छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक जमींदारी: गंडई, सहसपुर लोहाराः और पानाबरस की कहानी

गंडई :- इस जमींदारी का कुल क्षेत्रफल 166 वर्गमील था, इसमें से 46 वर्गमील वनों से आच्छादित था। गंडई जमींदारी के अंतर्गत 86 गांव आते थे। लगभग 650 वर्ष पूर्व गढ़ा मण्डला के राजा ने लिंगाधीर घुरगोड नामक एक सरदार को यह जमींदारी प्रदान की थी। इसी वंश में मुखीसिंह जमींदार हुए। उसने गंडई जमींदारी को अपने तीन पुत्रों में बांट दिया। बड़े पुत्र गुरनामसिंह को गंडई का क्षेत्र, मझले पुत्र को सिल्हाटी का तथा छोटे पुत्र को बरबसपुर का हिस्सा प्राप्त हुआ। सन् 1828 को नागपुर दरबार ने इस बंटवारे को स्वीकृति भी दे दी थी। सन् 1828 के बाद तीनों क्षेत्र गंडई, सिल्हाटी और बरबसपुर अलग-अलग जमींदारी बन गए। बख्तसिंह, तरवरसिंह, रणधीर सिंह इस जमींदारी के प्रमुख उल्लेखनीय जमींदार थे।
सहसपुर लोहाराः- इस जमींदारी का क्षेत्रफल 146 वर्गमील था। इसके अंतर्गत88 गांव थे। यह जमींदारी मूलतः कवर्धा राज्य में थी। बाद में महाबली सिंह के पुत्र बैजनाथसिंह को देकर कवर्धा से पृथक जमींदारी बना दी गई। सहसपुर लोहारा के संबंध में यह कहा जाता है कि इसका नामकरण हैह्रय वंश के आदिपुरूष या संस्थापक सहस्त्रार्जुन नाम पर किया गया था।
पानाबरस :- पानाबरस जमींदारी का कुल क्षेत्रफल 345 वर्गमील और ग्रामसंख्या 263 थी। यह एक बड़ी जमींदारी थी। यह कहा जाता है कि इस जमींदारी का संस्थापक पुरूष एक वीर सेनापति था। उसने चान्दा के तत्कालीन राजा को सैन्य सहायता दी थी। उसी सैन्य सहायता के बदले यह क्षेत्र उसे प्रदान किया गया था। सन् 1818 में अप्पासाहब भोंसले और अंग्रेजों के बीच संघर्ष हुआ। उस समय पानाबरस के जमींदार निजामशाह ने अप्पासाहब भोंसले को सहयोग दिया था। अपासाहब के पतन के पश्चात निजाम शाह अंग्रेजों के शरण में चला गया। उसने क्षमायाचना करके ब्रिटिश राज की स्वामिभक्ति का वचन दिया। इसलिए अंग्रेजों ने उसे जमींदारी का स्वामी स्वीकार कर लिया। इस जमींदारी के एक लोकप्रिय शासक लालश्याम शाह हुए। जमींदारों के विलय के पश्चात स्वतंत्र भारत में उन्होंने अपना पूरा जीवन सत्ता के विरूद्ध संघर्ष में बिताया था। वे आदिवासियों के हितचिंतक थे।
खुज्जी :- इस जमींदारी का क्षेत्रफल 63 वर्गमील था और इसमें 33 गांव आते थे। इस जमींदारी की स्थापना 200 वर्ष पूर्व हुई थी। यह एक नयी जमींदारी थी। खुजी जमींदारी का संस्थापक एक मुस्लिम सैनिक शेर खॉ था। शेर खाँ बड़े न्यायप्रिय चरित्रवान और सभ्य जमींदार थे।
अम्बागढ़ चौकी :- इस जमींदारी का क्षेत्रफल 250 वर्गमील था। एक हजार वर्षों से खालुलवार गोंड वंश के राजा इस जमींदारी में राज्य करते थे। यहां के संस्थापक मण्डला नरेश के रिश्तेदार थे। रघुजी भोंसले प्रथम के समय यहां दलपत शाह जमींदार थे। अनेक बार भोंसले ने अपना प्रभाव स्थापित करने के लिए आक्रमण किया पर उसे सफलता नहीं मिली। अंततः भोंसले शासक ने यह घोषणा कर दी कि यदि दलपत शाह नागपुर आकर भेंट की तो उसे विधिवत जमींदारी का स्वामी मान लिया जाएगा। दूरदर्शी व कुशल राजनीतिज्ञ शेर खाँ ने दलपतशाह और रघुजी के बीच समझौता कराने का निर्णय लिया। उसके प्रयास से दलपत शाह नागपुर जाकर रघुजी प्रथम से मिले। रघुजी ने अपनी घोषणानुसार दलपत शाह को अम्बागढ़ चौकी जमींदारी का स्वामी मान लिया। शेर खां को भी उसके कार्य के लिए पुरस्कार स्वरूप खुज्जी की जमींदारी प्रदान की गई।
सोनाखान :- इस जमींदारी के जमींदार बिंझवार जाति के थे। इसकी स्थापनारतनपुर के कलचुरि शासक वाहरसाय के कार्यकाल में सन् 1490 ई. में बिसई बिंझवार ने की थी। उसने अपनी सैनिक शौर्यता के पुरस्कार स्वरूप यह जमींदारी प्राप्त की थी। सोनाखान जमींदारी के जमींदार रामाराय ने 1819-20 में अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह किया था। उसके विद्रोह को निर्ममतापूर्वक दबा दिया गया। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय उसके उत्तराधिकारी नारायणसिंह ने आदिवासियों के साथ मिलकर सशस्त्र विद्रोह किया था। सन् 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने यह जमींदारी समाप्त कर दी थी। वीर नारायण सिंह की गणना भारत के पारक्रमी शहीदों में होती है।
बिलाईगढ़ :- इस जमींदारी का क्षेत्रफल 112 वर्गमील था, इसके अन्तर्गत 14ग्राम थे। यहां के जमींदार गोंड जाति के थे। रतनपुर के कलचुरि शासक ने 18 वीं सदी में मांझी मेखार को तीर्थयात्रियों की सुरक्षा के लिए यह भू-भाग प्रदान किया था। मांझी की मृत्यु के बाद जमींदारी दो भागों में बंट गयी। एक भाग मांझी के ज्येष्ठ पुत्र गुमान सिंह ने ले लिया, उसे कटंगी का हिस्सा मिला तथा एक भाग उसके भाई मुखीराम को मिला । इसके भाग में बिलाईगढ़ का हिस्सा आया।
कटंगी:- इस जमींदारी का कुल क्षेत्रफल 57 वर्गमील था। इसके अंतर्गत 43 ग्राम थे। 1857 की क्रांति के समय यहां के जमींदार ने देशद्रोह करते हुए नारायण सिंह के विरूद्ध अंग्रेजों को रसद व सैन्य सामग्री देकर सहायता पहुंचाई थी।
कौड़िया :- इस जमींदार का क्षेत्रफल 295 वर्गमील था। इसके अंतर्गत 155 गांव आते थे। बहुत समय तक यहां का जमींदार ताहुतदार था। बाद में जमींदारी के रूप में परिवर्तित कर दिया गया।
सुअरमार :- वनों से आच्छादित सुअरमार जमींदारी जोंक नदी के पश्चिम में स्थितथी। इस जमींदारी का क्षेत्रफल 199 वर्गमील था तथा इसमें 102 गांव आते थे। कहा जाता है कि पहले यहां पर सौरा जाति का अधिकार था, इससे इसका नाम संवरमाल पड़ा जो बिगड़ते-बिगड़ती सुअरमार हो गया। जमींदारी की स्थापना के संबंध में किवदन्ती में कहा जाता है कि इस जमींदारी का आदि पुरूष पुरनराय था, उसने एक आतंकी सुअर को मार कर जमींदारी की स्थापना की थी। इसी कारण यह क्षेत्र सुअरमार या सुअरमाल कहलाया।
नर्राः- यह एक छोटी जमींदारी थी, इस जमींदारी का कुल क्षेत्रफल 21 वर्गमील था, और इसके अंतर्गत गांवों की संख्या 16 थी। यह भू-भाग खरियार जमींदारी का हिस्सा था, जिसे 270 वर्ष पूर्व जमींदार ने अपनी पुत्री को दहेज में दिया था। हेविट सेटलमेंट रिपोर्ट में यह उल्लेखित है कि यहां का जमींदार कंवर जाति का था।
देवरी :- यह एक पुरानी जमींदारी थी। इस जमींदारी के वंशज बिंझवार जाति के थे। देवरी और सोनाखान जमींदारी के बीच पारिवारिक संबंध थे। देवरी जमींदारी का कुल क्षेत्रफल 82 वर्गमील था। इस जमींदारी के अंतर्गत 37 गांव थे। 1857 की क्रांति के समय देवरी के जमींदार महाराज साय ने देशद्रोह किया। उसने नारायण सिंह के विरूद्ध अंग्रेजों को आर्थिक और सैनिक सहायता दी थी।
फिंगेश्वर :- इस जमींदारी के जमींदार गोंड जाति के थे। इसका क्षेत्रफल 169 वर्गमील का था और इसके अंतर्गत 86 गांव थे। यह एक प्राचीन जमींदारी थी। 16 वीं शताब्दी में रतनपुर के हैहय वंशीय राजाओं ने जमींदारी की जो सूची तैयार की थी उसमें इस जमींदारी का उल्लेख हुआ है।
गुण्डरदेही :- यह जमींदारी पुरानी जमींदारी थी। यहां के जमींदार कंवर जाति के थे। गुण्डरदेही जमींदारी हैहय वंशीय शासकों द्वारा स्थापित की गई थी। माखनसिंह, भीषमसिंह इसके प्रमुख स्वामी रहे हैं। यह एक छोटी जमींदारी थी। इसका क्षेत्रफल 83 वर्गमील था और इसके अंतर्गत 48 ग्राम आते थे।
भटगांव :- इस जमींदारी का क्षेत्रफल 64 वर्गमील था और गांवों की संख्या 60 थी। भटगांव जमींदार बिंझवार जाति के थे। इस परिवार के व्यक्ति गोपालराय रतनपुर नरेश कल्याणसाय के साथ मुगलदरबार में गए थे। उसका भतीजा विजाती राय था। वह रतनपुर का परित्याग कर भटगांव आ गया। उसने अपने पुत्र यादवराव को सम्बलपुर भेजकर भटगांव जमींदारी प्राप्त की थी। यादवराव, घासीराय, देवराय, दरियाबसिंह, दशमंतसिंह , गजराजसिंह, उजियारसिंह, दुबराजसिंह, चन्दनसिंह इस जमींदारी के जमींदार थे।
परपोड़ी :- इस जमींदारी का क्षेत्रफल 28 वर्गमील था। इसमें 24 गांव सम्मिलित थे। यहां के जमींदार धमधा के गोंड राजा के वंशज थे। 18 वीं शताब्दी में परपोड़ी जमींदार ने विद्रोह किया। उसके विद्रोह का दमन कर मराठों ने यह जमींदारी राजपूत परिवार को सौंप दी थी।
सिल्हाटी :- यह जमींदारी गंड़ई जमींदारी का एक भाग था। इसका क्षेत्रफल 55वर्गमील था और इसमें 30 गांव थे।
बरबसपुर :- यह जमींदारी भी सिल्हटी जमींदारी की तरह गंडई जमींदारी का एक भाग था। इसका क्षेत्रफल 32 वर्गमील था। यहां के जमींदार को ठाकुर की पदवी दी गई थी।
आँधी :- इस जमींदारी का क्षेत्रफल 81 वर्गमील था। इसमें 43 गांव थे। पूर्व में यह जमींदारी पानाबरस जमींदारी में थी। पानाबरस जमींदार परिवार के व्यक्ति को यह बंटवारे में प्राप्त हुई थी।
पण्डरिया :- पण्डरिया जमींदारी के अंतर्गत 283 गांव थे। कवर्धा व पण्डरिया के शासक परस्पर पारिवारिक संबंधी थे। कोई उत्तराधिकारी न होने पर कवर्धा रियासत में पण्डरिया जमींदार के छोटे लड़के को गोद लेने की प्रथा थी।
ठाकुरटोलाः- यह खैरागढ़ के पूर्व में स्थित एक पुरानी जमींदारी थी। इस जमींदारी में 81 गांव थे तथा इसका क्षेत्रफल 187 वर्गमील था। ठाकुरटोला जमींदारी परिवार नरसिंहपुर की और पोहरा के गोंड जमींदार परिवार से संबंध रखता था।इस जमींदारी का क्षेत्रफल का 544 वर्गमील था। इसके अंतर्गत 109 ग्राम थे यहां के जमींदार परिवार का संबंध पेण्ड्रा के जमींदार परिवार से था।
पेण्ड्रा :- इस जमींदारी का क्षेत्रफल 774 वर्गमील था और इसके अंतर्गत 225 गांव आते थे। यह जमींदारी रतनपुर के कलचुरि शासक ने हिन्दू सिंह और छिन्दु सिंह को उनकी ईमानदारी पर प्रदान की थी।
उपरोड़ा:- इसमें 86 गांव शामिल थे और इसका क्षेत्रफल 448 वर्गमील था। यह एक पुरानी जमींदारी थी। मराठा शासनकाल में अजमेरसिंह एवं शिवसिंह इसके जमींदार थे।
केन्द्राः- केन्दा जमींदारी का कुल क्षेत्रफल 298 वर्गमील था। इस जमींदारी के अंतर्गत 92 गांव थे। यहां के जमींदार का पद ‘ठाकुर’ था।
लाफा:- लाफा जमींदारी का क्षेत्रफल 359 वर्गमील था और इसके अंतर्गत 86 ग्राम शामिल थे। यहां के जमींदार का पद दीवान था। इस जमींदारी क्षेत्र में पाली का मंदिर, ‘तुम्मान’ चतुरगढ़ का किला, लाफागढ़ का खण्डहर स्थित था।
छुरी:- छुरी जमींदारी 339 वर्गमील क्षेत्र में विस्तीर्ण एक पुरानी जमींदारी थी।इस जमींदारी में 143 गांव आते थे। यहां का जमींदार परिवार कंवर जाति का था तथा जमींदार का पद ‘प्रधान’ था। जिस समय भास्करपंत ने रतनपुर राज्य का आक्रमण किया उस समय राधोसिंह इस जमींदारी का जमींदार था। वह रतनपुर किले की रक्षा के लिए तैनात था, जिसे मराठों ने मार डाला था। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भुवनलाल सिंह जमींदारी के स्वामी थे। 1921 के जनगणना के अनुसार इस जमींदारी की जनसंख्या 28.159 थी। छुरी जमींदारी में कंवर, गोंड एवं बिंझवार जनजाति की बहुलता थी।
कोरबा:- यह जमींदारी 850 वर्गमील क्षेत्र में विस्तीर्ण थी तथा इसमें 342 गांव सम्मिलित थे। चीशम की सेटलमेंट रिपोर्ट से यह ज्ञात होता है कि रतनपुर के राजा वाहरसाय ने इसे 1520 ई. के लगभग सरगुजा नरेश से छीन लिया था। कोरबा के जमींदार परिवार का पारिवारिक संबंध उपरोरा एवं चाम्पा के जमींदार परिवार से था। यह ब्रिटिश कालीन बिलासपुर जिले की सबसे बड़ी जमींदारी थी। धनराजकुंवर इस जमींदारी की अंतिम शासिका थी। उनके पति जोगेश्वर सिंह की मृत्यु 1917 में हो गई थी।
कन्तेलीः- मुंगेली तहसील में कन्तेली जमींदारी स्थित थी जो कलचुरि काल मेंमदनपुर के नाम से प्रसिद्ध थी। रतनपुर के राजा कल्याणसाय के समय इस जमींदारी की स्थापना हुई थी, उसने पुखराज सिंह को जमींदारी प्रदान की थी। 1798 में जमींदार ठाकुर पत्तेसिंह ने भोंसला शासन से टक्कर ली उसे गिरफ्तार कर रतनपुर लाया गया। वहां पर सूबेदार केशव पंत ने उसे तोप से उड़ा दिया। इसी के वंशज संतोष सिंह ने अंग्रेजों से टक्कर ली थी। उसे गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया जहां उसका प्राणांत हो गया। इस जमींदारी के अंतर्गत 44 गांव थे। 1947 में लाल पुखराज सिंह इस जमींदारी के जमींदार थे।
चाम्पाः- यह जमींदारी 105 वर्गमील क्षेत्र में विस्तीर्ण थी, इसमें 64 ग्राम शामिल थे। इस जमींदारी की स्थापना कलचुरि शासक बाहर साय के कार्यकाल में हुई थी। उसने रामसिंह को जमींदारी क्षेत्र सैनिक सेवा के बदले प्रदान किया था। नेमसिंह, छत्रसाय, विश्वनाथसिंह, नारायणसिंह, प्रेमसिंह, रामशरणसिंह इस जमींदारी के प्रमुख जमींदार शासक थे।
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