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सरगुजा रियासत का रोचक इतिहास: रक्तरंजित सत्ता संघर्ष से ब्रिटिश हुकूमत तक

Chhattisgarh इतिहास : सरगुजा रियासत 6.055 वर्ग मील क्षेत्र में फैली हुई थी। इसके प्राचीन इतिहास के बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है। इसका प्राचीन नाम दण्डोरा माना जाता था। ब्रिटिश शासनकाल में यह रियासत सरगुजा के नाम से जानी जाती थी। सरगुजा रियासत पर शासन करने वाले राजवंश को रक्सेल राजपूत राजवंश कहा जाता है। विष्णु प्रसाद सिंह सरगुजा रियासत के संस्थापक राजा थे। उन्होंने आसपास के क्षेत्रों को जीतकर राज्य का विस्तार किया तथा रामगढ़ पर्वत पर एक सुदृढ़ किला बनवाया। इस रियासत का क्रमबद्ध इतिहास शिवराज सिंह (1758-1788) के समय से उपलब्ध है। राजा शिवराज सिंह के शासनकाल के प्रारम्भ में मराठों ने सरगुजा पर आक्रमण कर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया। शिवराज सिंह ने मराठों की अधीनता स्वीकार कर ली तथा वार्षिक ताकुली देने का वचन दिया। 1788 में शिवराज सिंह की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र अजीत सिंह गद्दी पर बैठे। अजीत सिंह का कार्यकाल लगभग 9 वर्षों का था, उनके कार्यकाल में राज्य में शांति रही। अजीत सिंह की मृत्यु 1799 में हुई। तत्पश्चात उनके नाबालिग पुत्र बलभद्र सिंह अपनी माता के संरक्षण में सरगुजा राज्य के शासक बने। अजीत सिंह के सगे भाई लाल संग्राम सिंह की राजनीतिक महत्वाकांक्षा थी।

उनका राजनीतिक लोभ जागृत हो गया था। उन्होंने अपनी विधवा भाभी की हत्या कर दी और बलभद्र सिंह को गद्दी से उतार कर सरगुजा राज्य की गद्दी पर कब्जा कर लिया। लाल संग्राम सिंह के रक्तरंजित और क्रूर कृत्यों से प्रजा क्रोधित थी। प्रजा ने अंग्रेजों से हस्तक्षेप की मांग की। कर्नल जोन्स के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने सरगुजा में प्रवेश किया और लाल संग्राम सिंह को पराजित कर वहां से भगा दिया। अंग्रेजों की सहायता से बलभद्र सिंह शासक बने। वह नाबालिग थे, इसलिए राज्य संचालन का दायित्व जगन्नाथ सिंह को सौंप दिया गया। बलभद्र सिंह के शासनकाल में पहली बार सरगुजा राज्य पर अंग्रेजों का प्रभाव स्थापित हुआ। कर्नल जोन्स के पीठ फेरते ही लाल संग्राम सिंह सरगुजा आ गए, उन्होंने जगन्नाथ सिंह को संरक्षक पद से हटा दिया और बलभद्र सिंह पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया। कुछ समय बाद लालसांग्राम सिंह ने बलभद्र सिंह को कैद कर लिया। जगन्नाथ सिंह अपने पुत्र अमर सिंह को साथ लेकर अंग्रेजों की शरण में चले गए। 1813 में राजनीतिक एजेंट मेजर रफसेज सरगुजा आए। ब्रिटिश सेना ने बलभद्र सिंह को कैद से मुक्त कर दिया।

लालसांग्राम सिंह और उनके साथी सरगुजा से भाग गए। लालसांग्राम सिंह की बनारस में मृत्यु हो गई। चतुर्थ मराठा युद्ध 1818 में समाप्त हुआ। इस युद्ध के बाद सीतावन की संधि हुई। इस संधि के अनुसार भोंसले ने सागर, नर्मदा क्षेत्र, बरार क्षेत्र, सरगुजा और जशपुर रियासतें ब्रिटिश कंपनी को सौंप दीं। इस संधि के बाद सरगुजा पूरी तरह से अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया। 1820 में बलभद्र सिंह की बिना किसी संतान के मृत्यु हो गई सन् 1852 में अमर सिंह की मृत्यु के बाद बड़ी रानी के पुत्र इंद्रजीत सिंह गद्दी पर बैठे। विक्षिप्तता के कारण वे प्रशासन नहीं चला सके। ऐसी स्थिति में प्रशासन का भार विंधेश्वरी सिंह को सौंप दिया गया। सन् 1882 में इंद्रजीत सिंह की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद रघुनाथ शरण सिंह गद्दी पर बैठे। सन् 1895 में वायसराय लॉर्ड एल्गिन ने राजा रघुनाथ सिंह को महाराजा बहादुर की उपाधि से विभूषित किया। सन् 1899 में वायसराय लॉर्ड कर्जन ने एक सनद प्रदान की और सामंती शासन को स्वीकार किया। राजा रघुनाथ शरण सिंह के कार्यकाल में सरगुजा रियासत को बंगाल प्रांत से अलग कर मध्य प्रदेश में स्थानांतरित कर दिया गया। इस अवसर पर वायसराय लॉर्ड मिंटो ने 23 सितंबर 1905 को एक नई सनद प्रदान की। सन् 1917 में रघुनाथ शरण सिंहदेव की मृत्यु हो गई। तत्पश्चात उनके पुत्र रामानुजशरण सिंह का राज्याभिषेक हुआ। गद्दी मिलने की खुशी में उन्होंने ब्रिटिश सरकार को बहुत सारा धन दान में दिया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान महाराज रामानुजशरण सिंहदेव ने उदारतापूर्वक धन से सहायता की। इस सेवा के लिए उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य के सेनापति की उपाधि दी गई।

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