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सारंगढ़ रियासत का इतिहास: आदिपुरुष नरेन्द्र साय से भारत संघ में विलय तक की गाथा

इस रियासत का आदिपुरुष व संस्थापक नरेन्द्र साय था उसने लांजी नामक स्थान से आकर सारंगढ़ में राज्य स्थापित किया था। उसके बाद क्रमशः धार हम्मीर, नार्बर साय, धनजी उदयभान, वीरभान, ऊद्या साय, कल्याण साय (1736-1777) गद्दी पर आसीन हुए। कल्याण साय ने मराठों की सहायता की थी। रघुजी भोंसले ने उसे ‘राजा’ की उपाधि से विभूषित किया था। कल्याण साय का उत्तराधिकारी विश्वनाथ साय (1778-1808) हुआ। उसने 1781 में सम्बलपुर के शासक चैत सिंह को गद्दी पर बिठाने में सहयोग किया। चैत सिंह ने खुश होकर ‘सरिया’ परगना उपहार स्वरूप प्रदान किया था। सन् 1778 में अलैकनैन्डर इलियट को वारेन हेरिस्टग्ज ने विशेष कार्य से नागगापुर भेजा था। वह सांरगढ़ क्षेत्र में ज्वर से पीड़ित होकर मर गया। विश्वनाथ साय ने अलैक्जेंडर इलियट का शव ‘सालर’ नामक गांव में दफनाया था जो आज भी वहां स्थित है तथा विश्वनाथ साय की उदारता व दयालुता की कहानी अभी भी कह रहा है।

विश्वनाध साय के पश्चात सुभद्र साय (1827-1828) गजराज सिंह (1828-1839) क्रमशः शासक बने। विश्वनाथ साय के पश्चात कोई भी शासक उल्लेखनीय नहीं कहे जा सकते । सन् 1830 में संग्राम सिंह सारंगढ़ रियासत का योग्य व उल्लेखनीय शासक बना। उसके कार्यकाल में सारंगढ़ पर भोंसले का प्रभाव समाप्त हो गया और यह रियासत ब्रिटिश आधिपत्य में चली गई। राजा संग्राम सिंह ने 1857 की क्रांति के समय ब्रिटिश सरकार को सहयोग व समर्थन दिया था। उसने स्वतंत्रता संग्राम नेता कमलसिंह को बंदी बनाकर ब्रिटिश सरकार के सुपुर्द किया था। उसके इस कृत्य को स्वतंत्रता संग्रामियों ने देशद्रोह माना था। सन् 1872 में संग्राम सिंह की मृत्यु के बाद भवानी प्रतापसिंह (1872-1889) रघुवर सिंह) 1889-1890) सारंगढ़ रियासत के सामंतीय शासक बने, पर ये उल्लेखनीय शासक नहीं थे। सन् 1890 में रघुवर सिंह का पुत्र जवाहर सिंह गद्दी पर बैठा परंतु उसके नाबालिग होने के कारण 1909 तक राज्य का शासन ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त दीवान द्वारा किया जाता रहा। 3 नवम्बर 1909 को राजकुमार कॉलेज में ‘सामंत’ शासक के रूप में उसे राज्याधिकार के साथ सत्तारूढ़ किया गया। ब्रिटिश सरकार ने उसे 3 जून 1918 को ‘राजा बहादुर’ एवं 3 जून 1934 को सीआईई की उपाधि प्रदान की। 11 जनवरी 1946 को राजा जवाहर सिंह का स्वर्गवास हो गया। राजा जवाहर सिंह के निधन के बाद 21 अप्रैल 1946 को राजा नरेश सिंह सारंगढ़ की गद्दी पर बैठे। वे अधिक समय तक शासन नहीं कर पाए। 20 माह बाद सारंगढ़ रियासत भारत संघ में शामिल हो गयी।

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