दंडकारण्य क्षेत्र: बस्तर पठार की भूगोल, खनिज संपदा और रहस्यमय प्राकृतिक धरोहर का केंद्र

दंडकारण्य क्षेत्र बस्तर पठार के रूप में जाना जाता है। यह 17°46′ उत्तर से 20°34′ उत्तरी अक्षांश और 80°15′ पूर्व से 82°01′ पूर्वी देशांतर तक फैला हुआ है। इसका क्षेत्रफल 30,060 वर्ग किलोमीटर है। पठार की औसत ऊँचाई 600 मीटर और धिकतम 762.5 मीटर है। इस क्षेत्र को कई भागों में विभाजित किया जा सकता है: उत्तरी मैदान, उत्तर-पूर्वी पठार, अबूझमाड़ पहाड़ियाँ, दक्षिणी पठार और दक्षिणी मैदान। छत्तीसगढ़ का मैदान उत्तर में इसकी सीमा बनाता है, जबकि बीजापुर का पठार दक्षिण में इसे सीमांकित करता है। जगदलपुर का पठार पूर्व में स्थित है, जिसका सामान्य ढलान पूर्व से पश्चिम की ओर है। गोदावरी और महानदी जल निकासी प्रणालियाँ इस क्षेत्र पर हावी हैं। गोदावरी की प्रमुख सहायक नदियाँ शबरी और इंद्रावती हैं इसकी सहायक नदियों में उत्तर से नारंगी, भंवरदिग, गुडरा, निबरा और कोठारी और दक्षिण से छोटी नदियाँ दंतेवाड़ा, बेरुडी और चिंतावागु शामिल हैं।
गोदावरी की अन्य सहायक नदी, शबरी, दंडकारण्य क्षेत्र के दक्षिण-पूर्वी भाग से होकर बहती है। दंडकारण्य क्षेत्र बहुत प्राचीन चट्टानों से बना है। इस चट्टान संरचना में विंध्य कुडप्पा, प्राचीन लावा प्रवाह, आदिम ग्रेनाइट और नीस, और धारवाड़ संरचना शामिल हैं। धारवाड़ संरचना में रूपांतरित तलछटी चट्टानें शामिल हैं जिनकी विशेषता भ्रंश और उत्तर-दक्षिण वलन है। इसमें शिस्ट, स्लेट, बलुआ पत्थर, क्वार्टजाइट, हेमेटाइट और ग्रेनाइट शामिल हैं। आदिम संरचना में आदिम ग्रेनाइट और नीस की प्रधानता है। इसमें क्वार्ट्ज, फेल्डस्पार, अभ्रक और हॉर्नब्लेंड खनिज पाए जाते हैं विंध्य शैल समूह में क्वार्ट्ज बलुआ पत्थर प्रमुख है। यहाँ की जलवायु मध्यम है, जो 38-11 डिग्री सेल्सियस के बीच रहती है। अधिकतम वर्षा 1875 सेमी दर्ज की गई है, लेकिन औसत वर्षा 1862 सेमी है। यह क्षेत्र घने जंगलों और जंगली भैंसों के लिए प्रसिद्ध है। दंतेवाड़ा, बस्तर और कांकेर जिले इस क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं।
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