प्रेरणा

अनमोल सम्पदा है कन्या

नारी को सांसारिक वस्तु समझना भौतिकवादी अर्थशास्त्र का प्रतिपादन है। विवाह के उपरांत कन्या पराए घर जाती है व साथ में विवाह के साथ कुछ दहेज की सौगात भी ले जाती है। इसके विपरीत वर सबकी सेवा करने वाली बहू. लाता है, स्व-अर्जित कमाई से घर की समृद्धि बढ़ाता है और बुढ़ापे का सहारा बनता है आदि विचारणाएँ ऐसी ही हैं; जैसे सांसारिक वस्तुओं का मोलभाव, जिनका कि मूल्यांकन उनकी उत्पादक शक्ति के आधार पर किया जाता है।विवाहोपरांत यदि अपनी कन्या किसी दूसरे के घर जाती है तो यह भी संभव है कि अपने पुत्र के विवाह में किसी दूसरे की कन्या का अपने घर आगमन हो। कन्या के रूप में एक हाथ विवाह के समय उसे विदा करते हैं तो दूसरे हाथ से किसी दूसरे के घर से उसे वधू के रूप में हम प्राप्त भी कर लेते हैं। एक दृष्टि से यह मात्र अदला-बदली ही हुई। ऐसा नहीं हैं कि हमारा अपना कुछ बहुमूल्य चला ही गया हो और उसके बदले कुछ न मिला हो। इसके अतिरिक्त यदि कन्याओं को समुचित विकास का अवसर नमिले तो वंशवृद्धि के लिए जो लालसा व्यक्त की जाती है, वह जड़-मूल से ही विनष्ट हो जाएगी।

वंश को चलाने का कठिन कार्य एकमात्र कन्या को ही वहन करना पड़ता है। पुरुष का तो उसमें अकिंचन योगदान ही होता है। शिशु को गर्भ में धारण करने से लेकर उसका भरण-पोषण एवं संरक्षण करना तो केवल नारी के जिम्मे ही रहता है। पुरुष तो इस सबमें दूरवर्ती भागीदार होता है। ऐसी दशा में पुत्र की कामना करने वाले, वंश को चलाने व बुढ़ापे की लकड़ी खोजने वालों को भी इस मनोकामना की पूर्ति के लिए नारी का ही अनुग्रह प्राप्त करना पड़ता है। संतान चाहे स्त्री हो या पुरुष – नारी के शरीर और अंतराल में से निकला अनुदान ही है। ऐसी समझ के उपरांत भी नारी को उपेक्षित समझा जाए और उसकी अवज्ञा की जाए यह चिंतन अदूरदर्शिता से भरा हुआ एवं एकपक्षीय ही कहा जा सकता है। घर में जब कन्या का जन्म होता है तो उदासी छा जाती है और जब पुत्र का जन्म होता है तो खुशियाँ मनाई जाती हैं व बधाइयाँ बाँटी जाती हैं। जीवन के दैनिक व्यवहार में भी कन्या के भोजन, वस्त्र, दुलार, शिक्षा, चिकित्सा आदि में कमी की जाती है। बच्चे वस्तुस्थिति को समझते हैं। विशेषतया भावनाओं का अंतर तो उनकी समझ में और भी जल्दी आ जाता है। अबोध समझी जाने वाली छोटी कन्याएँ भी ताड़ जाती हैं कि उनकी उपेक्षा की जा रही है और उन्हें बोझ समझकर पाला जा रहा है।ऐसी प्रतिक्रिया उनके मनोबल को गिराती है। उनमें आत्महीनता का बीजांकुर जमाती है। वे अपने को भाग्यहीन मानने लगती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि उनका व्यक्तित्व जिस स्तर तक उठ सकता था, वह उतना उठ नहीं पाता।

वे आजीवन दबी, कुचली, पिछड़ी, कमजोर मनोभूमि की बनी रहती हैं। जिस घर में जाती हैं, उस परिवार की भी उतनी सेवा-सहायता नहीं कर पातीं, जितना कि वे विकसित व्यक्तित्व को साथ लेकर जाने पर कर सकती थीं। शरीर से अपंग व्यक्ति की आधी शक्ति मारी जाती है। उसी प्रकार दबे-कुचले मन वाला व्यक्ति भी स्वाभाविक प्रतिभा का एक बहुत बड़ा अंश गँवा बैठता है।यह वैसी ही निर्दयता है, जैसा कि कुछ निष्ठुर भिखारी अपने बच्चों के अंग तोड़-मरोड़कर इस लायक बना देते हैं कि वे आजीवन भीख माँगें व उनके विकास के लिए उन्हें कोई जिम्मेदारी न उठानी पड़े। रोते-कलपते भाग्य को दोष देते वे भी अपने दिन काटें और हो सके तो असहाय मानकर लोग उनकी कुछ सहायता करें। कन्याके भरण-पोषण, शिक्षा-दीक्षा में की गई कटौती इसी प्रकार की बचत मानी जाती है। नारी का अवमूल्यन समूची मनुष्य जाति का अवमूल्यन है। नारी का व्यक्तित्व यदि दुर्बल रहने दिया गया तो वह जिस भी परिवार में जाएगी, जिस भी व्यक्ति के साथ रहेगी; वह उसकी उतनी सहायता न कर सकेगी, जितना कि विकसित होने पर वह कर सकती थी। उसकी विचारपद्धति कमजोर रहेगी और क्रियाकलाप * भी उपेक्षित ही रहेगा। वह ससुराल में जाकर भी न महत्त्वपूर्ण * हो सकेगी और न यशस्वी। उसे पाकर ससुराल पक्ष भी * उपेक्षित रही उस कन्या से उतने प्रमुदित नहीं होंगे, जितना कि उसके प्रतिभावान होने पर हो सकते थे। जिसके द्वारा अपेक्षा से कम लाभ मिलता है, उसका मान, मूल्यांकन भी कम होता है।

पिता के घर में मिली उपेक्षा ससुराल में भी साथ जाती है और जैसा अपमान पिता के घर सहना पड़ता था, वैसा ही ससुराल में भी सहना पड़ता है।फसल बोने, उगाने, सींचने, बड़ा करने की जिम्मेदारी तो अभिभावकों के घर में ही पूरी हो जाती है। ससुराल वाले तो केवल उन शुभ संस्कारों की फसल को काटने आते हैं। यदि बुवाई-सिंचाई, रखवाली में उपेक्षा बरती गई है तो उस फसल का समुचित लाभ काटने, बटोरने वालों को भी कैसे मिल सकता है और उनके द्वारा अपने भाग्य को कैसे सराहा जा सकता है ?यदि माता-पिता कन्या के जन्म को भाग्यहीनता का चिह्न मानते रहे हैं तो पड़ोसी, संबंधी, ससुराल वाले ही क्यों उसे भाग्यवान समझने लगे और क्यों सम्मान देने लगे। इस प्रकार अपनी कन्या का भविष्य अंधकारमय, गया-गुजरा बनाने की जिम्मेदारी प्रकारांतर से उन अभिभावकों पर ही आ पड़ती है, जिन्होंने उसे दुर्भाग्यसूचक माना और लड़के की तुलना में अपेक्षाकृत उपेक्षित व्यवहार किया।माता के लिए तो इस प्रकार की मान्यता और पक्षपातभरी नीति अपनाना और भी बुरा है। वह स्वयं भी एक नारी है। किसी नारी के ही गर्भ से पैदा हुई है। यह उसकी अपनी बिरादरी है।

देखा गया है कि समान गुण, स्वभाव वाले अधिक जल्दी घुल-मिल जाते हैं और एकदूसरे के साथ प्रसन्नता अनुभव करते हैं, सहायक बनते हैं। इसपरंपरा के अनुसार नारियों को अपने ही समान अन्य नारियों के उत्थान में सहयोगी होना चाहिए। पुरुष भले ही इस बात को अधिक महत्त्व न दें, पर स्त्रियाँ आसमान सिर पर उठा लेती हैं। दादी, चाची, ताई, बुआ आदि सबके मुँह पर उदासी छा जाती है। जननी को कोसती, लाँछन लगाती भी देखी जाती हैं। उन्हीं का अनुकरण पड़ोसी-संबंधी भी करते हैं। इस प्रकार उस जननी को उलटा लांछित होना पड़ता है, जिसने इतना कष्ट सहकर उस बालिका को जन्म दिया; जान जोखिम उठाई। ऐसे लाँछन को सरासर अत्याचार ही कहना चाहिए।कुछ वर्षों पहले किन्हीं विशेष वर्गों में कन्या को जन्मते ही मार देने का रिवाज था। अँगरेज सरकार ने इसके विरुद्ध कानून बनाया था। अब नया रिवाज चला है। नई मशीनें ऐसी आई हैं, जो गर्भनाल में ही भ्रूण के लिंग का पता लगा लेती हैं। इसका परीक्षण कराने वालों में से कितने ही ऐसे निष्ठुर अभिभावक होते हैं, जो कन्या का पता चलने पर उसका गर्भपात करा देते हैं।

यह भी एक प्रकार का कन्यावध ही हुआ। अल्प आयु में विवाह करके अपने धन को पराए आँगन में पटक देने जैसा हुआ। अभिभावक सोचते हैं कि उनके रोटी-कपड़े की बचत हुई। ससुराल वाले सोचते हैं कि बालकपन से ही काम में जुटेगी तो उसी ढाँचे में ढल जाएगी। बड़ी होने पर आनाकानी न करेगी। पढ़ने-पढ़ाने का झंझट भी न रहेगा, जिससे कुछ कह सकने या कर सकने की बात न सोच पाएगी और सिर न उठा पाएगी।जिस प्रकार घर में पालतू कबूतरों को पंगु बनाकर आँगन अथवा पिंजड़े में ही घूमने-फिरने तक की उनकी सीमा सीमित कर दी जाती है, ठीक उसी प्रकार नारी की संभावनाओं को सीमित करने के अनैतिक कृत्य में आमूलचूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है। हमें यह समझना होगा कि कन्या अनमोल निधि है। उसका यथोचित सम्मान के साथ पालन-पोषण करना चाहिए और उसके संस्कार एवं शिक्षा की समुचित व्यवस्था हम सभी की नैतिक जिम्मेदारी है।

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