छत्तीसगढ़ का प्राकृतिक वैभव: जशपुर-सामरी पाट से लेकर ‘धान का कटोरा’ मैदान तक की भूगोलिक विरासत

(ख) जशपुर-सामरी पाट – यह छोटा नागपुर पठार का ही एक हिस्सा है। यह पाट-प्रक्षेत्र राज्य के उत्तर-पूर्वी भाग में अवस्थित है। इसमें समूचा जशपुर जिला तथा कुछ भाग सरगुजा जिले की सामरी (कुसुमी तहसील) को समेटे हुये है। इस पाट-क्षेत्र के पूर्व में छोटा नागपुर का पठार, पश्चिम में बघेलखण्ड का पठार तथा दक्षिण-पश्चिम में महानदी बेसिन है। इस पाट की ऊँचाई 1100 मी. से अधिक है। यह समूचा प्रक्षेत्र अत्यन्त दुर्गम तथा वनाच्छादित है। इसके अन्तर्गत जमीरपाट, जारंगपाट, जशपुरपाट तथा मैनपाट आदि शामिल है। यहाँ ग्रेनाइट तथा बलुआ पत्थरों की परम्परा आगे चलकर लेटेराइट में बदल जाती है।जशपुर पाट की ऊँचाई लगभग 900 मी. है, किन्तु शिखर 1000 मी. से भी ऊँचे हैं, जैसे भंवर पहाड़, तेंदू पाट आदि। जशपुर पाट से भिन्न यहाँ खुरिया का पठार है, जो जशपुर के धुर उत्तर-पश्चिम में पड़ता है। यह ईब तथा कन्हार नदियों के मध्य अवस्थित है। मैनपाट 29 कि.मी. चौड़ा है। इसके अधिकतम ऊँचे भाग 1152 मी. तक हैं। माँद नदी के पूर्व में जारंग पाट तथा पश्चिम मे पेण्ड्रा पाट हैं। पूर्व की ओर रायगढ़ का पत्थलगाँव पठार मिल गया है।पाट से छोटी-छोटी नदियाँ उतरकर सभी दिशाओं की ओर बहती हैं।
ऐसी नदियों में माँड, कन्हार, रिहंद आदि प्रमुख है। माहिन तथा बंकी नदियाँ दक्षिणी सीमा तथा मोरेन उत्तरी सीमा में बहती हैं।(ग) छत्तीसगढ़ का मैदानी भाग प्रदेश का ‘धान का कटोरा’ नाम से जाना जाता है तथा यह बघेलखण्ड पठार तथा सतपुड़ा के मध्य समतल क्षेत्र का वाचक है। यह विस्तृत तथा उपजाऊ क्षेत्र है तथा यह महानदी, शिवनाथ तथा हसदो नामक नदियों से बाधित है, जिनसे अनेक सहायक नदियाँ मिलती है। उक्त क्षेत्र एक पंखे के समान है, जो उत्तर-पश्चिम में 385 किमी. तक विस्तृत है। इसका उत्तर-दक्षिण में अधिकतम प्रसार 400 किमी. है। इसकी ऊँचाई 400 मीटर से अधिक नहीं हैं। औसत वर्षा 1500 मिलीमीटर है पूर्वी क्षेत्र में तथा 1300 मिलीमीटर है पश्चिमी क्षेत्र में। तापमान 43 डिग्री से 12 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है। यह क्षेत्र लौह, असबेस्टस, चूना पत्थर तथा बाक्साइट नामक खनिजों से लबालब है। यह अंचल कोसा के उत्पादन के लिये प्रसिद्ध है।
इस क्षेत्र के अन्तर्गत छत्तीसगढ़ के बिलासपुर (का कुछ भाग), समग्र रायपुर, दुर्ग, राजनांदगाँव तथा रायगढ़- जैसे प्राचीन जिले समाहित हैं।छत्तीसगढ़ का मैदान कड़प्पा-काल के शैलखण्डों का प्रक्षेत्र है। यह शिवनाथ तथा महानदी का बेसिन है। इसके उत्तर में बघेलखण्ड पठार, पश्चिम में मेकल श्रेणी, दक्षिण में बस्तर का पठार तथा पूर्व में लघु पर्वत प्रक्षेत्र हैं। छत्तीसगढ़ में महानदी का अपवाह 29860 वर्ग मील है। महानदी बेसिन समुद्र तल से 300 मीटर से कम ऊँचा है। यह पूर्व की ओर थोड़ी झुकी तश्तरी के समान है। इस भाग में उच्चावच बहुत कम हैं तथा धरातल काफी समतल है। इसके किनारे की ओर ऊँचाई तथा उच्चावच दोनों ही बढ़ते जाते हैं और बेसिन की उत्तरी सीमा पर ऊँचाई कहीं-कहीं 100 मीटर से भी अधिक है। छत्तीसगढ़ बेसिन को दो स्थलाकृतिक प्रक्षेत्रों में बाँटा गया है (1) छत्तीसगढ़ का मैदान और (2) सीमांत उच्चभूमि-क्षेत्र।छत्तीसगढ़ का मैदान 31,600 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में विस्तृत है।
यह अवसादी शैलों का बना है। इस मैदान के अन्तर्गत हसदों-माँड का मैदान, बिलासपुर का मैदान, शिवनाथपार का मैदान, महानदी शिवनाथ दोआब व महानदी पार क्षेत्र शामिल है। इस मैदान की औसत ऊँचाई 220 मीटर है, जो उच्चभूमि क्षेत्र की ओर बढ़ती गयी है और 330 मीटर हो गयी है। छत्तीसगढ़ मैदान का लगभग चारों ओर से घिरा सीमांत उच्चभूमि है, जो 360464 वर्ग कि.मी. क्षेत्र पर विस्तृत है। इसकी औसत ऊँचाई 330 मीटर है, जो पूर्वोत्तर एवं पश्चिमोत्तर सीमा क्षेत्रों में 1000 मीटर से भी ऊंचा है। भू-वैज्ञानिक संरचना में विविधता और नदियों के द्वारा विच्छेदन के कारण उच्च भूमि अनेक पहाड़ियों, श्रेणियों, पठारों एवं द्रोणियों में विभाजित है।इस क्षेत्र की प्रमुख नदी महानदी है। इसकी प्रमुख सहायक नदियों में शिवनाथ, हसदो, पैरी, माँड, जोंक, सुरंगी तथा जोंक आदि का उल्लेख किया जा सकता है।
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