मानव होना पर्याप्त नहीं — मानवता को जीना ही असली उद्देश्य

वैज्ञानिकों से लेकर अध्यात्मवेत्ताओं– प्रत्येक के लिए मनुष्य का जीवनोद्देश्य एक गंभीर चिंतन एवं विमर्श का विषय है। वर्तमान परिस्थितियों में, जब मानवीय जीवन भाँति-भाँति की समस्याओं, आशंकाओं से घिरा हुआ दिखाई पड़ता है- यह प्रश्न और भी ज्यादा सामयिक एवं महत्त्वपूर्ण हो जाता है। इसमें दो मत नहीं कि प्राणिजगत् में मनुष्य को एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है।मनुष्य अन्य प्राणियों से वरिष्ठ भी है और उनकी तुलना में असाधारण योग्यताओं एवं प्रतिभाओं का धनी भी है। यही कारण हैं जिनके कारण मानवीय दायित्वों में उत्कृष्टता, शालीनता, सभ्यता एवं सुसंस्कारिता नैसर्गिक रूप से समाविष्ट हो गए हैं। स्वतंत्र-स्वच्छंद दिखते हुए भी मनुष्य को अनेकों व्यक्तिगत, नीतिगत एवं सामाजिक मर्यादाओं, अनुशासन का पालन करना ही पड़ता है।जहाँ एक ओर उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह मर्यादाओं का परिपालन करे तो वहीं अनेकों ऐसे कुकृत्य हैं, जिनके विषय में उससे यह अपेक्षा है कि वह उनसे दूर रहे। उनको अपनाने पर कानून से लेकर कर्म व्यवस्था, सभी उसके ऊपर अपना शिकंजा कसते दिखाई पड़ते हैं। व्यक्ति शारीरिक रूप से समर्थ हो, बलवांन हो या बौद्धिक क्षमता का धनी हो अथवा आर्थिक रूप से संपन्न हो-इन सबके आधार पर सुख-सुविधा की प्राप्ति संभव है।
सामाजिक रूप से इनका मूल्य एक निश्चित सीमा तक ही है-उसके बाद इनका भी बहुत महत्त्व नहीं रह जाता है।व्यक्ति यदि अशिष्ट हो, असभ्य हो, दुर्गुणी हो, दुर्व्यसनी हो तो ऐसे में वह स्वयं के अतिरिक्त दूसरे अनेकों के लिए कष्ठ-कठिनाई का कारण बनता है। इसी को कुछ ऐसे भी कहा जा सकता है कि इस संसार में मनुष्य जैसे दिखने वाले, उसकी तरह क्रियाकलाप करने वालों की संख्या अरबों में है, पर यदि उनके भीतर मानवोचित उत्कृष्टता का समावेश न हो सका तो ऐसा समझना चाहिए कि वे धरती पर भार बनने के अतिरिक्त और कुछ न * कर सके। यदि मनुष्य सुविधासंपन्न हो गया, परंतु संस्कारों की दृष्टि से शून्य बना रहा और उसके चिंतन में निकृष्टता ही बसती रही तो ऐसा जीवन कलंक के समान ही रह जाता है। शारीरिक यात्रा की दृष्टि से देखें तो मनुष्य की जीवनयात्रा भी अन्य प्राणियों की तरह ही होती है। पैदा होते ही किसी में सभ्यता, शिष्टता आ जाती हो-ऐसा कहाँ होता है ? मात्र पेट भर लेने की एवं प्रजनन कर लेने की क्षमता ही नैसर्गिक रूप से प्राप्त हो पाती है। ऐसे मनुष्य को अनगढ़ ही कहा जाता है। उसके अंदर सुगढ़ता का समावेश तब होता है, जब उसका चिंतन, व्यवहार, आचरण, मर्यादाएँ इत्यादि मानवोचित गरिमा के अनुरूप कार्य करते दिखाई पड़ते हैं।
स्मरण रखने योग्य तथ्य यही है कि मनुष्य असामान्य है। उसे परमात्मा का वरदपुत्र कहकर पुकारा जाता है और ऐसा कहने के पीछे का आशय यह है कि उसे यह दायित्व सौंपा गया है कि परमात्मा के इस विश्व उद्यान को अधिक सुंदर-समुन्नत बनाने, उत्तम उत्कृष्ट बनाने का प्रयत्न करे। इसीलिए जिसे मानवोचित गरिमा कहकर पुकारा जाता है, वह सुसंस्कारिता के साथ जुड़ी हुई है। इसी के आधार पर व्यक्ति सराहना या भर्त्सना का कारण बनता है। परमपूज्य गुरुदेव ने अनेक स्थानों पर ऐसा कहा व लिखा है कि मनुष्य भटका हुआ देवता है। यदि उसके जीवन के भटकावों पर नियंत्रण लाया जा सके तो वह आत्मसंतोष एवं लोक-कल्याण के संसार की संरचना कर सकता है।सही कहा जाए तो मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप ही है। स्वर्गीय या नारकीय परिस्थितियों का निर्माण वह अपनी मनोभूमि के आधार पर ही करता है। यदि उसके जीवन को सही दिशा मिल सके एवं वह सही राह पर सही रीति-नीति अपनाते हुए चल सके तो वह स्वयं का उद्धार करने के अतिरिक्त अनेकों को भवसागर से पार करने का कारण बन सकता है।
मनुष्य के व्यक्तित्व में उत्कृष्टता के समावेश की इसी प्रक्रिया को भारतीय विचारकों ने संस्कार परंपरा का नाम दिया था। यदि उसे उसी उद्देश्य के साथ लागू किया जा सके, जिस उद्देश्य के साथ उस परंपरा की स्थापना की गई तो उसके प्रभाव एवं परिणाम अत्यंत उपयोगी, महत्त्वपूर्ण एवं श्रेयस्कर हो सकते हैं। प्राचीनकाल में इस साधारण-सी दिखने वाली प्रक्रिया ने ही जनमानस के परिष्कार का महान कार्य संभव कर दिखाया था। व्यक्तियों का समुदाय ही तो समाज कहलाता है और व्यक्ति का विकास, उसकी अपनी मनःस्थिति के आधार पर ही तो निर्धारित होता है। अंतःकरण की गरिमा ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का आधार बनती है। इसीलिए अंतःकरण पर छा रही मलिनता को समय रहते स्वच्छ-निर्मल बनाने का कार्य संस्कार-प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता रहा था।यही कारण था कि सुसंस्कारिता का संवर्द्धन मानवीय विकास का अभिन्न अंग माना गया। इसी आशय को ध्यान में रखकर षोडश संस्कारों की परंपरा बनाई एवं चलाई गई थी। आज भी व्यक्तित्व को निखारने के लिए, प्रतिभा को उभारने के लिए एवं मनुष्य की गरिमा का स्तर ऊँचा करने के लिए संस्कारपद्धति की उपयोगिता यथावत् है।
अब बात संस्कारों की आती है तो इनका उद्देश्य मात्र कर्मकांड का क्रियाकृत्य करना नहीं है। संकेतों को क्रिया रूप में उतारने के लिए परिस्थितियों के अनुरूप बहुत कुछ सोचने एवं करने की आवश्यकता पड़ती है। ये समझने एवं बताने के लिए गंभीर आध्यात्मिक सोच की आवश्यकता वर्तमान समय में पड़ती है। इसी को ध्यान में रखकर परमपूज्य गुरुदेव ने शांतिकुंज को युग संस्कारपद्धति के पुनर्जीवन का केंद्र बनाया। यही कारण था कि उन्होंने एक परिष्कृत संस्कारपद्धति का निर्धारण किया। इसमें पहला महत्त्वपूर्ण कार्य यह था कि संस्कारों की संख्या को घटाया जाए।पूज्य गुरुदेव ने कहा कि भारत में औसतन 5-6 व्यक्तियों के परिवार होते हैं, यदि प्रत्येक व्यक्ति 16 संस्कार करे तो 96 के करीब संस्कार होते हैं और इतने सारे आयोजनों को संपन्न कर पाना एक औसत भारतीय परिवार के लिए लगभग नामुमकिन होता है। यह सोचकर उन्होंने प्रसूति के समय के संस्कारों में से जातकर्म इत्यादि को हटाकर पुंसवन के रूप में एक महत्त्वपूर्ण संस्कार करने को कहा। साथ ही नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन इत्यादि संस्कारों का समन्वयन करने को कहा।
आवश्यक एवं बड़े संस्कारों में परमपूज्य गुरुदेव ने तीन को महत्त्वपूर्ण माना-यज्ञोपवीत, विवाह एवं वानप्रस्थ। इन तीनों को तीन महत्त्वपूर्ण उद्देश्यों का निमित्त कहा जा सकता है। यज्ञोपवीत संस्कार एक तरह से दूसरे जन्म या द्विजत्व का प्रतीक है। मानवता की गरिमा सभ्यता तथा संस्कृति इसी से आते हैं और इन्हें ही दूसरी भाषा में लोक व्यवहार तथा दृष्टिकोण में समाहित उत्कृष्टता भी कहा जा सकता है।इस संस्कार के माध्यम से बालक के अतिरिक्त उपस्थित समुदाय को यह चिंतन प्रदान करने का भाव है कि इन गुणों का अनुपालन कैसे किया जाए? देवालयों की साक्षी में, अग्निदेव के सान्निध्य में, श्रद्धासिक्त वातावरण में तथा वरिष्ठ-सम्माननीय व्यक्तियों की उपस्थिति में जब ये प्रतिज्ञाएँ बालक धारण करता है तो जीवन में नई संभावनाओं का पथ निश्चित रूप से प्रशस्त होता है।आवश्यक संस्कारों के क्रम में परमपूज्य गुरुदेव ने यज्ञोपवीत के बाद विवाह को सम्मिलित किया। विवाह का पवित्र संस्कार एक तरह से दो आत्माओं का एकीकरण है।
सम्मिलित जीवन को कैसे, किन आदर्शों के साथ जिया जाए, एकदूसरे के जीवन क्रम में अधिक-से-अधिक सहायक कैसे बना जाए, गृहस्थ जीवन को तपोवन कैसे बनाया जाए-इन सारी शिक्षाओं को आत्मसात् करने की प्रेरणा देने के लिए विवाह संस्कार का क्रम संपन्न किया जाता है। इसके बाद परमपूज्य गुरुदेव ने वानप्रस्थ संस्कारों का क्रम आरंभ किया।वर्णाश्रम व्यवस्था में आधा जीवन निजी और आधा जीवन पारमार्थिक प्रयोजनों में नियोजित होना चाहिए। इसके सुनिश्चित अनुपालन से ही सुयोग्य, अनुभवी, निस्पृह, कार्यकर्ता समाज को प्राप्त हो जाते थे, इसी के कारण जनमानस में उत्कृष्टता का बोध करने वाली चेतना विद्यमान रहती थी। परमपूज्य गुरुदेव ने शांतिकुंज को युगतीर्थ का नाम प्रदान किया, ताकि इन सारे संस्कारों का सामयिक दृष्टि से प्रतिपादन करते हुए इस महत्त्वपूर्ण विधा एवं विद्या का पुनर्जीवन संभव हो सके। परमपूज्य गुरुदेव ने प्रथम वर्ग के संस्कारों में पुंसवन, नामकरण, मुंडन को रखा, द्वितीय वर्ग में यज्ञोपवीत, विवाह और वानप्रस्थ को स्थान दिया तो वहीं तीसरे वर्ग में अंत्येष्टि, श्राद्ध-तर्पण इत्यादि संस्कारों को नियोजित किया। आज के परिप्रेक्ष्य में इस संस्कार परंपरा को गतिशील रखना हमारी महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी हो जाती है।
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