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भारत छोड़ो आंदोलन में छत्तीसगढ़ की भूमिका, जाने विस्तार से

जब ब्रिटिश सरकार ने गांधीजी की मार्मिक अपीलों को अनसुना कर दिया तो अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक बंबई में बुलानी पड़ी। 7 और 8 अगस्त को बंबई में बैठक हुई, जिसमें देश के सभी प्रमुख नेता उपस्थित थे। सबकी निगाहें महात्मा गांधी पर थीं, जिनके हाथों में राष्ट्र ने अपना भविष्य सौंप दिया था। महात्मा गांधी के भारत छोड़ो प्रस्ताव पर व्यापक चर्चा हुई। 8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित हुआ। 8 अगस्त की शाम को भारत छोड़ो आंदोलन की महत्वपूर्ण घोषणा की गई। उन्होंने देशवासियों को ब्रिटिश शासन के विरोध में – भारत छोड़ो – का नारा और – करो या मरो – का मंत्र दिया। छत्तीसगढ़ के कई नेता मुंबई अधिवेशन में भाग लेने गए। इनमें पं. रविशंकर शुक्ल, घनश्याम सिंह गुप्त, महंत लक्ष्मीनारायणदास, सेठ शिवदास डागा, श्री यति यतनलाल, ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर शामिल थे जब वे बाहर आए तो उन्होंने पूरे बम्बई को आंदोलन और उथल-पुथल की स्थिति में पाया।

इस महत्वपूर्ण अधिवेशन से लौटते समय पंडित रविशंकर शुक्ल (पूर्व मुख्यमंत्री), पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र (पूर्व स्वायत्त शासन मंत्री), ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर, महंत लक्ष्मीनारायण दास, श्री यति यतनलाल, सेठ, शिवदास डागा, श्रीनारायण राव जी, दुर्गाशंकर मेहता (मध्य प्रदेश के पूर्व मंत्री) को 11.8.42 को शाम 4 बजे मलकापुर स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया। श्री पन्नालाल देवड़िया और उनकी पत्नी विद्यामती देवड़िया को रायपुर से लौटते समय गिरफ्तार कर लिया गया। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध नेता और मध्य प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष घनश्याम सिंह गुप्त को बम्बई से लौटते समय गिरफ्तार कर लिया गया। राष्ट्रीय और प्रांतीय नेताओं की गिरफ्तारी के बाद भारत छोड़ो का नारा हिंदुस्तान के आकाश में गूंजने लगा। यह आंदोलन देश के साथ-साथ पूरे छत्तीसगढ़ में फैल गया यह आंदोलन ब्रिटिशकालीन छत्तीसगढ़ के रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग जिलों में अग्रणी नेताओं के नेतृत्व में शुरू हुआ।

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