआ, उस दिन सुभद्रा कुमारी चौहान, लक्ष्मण सिंह चौहान, रविशंकर शुक्ल आदि बिलासपुर पहुंचे। पं. माखनलाल चतुर्वेदी का फैसला सुनने के लिए बड़ी संख्या में राष्ट्रवादी देशभक्त खड़े थे। 5 जुलाई 1921 को गिरफ्तारी के विरोध में उसी शाम बिलासपुर शहर में एक आम सभा आयोजित की गई। इस सभा की अध्यक्षता पं. रविशंकर शुक्ल ने की। जिसमें ई. राघवेन्द्र राव, ठाकुर छेदीलाल, घनश्याम सिंह गुप्त, पं. माधवराव सप्रे ने ओजस्वी भाषण दिए। न्यायालय कर्मचारी का इस्तीफा ब्रिटिश शासन पर करारा तमाचा था। सरकार ने गंगाप्रसाद तिवारी पर धारा 108 के तहत मुकदमा चलाकर उन्हें जेल में डाल दिया। पं. माखनलाल चतुर्वेदी को 5 जुलाई 1921 को बिलासपुर सेंट्रल जेल में भर्ती कराया गया, जहाँ वे 1 मार्च 1922 तक कैद रहे। इसी जेल में रहकर उन्होंने 18 फ़रवरी 1922 को प्रसिद्ध काव्य “पुष्प की अभिलाषा” की रचना की।

सिहावा सत्याग्रह (जनवरी 1922) – असहयोग आंदोलन के दौरान धमतरी तहसील के सिहावा नगरी के आदिवासियों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। 1 दिसंबर 1921 के अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन के बाद सिहावा-नगरी के आदिवासियों में राजनीतिक चेतना जागृत हुई। धमतरी नगर और आसपास के क्षेत्रों के उत्साही कार्यकर्ताओं ने आदिवासियों को अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया। ब्रिटिश सरकार ने जंगल में प्रवेश और जंगल के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था। सरकार के इस नादिरशाही रवैये से वनवासी असंतुष्ट थे। जनवरी 1922 में सिहावा नगरी के आदिवासियों ने वन कानूनों का उल्लंघन कर जंगल सत्याग्रह शुरू किया। यह आंदोलन आदिवासियों का था, यह उन वन अधिकारियों के खिलाफ था जो भोले-भाले आदिवासियों से बेगार लेते थे या कम मजदूरी पर काम कराकर उनका शोषण करते थे।

सत्याग्रही श्यामलाल सोम, पंचम सिंह, विशंभर पटेल और अन्य कर्मठ स्वयंसेवकों ने वन कानून का उल्लंघन कर जंगल सत्याग्रह शुरू किया सत्याग्रही नाथूराम को चार दिनों तक सिहावा थाने में रखा गया और 25 कोड़े मारे गए। अहमदाबाद अधिवेशन से लौटने के बाद पंडित सुंदरलाल शर्मा, नारायणराव मेघावले, नाथूजी जगताप अनेक कार्यकर्ताओं के साथ नगरी पहुँचे। उन्होंने सत्याग्रहियों को समझाया कि उनका सत्याग्रह अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी और प्रांतीय कांग्रेस कमेटी की स्वीकृति के बिना चलाया जा रहा है। इन दोनों कांग्रेस कमेटियों की स्वीकृति प्राप्त होने तक आंदोलन स्थगित रखा जाए। परिणामस्वरूप, नगरी सिहावा का सत्याग्रह स्थगित कर दिया गया। नगरी सिहावा में एक आम सभा आयोजित की गई जिसमें पंडित सुंदरलाल शर्मा, नाथूजी जगताप और नारायणराव मेघावले ने अपने भाषणों में सरकार के अत्याचारों की कड़ी निंदा की। परिणामस्वरूप, सत्याग्रही शांत हुए। सरकार ने वन विभाग की कार्यप्रणाली में सुधार किया और बेगार बंद कर दी गई। यह आंदोलन की एक महत्वपूर्ण सफलता थी।

चौरी-चौरा कांड का छत्तीसगढ़ पर प्रभाव – 5 फ़रवरी 1922 को चौरी-चौरी में भीड़ ने पुलिस थाना जला दिया जिसमें 12 पुलिसकर्मी जलकर मर गए। पूरे भारत में असहयोग आंदोलन ज़ोरों पर चल रहा था, लेकिन महात्मा गांधी इस हिंसक घटना से दुखी थे। उन्होंने 12 फ़रवरी 1922 को आंदोलन स्थगित कर दिया। 12 मार्च 1922 को गांधीजी को गिरफ्तार कर अहमदाबाद जेल में डाल दिया गया। इसका असर छत्तीसगढ़ में भी पड़ा। यहाँ भी सक्रिय आंदोलन स्थगित कर दिया गया। आंदोलन के नेता पं. सुंदरलाल शर्मा, नारायणराव मेघवाले, अब्दुल रऊफ़, भगवतीप्रसाद मिश्र आदि गिरफ्तार कर लिए गए।

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