प्रेरणा

क्या खाये ,क्यों खाये ,कैसे खाये

आहार के संबंध में ऋग्वेद में एक श्लोक है- न मा तमन्न श्रमन्नोत तन्द्रन्न, वोचाम मा सुनोतेति सोमम्। यो मे पृणाद्यो ददद्यो निबोधाद्यो, मा सुन्वन्तमुप गोभिरायत् ।। (ऋग्वेद 2/30/7)

अर्थात हे मनुष्यो ! जो खाद्य पदार्थ शरीर को शक्ति देता हुआ तृप्ति प्रदान करे, ओज, कांति और सुख दे, इंद्रियों को शक्ति प्रदान करे, जिससे इंद्रियाँ कर्मरूपी यज्ञ हेतु सक्षम रहें, वही सेवन योग्य है। अविच्छिन्न जिससे श्रम करने की शक्ति का ह्रास हो, आलस्य या नशा उत्पन्न हो, ऐसी औषधियों (खाद्य पदार्थों) का मत सेवन करो।मानव शरीर पर, मानव जीवन पर आहार का बहुत व्यापक प्रभाव है। आहार के बिना मानव जीवन संभव ही नहीं है। मानव शरीर का अस्तित्व ही आहार पर निर्भर है। बिना आहार के मानव शरीर में न तो प्राणबल संभव है और न ही शरीरबल। मनुष्य के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य दोनों में ही आहार का बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है और ग्रहण किए जाने वाले आहार (सात्त्विक, राजसिक व तामसिक आहार) के अनुरूप ही इनमें उतार-चढ़ाव आता रहता है। आहार से मन पर पड़ने वाले सूक्ष्मप्रभाव को देखकर हमारी भारतीय संस्कृति में खान-पान की शुद्धता को अत्यधिक महत्त्व दिया गया है।विकृत एवं अनियमित आहार केवल शरीर को ही बीमार नहीं करता, वरन मन को भी चंचल व उद्विग्न बना देता है। गरिष्ठ, तीखा, तला-भुना, डिब्बा बंद, बासी आहार लेने के अनेक दुष्प्रभाव हैं, जिनके कारण मनुष्य शरीर में कई तरह की बीमारियाँ पनपती हैं। देखा जाए तो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लगभग सभी बीमारियों का संबंध आहार से ही किसी-न-किसी रूप में होता है। आजकल प्रचलन में फास्ट फूड व जंक फूड की बहुतायत है, जिनके कारण भी कई तरह की नई बीमारियाँ मानव शरीर में पनप रही हैं।आहार हमारे जीवन की नैसर्गिक आवश्यकता है, अतः इसके बारे में कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्यों को जानना जरूरी * है। आहार का मुख्य उद्देश्य शरीर की क्षीणता की पूर्ति

करना और उसकी वृद्धि करना भी है। शिशु जिसका भार जन्म के समय मात्र 3-4 सेर होता है, वह धीरे-धीरे बढ़कर दो-डेढ़ मन का युवक बन जाता है तो यह आहार के द्वारा ही संभव होता है। मनुष्य का शरीर प्रतिक्षण कुछ-न-कुछ कार्य करता रहता है, गहरी नींद में सो जाने पर भी फेफड़े और हृदय अपना काम करते रहते हैं। इस कार्य के फलस्वरूप शरीर की कोशिकाओं के निर्माण का भार हमारी जीवनीशक्ति पर रहता है और यह कार्य आहार के माध्यम से ही संपन्न होता है।यदि किसी कारणवश शरीर को समय पर उपयुक्त आहार न मिले तो उसे थकावट और कमजोरी मालूम पड़ने लगती है और यदि निरंतर यही क्रम चले तो शरीर दुर्बल, क्षीण हो जाता है और अंत में प्राणों को धारण कर सकना भी कठिन हो जाता है। इसलिए शरीर के पोषण हेतु, स्वास्थ्य हेतु, उसे रोगमुक्त करने हेतु शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने हेतु व शरीर की क्रियाविधि सही ढंग से सुचारू करने हेतु पोषणयुक्त संतुलित आहार की आवश्यकता होती है।आहार के सामान्य गुणों को बताते हुए महर्षि सुश्रुत कहते हैं-

आहारः प्रीणनः सद्यो बलकृत् देहधारकः । आयुस्तेजः समुत्साहस्मृत्योजो ऽग्निविवर्द्धनः ।॥अर्थात आहार शरीर को पुष्ट करने वाला, बलकारक, देह को धारण करने वाला, आयु, तेज, उत्साह, स्मृति, ओज और अग्नि को बढ़ाने वाला होता है। अतः आहार के संबंध में मुख्य पाँच सूत्रों को जानना बेहद जरूरी है-

(1) क्या खाएँ ?(2) कितना खाएँ ?(3) कब खाएँ ?(4) क्यों खाएँ ?(5) कैसे खाएँ ?

(1) क्या खाएँ ? हम केवल उन चीजों को खाएँ, जो शरीर का पोषण करने वाली हों। यह बात सदैव याद रखनी चाहिए कि भोजन स्वास्थ्य की जरूरत है, स्वाद की नहीं।

2) कितना खाएँ ? मिताशी स्यात् यानी थोड़ी ही मात्रा में खाएँ। खाद्य पदार्थ कितने ही पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्द्धक हों, यदि उनका सेवन उचित मात्रा में नहीं किया गया तो वे हानिकारक सिद्ध होते हैं। अतः भोजन इतना अधिक न खाया जाए कि मुँह से डकार के साथ बाहर आने लगे और न ही इतना कम खाया जाए कि शरीर को पोषण ही न मिले।

(3) कब खाएँ ? भोजन अग्निहोत्र की भाँति दो ही समय करना चाहिए। प्रथम भोजन 12 बजे से पूर्व तथा दूसरा भोजन सायंकाल 7 बजे तक कर लेना चाहिए। आयुर्वेद में भी दो बार भोजन करने का विधान है। अपने भोजन का समय निश्चित और उचित मात्रा में करने से भोजन समय से पच जाता है। अतः भोजन दिन भर में अधिक-से-अधिक दो बार और वह भी कड़ी भूख लगने पर करना चाहिए। जब-तब खाते रहना, नियमित भोजन के अलावा कई बार नाश्ता कर लेना, किसी भी तरह से विवेकपूर्ण निर्णय नहीं है।खान-पान के तौर-तरीकों के संबंध में चिकित्सकों वमनोवैज्ञानिकों का कहना है कि भूख भी कई तरह की होती है। उदाहरण के लिए किसी को खाते हुए देखकर खाने के लिए लालायित हो जाना। चिंता या तनाव के क्षणों में बार-बार खाने की इच्छा करना अथवा जैविक लय के अनुसार सही समय पर भूख लगना।विशेषज्ञों का यह कहना है कि पहले दोनों तरीके गलत हैं। केवल तीसरा तरीका ही सही है कि जैविक लय के अनुसार भूख लगने पर खाना। अतः खुलकर सही भूख लगने पर ही भोजन करना चाहिए।

(4) क्यों खाएँ ? भोजन करने का उद्देश्य है-अपने शरीर को स्वस्थ, नीरोग और बलवान बनाना। मनुष्य का धर्म है-शरीर को नीरोग रखना, क्योंकि शरीर माध्यम खलु धर्मसाधनम् – अर्थात धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति का माध्यम यह स्थूलशरीर ही है। अतः भोजन सदैव स्वस्थ और जीवित रहने के लिए किया जाना चाहिए न कि केवल स्वाद लेने के लिए खाना चाहिए और न ही खाने के लिए जीना चाहिए, बल्कि जीवित व स्वस्थ रहने के लिए हमें खाना चाहिए।

(5) कैसे खाएँ ? इसका जवाब है कि भोजन इस प्रकार खाया जाना चाहिए, जिसमें जठराग्नि को कम-से-कम श्रम करना पड़े। हमारे मुख में 32 दाँत होते हैं। अतः प्रत्येक ग्रास को इतनी देर तक चबाना चाहिए, जिससे भोजन तरल हो जाए और फिर तभी उसका घूँट गले के नीचे उतारना चाहिए।ऐसा कहा भी गया है कि भोजन को पीना चाहिए और पानी को खाना चाहिए। जो भी भोजन सामने आए उस भोजन की पूजा कर, स्थिर चित्त होकर, शांत मन से ईश्वर स्मरण करते हुए भोजन को भगवान के प्रसाद के रूप में खाना चाहिए। भोजन यदि प्रसाद के रूप में किया जाएगा तो रूखी-सूखी रोटी भी स्वास्थ्यवर्द्धक बन जाती है। यदि इसके विपरीत चिड़चिड़े मन से हड़बड़ी में मेवा मिष्टान्न व पकवान भी खाए जाएँ तो वे भी रोगों को बढ़ाने वाले साबित होते हैं।भोजन करते समय अधिक जल पीने से भोजन अच्छी तरह पचता नहीं है। इसी प्रकार बिलकुल जल न पीने से भोजन का पाक अच्छी तरह नहीं होता।

भोजन करने के एक घंटे बाद पानी पीना प्रारंभ कर, प्रतिघंटे थोड़ा-थोड़ा जल पीते रहना चाहिए। ऐसा करने से भोजन जल्दी पच जाता है। जूठा भोजन न तो किसी को देना चाहिए और न ही खाना चाहिए। भोजन के संदर्भ में आयुर्वेद में एक बड़ी प्रचलित कथा है।महर्षि चरक ने अपनी शिक्षा का समुचित विस्तार कर चुकने के पश्चात सोचा कि मैंने जो कहा है, उसे मेरे शिष्यों ने ठीक तरह से समझा है या नहीं, इसकी परीक्षा लेनी चाहिए। अतः परीक्षा लेने के लिए वे एक कबूतर का रूप बनाकर उस पेड़ पर बैठ गए, जहाँ पर बहुत सारे वैद्य बैठे हुए थे। तब कबूतर के रूप में महर्षि चरक ने अपनी भाषा में वैद्यों से प्रश्न पूछा-कोऽरुक? अर्थात रोगी कौन बनता है ? और वह नीरोग व स्वस्थ कैसे होता है ?इस प्रश्न से उनका अभिप्राय यह था कि जो रोगों के मूल कारणों को जानता होगा, वही उसकी रोकथाम के उपाय बताएगा। चिकित्सा उपचार भी उसी वैद्य का सफल होगा, अन्यथा औषधि मात्र से रोग का स्थायी निराकरण कहाँ संभव है? कबूतर के रूप में महर्षि चरक ने बार-बार सभी वैद्यों के सम्मुख अपना प्रश्न दोहराया-कोऽरुक ? कोऽरुक ? कोऽरुक ? इस प्रश्न के उत्तर में सभी ने अपनी मान्यता व्यक्त की।रोगमुक्त होने के निमित्त सभी उपचार बताते चले गए, लेकिन किसी ने वह उपाय न बताया कि जिससे रोगी होने का अवसर ही न आए।

वैद्यों के दिए जाने वाले उत्तर * तो शास्त्रसम्मत थे, लेकिन उनमें सारे सिद्धांतों का समावेश न रहने से कबूतर रूप महर्षि चरक को संतोष न हुआ और वे खिन्न मन से उदास होकर एक कोने में जा बैठे और सोचने लगे कि इन लोगों का अनुभव अभी गंभीर नहीं है। तभी उधर से महर्षि वाग्भट गुजरे। उनसे भी कबूतर ने वही प्रश्न किया।वाग्भट ने कबूतर के रूप में महर्षि चरक को पहचान लिया और नतमस्तक होकर उन्हीं की भाषा में प्रत्युत्तर देते हुए तीन शब्द कहे-मितभुक्, हितभुक्, ऋतभुक् । सही जवाब सुनकर महर्षि चरक को संतोष हुआ और वे उस पक्षी के रूप में ही वहाँ से उड़ गए; क्योंकि उन्हें अपने प्रश्न का सही उत्तर मिल गया था।मितभुक् – अर्थात भूख से कम खाना। जितना आवश्यक है, उतना खाना; क्योंकि ज्यादा खाने वाला व्यक्ति किसी भी तरह से कोई साधन नहीं कर सकता। वह तो खाने के बाद सिर्फ पचाने वाले चूर्ण एवं हाजमे की गोलियाँ ही ढूँढ़ता रहता है।

आवश्यकता से अधिक खाने वाले व्यक्ति के शरीर में भारीपन, अजीर्ण, अनपच आदि विकृतियाँ पैदा होने लगती हैं और आवश्यकता से कम खाने वाले व्यक्ति का शरीर धीरे-धीरे दुर्बल और शक्तिहीन हो जाता है और इसलिए चाहे घर में खाया जाए या बाहर खाया जाए; इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिए कि पाचन क्रिया पर, पेट पर कभी अनुचित भार न पड़े।हितभुक् – अर्थात सात्त्विक खाना। स्वस्थ व्यक्ति वह है, जो हितभोजी है। हितभोजी यानी जो स्वास्थ्य के अनुकूल एवं उपयोगी पदार्थ ही भोजन के रूप में ग्रहण करता है। ऐसा व्यक्ति स्वाद के लिए नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए खाता है।ऋतभुक् – अर्थात न्यायोपार्जित खाना। ऋत का संबंध पवित्रता एवं चेतना की निर्मलता से है। ऋत का अर्थ भोजन में समायी हुई भावनाओं से जुड़ा है। भोजन बनाने वाले की भावनाएँ क्या हैं? फिर उसे खाने वाले कर्त्तव्यनिष्ठ हैं भी या नहीं। ऋत भोजन को वही तैयार कर सकता है, जो भावनाशील है और जिसमें माँ की ममता है। इसलिए इस भोजन को वही खा सकता है, जो यह बात ध्यान रखने योग्य है कि हम दूसरों को जितनी ज्यादा सद्भावनाएँ अर्पित करते हैं, उतना ही हमारा आंतरिक बल बढ़ता है। इसलिए आहार का मूल्यांकन चेतना के विकास का मूल्यांकन है। ऋत आहार का स्वरूप हमारी चेतना को परिष्कृत या विकृत करता है।आहार के संदर्भ में आयुर्वेद के सबसे प्राचीन ग्रंथ ‘चरक संहिता’ में लिखा है-

मात्राशी स्यात। आहारमात्रा पुनराग्निबलापेक्षिणी ॥ द्रव्यापेक्षया च त्रिभागसौहित्यमर्द्धसौहित्यं वा गुरूणाम् उपदिश्यते। लघूनामपि च नातिसौहित्यं अग्नेर्युक्त्यर्थम् ।

अर्थात मनुष्यों को भोजन परिमित मात्रा में करना चाहिए। वह उतनी ही मात्रा में होना चाहिए, जितनी हमारी पाचनशक्ति हो।फिर भोजन में देर से पचने वाले (गुरुपाक) और शीघ्र पचने वाले (लघुपाक) खाद्य पदार्थों का भी ध्यान रखना चाहिए। पचने में भारी पदार्थों को आधा या पौन हिस्सा पेट भरकर ही खाना चाहिए और पचने में हलके पदार्थों को भी भूख से कुछ कम ही खाना चाहिए, जिससे जठराग्नि का बल बना रहे। इसी बात को ‘भावप्रकाश’ ग्रंथ में इस प्रकार कहाकुक्षेर्भागद्वयं भोज्यैस्तृतीये वारि पूरयेत् । वायोः संचारणार्थाय चतुर्थमव शेषयेत् ॥अर्थात भोजन ग्रहण करने में आमाशय के दो भाग भोजन से भरें, एक भाग पानी से पूर्ण करें और चौथाई भाग वायु संचारण के लिए खाली छोड़ दें।भोजन ग्रहण करने का यह नियम हम सभी के लिए हितकारी है और शक्ति व स्वास्थ्यप्रदाता है; क्योंकि यदि हम भोजन के स्वाद में वशीभूत होकर दूँस-दूँसकर पेट को भर लेते हैं तो उसका नतीजा सदैव बहुत हानिकारक होता है। ऐसा भोजन कभी ठीक तरह से पच नहीं पाता।इस प्रकार के भोजन से ही कब्ज और अजीर्ण की उत्पत्ति होती है। ऐसे भोजन से संचित शक्ति का भी अपव्यय होता है और हम इसके कारण और ज्यादा कमजोर हो जाते हैं। इसलिए भोजन ग्रहण करने में स्वाद के वशीभूत नहीं होना चाहिए और सादा व सुपाच्य भोजन परिमित मात्रा में ग्रहण करना चाहिए।

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