छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक सम्पदा: धरती का खजाना और विकास की रीढ़

जिंदगी जीने के लिए छत्तीसगढ़ियों को धरती को उपयोग में लाना होता है। आज पानी और भोजन-जैसी मूल जरूरतों में पूर्ति की माँग जनसंख्या के विस्फोट के साथ और भी बढ़ी है। मानव की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की समस्या दिनों-दिन जटिल होती जा रही है।प्राकृतिक संसाधनों को ऐसे सभी उत्पादों में परिभाषित किया जा सकता है, जिन्हें प्रकृति ने प्रदान किया है, और जिन्हें मानव अपनी जरूरतों के अनुसार प्रयोग में ला सकता है। प्राकृतिक संसाधन वे सब कुछ हैं, जो मानव को उसके प्राकृतिक पर्यावरण में मिलते हैं और जिनका उपयोग वह अपने लाभ के लिए कर सकता है। आज अर्थशास्त्री ‘प्राकृतिक संसाधन’ के बजाय ‘प्राकृतिक पूँजी’ शब्द का इस्तेमाल करने लगे हैं। ‘प्राकृतिक पूँजी’ एक वित्तीय लक्षणा है, जो धरती को ‘बैंक एकाउण्ट’ के रूप में प्रयोग करती है।
छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक संसाधनों को हम अधोलिखित कोटियों में वर्गबद्ध कर सकते हैं-1. खनिज सम्पदा2. वन्य सम्पदा3. वन्य जीव4. कृषि फसलों का क्षेत्रीय वितरण, कृषि का नियोजित विकास और हरित कांति5. पशुधन तथा पशुधन-विकास6. जल-संसाधन, सिंचाई का विकास और सिंचाई परियोजनाएँ
खनिज-सम्पदा – छत्तीसगढ़ की प्रकृति इस बहुमूल्य देन से अन्य राज्यों की अपेक्षा कहीं अधिक सम्पन्न है। राज्य के विभिन्न भागों में कोयला, मॅगनीज, चूने का पत्थर, फायर-क्ले, कच्चा लोहा, ग्रेफाइट, बाक्साइट, अभ्रक सिलिक, डोलोमाइट, क्वार्टजाइट, कोरंडम, स्वर्णधातु, हीरा, एलेक्जेन्ड्राइट, बैरिल फर्शीपत्थर, निकिल, कोमियम, सीसा तथा चाँदी आदि अनेक खनिज विपुल मात्रा में पाए जाते हैं। राज्य के लिए किस खनिज पदार्थ का कितना महत्व है, यह उसकी प्राप्ति, उपयोगिता व राष्ट्र अथवा विश्व में ऐसे खनिज पदार्थ की पायी जाने वाली मात्रा में हमारे योगदान पर निर्भर करता है।
कोयला : देश में कोयला के भण्डार की दृष्टि से छत्तीसगढ़ का दूसरा स्थान है। यहाँ कोयले का भण्डार 38.13 बिलियन टन है, जो कुल भण्डार का लगभग 15.84 प्रतिशत है। कोयले के भण्डार के रूप में देश में झारखण्ड (29.55 प्रतिशत) का प्रथम स्थान तथा उड़ीसा का तीसरा स्थान है। सारे राज्य में कोयले की पट्टियाँ बिखरी हुई हैं। इन कोयला-क्षेत्रों की एक पट्टी उत्तर-पश्चिम सीधी से दक्षिण-पूर्व से सरगुजा तक विस्तृत है। इसके अन्तर्गत तातापानी, झिलमिली, सोनहट, झगराखंड, कुरासिया-चिरमिरी, बिसरामपुर (लखनपुर, सेंदुरगढ़, पंचभइनी, दमहाखेड़ा) आदि क्षेत्र आते हैं। दक्षिणी पट्टी बिलासपुर से रायगढ़ तक विस्तृत है। इसके अन्तर्गत कोरबा, मॉडघाटी तथा रायगढ़-क्षेत्र आते हैं
।उत्तरी क्षेत्र की कोयले की पट्टी
(क) सरगुजा जिले : सरगुजा जिले में कोयले का सर्वाधिक भंडार है। यहाँ सोनहट, झिलमिली, रामकोला-तातापानी तथा विश्रामपुर आदि में 36,580.3 लाख टन कोयले का भंडार है।
सोनहट क्षेत्र : यह सरगुजा से होते हुए कोरिया तक विस्तृत है। भूगर्भीय बनावट की दृष्टि से यह सोहागपुर-क्षेत्र का भाग है यहाँ निम्नतम परत लगभग 4 मीटर मोटी है तथा 47.59 मीटर मोटी चट्टानों के ऊपर पुनः 1.4 मीटर मोटी तह है। निचली तह में उत्तम श्रेणी के कोयले का भंडार है। यह ‘सेमी कोकिंग कोल’ है। इस क्षेत्र में कोयले का भंडार लगभग 465.7 लाख टन है।
झिलमिली क्षेत्र : तातापानी-रामकोला-क्षेत्र के ठीक दक्षिण में चिरमिरी स्टेशन से 48 किलोमीटर दूर इस झिलमिली क्षेत्र का क्षेत्रफल 180 वर्ग कि.मी. है। यहाँ कोयले की पाँच परतें हैं।
झगराखंड क्षेत्र : यह सोहागपुर क्षेत्र का दक्षिणीपूर्वी विस्तार है, जो लगभग 77 वर्ग कि.मी. में व्याप्त है। यहाँ कोयले की दो परतें मिलती है। यहाँ 1921 से 11 खदानोंमें उत्खनन किया जा रहा है।
बिसरामपुर क्षेत्र : मध्य सरगुजा में इस कोयला क्षेत्र का कुल क्षेत्रफल 1000 वर्ग कि.मी. है। यहाँ कोयले की अनेक परतें है। यहाँ नेशनल कोल डेव्हलपमेंट की खदान है, जिसकी उत्खनन क्षमता 3700000 टन है।
तातापानी-रामकोला क्षेत्र: यह सरगुजा जिले के उत्तर-पूर्वी कोने पर 260 वर्गकि.मी. वाला क्षेत्र है। यहाँ कोयले की तीन परतें हैं, जो कमशः 1 मीटर, 2 मीटर तथा 2.4 मीटर मोटी हैं। यहाँ से प्राप्त होने वाला कोयला सामान्य किस्म का है तथा खपत-क्षेत्र से दूर होने के कारण यहाँ उत्पादन नहीं होता ।
(ख) जशपुर जिले की कोयले की पट्टी : छत्तीसगढ़ के सभी जिलों में सबसेकम लौह-भण्डार जशपुर जिले में है- मात्र 8 लाख टन। यहाँ के पेडारापाट तथा सामरीपाट आदि स्थलों पर कोयले का भंडार मिलता है।
(ग) कोरिया जिले की कोयले की पट्टी: कोरिया जिले में उपलब्ध कोयला भंडार 12,154.1 लाख टन है। यहाँ की कोयला पट्टी में सोहागपुर (आंशिक), झिरमिरी तथा कोरेगढ़ इत्याादि हैं।
कुरासिया-झिरमिरी क्षेत्र : यहां भूतपूर्व कोरिया राज्य का एक क्षेत्र है, जो लगभग130 किमी. क्षेत्र में फैला हुआ है। यह सोनहट से 6-10 किमी. दक्षिण में है। यहाँ तीन परतें पायी जाती हैं, जो नीचे से ऊपर क्रमशः 7.3 तथा 1.5 मीटर मोटी हैं। एक अन्य परत लगभग 30 मीटर की गहराई पर मिलती है। यहाँ उत्तम कोटि का कोयला उपलब्ध है, जिसका उत्खनन तीन खदानों में 1836 ई. से हो रहा है। यहाँ नेशनल कोल डेव्हलपमेंट कार्पोरेशन की खदान 1962 में खोली गयी।उत्तरी क्षेत्र की कोयले की पट्टी में सेन्दूरगढ़ (259.58 टन कोयला अनुमानित), लखनपुर (229.97 टन कोयला अनुमानित), पंचभइनी तथा दमहाखेड़ा भी सम्मिलित है।
दक्षिणी क्षेत्र की कोयले की पट्टी : इस क्षेत्र के कोयला की पट्टी कोरबा तथारायगढ़ जिला में पड़ती है। यह महानदी बेनि का भाग है, जिसमें उसकी सहायक नदियाँ जैसे माँड, हसदो, अहरान व कुरंग ने कटाव किया है और कोयले की परतें सुस्पष्ट नजर आती है।
(घ) कोरबा जिला : इस प्रक्षेत्र में लगभग 12154.1 लाख टन कोयला-भंडारअनुमानित है। यह क्षेत्र 625 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। हसदो नदी इस क्षेत्र के बीचोंबीच बहती है। यहाँ की तीन परतें कमश: 36.60 मीटर, 21.2 मीटर तथा 19.8 मीटर मोटी है। यहाँ उत्तम कोटि का कोयला मिलता है, जिसका उत्पादन 1947 के बाद प्रारंभ हुआ। यहाँ का कोयला भिलाई व कोरबा स्थित तापीय विद्युत केन्द्र में प्रयुक्त होता है।
(ड.) रायगढ़ जिला यहाँ के माँड-रायगढ़ प्रक्षेत्र में 153581.7 लाख टन कोयले का भंडार है। इसको हम दो भागों में बाँट सकते हैं-
मॉड घाटी का क्षेत्र यह 5.18 वर्ग किलोमीटर में प्राप्त है। यहाँ कोयले की 1.6 मीटर मोटी परत मिली है। यह प्रक्षेत्र रायगढ़ स्टेशन से 80 कि.मी. उत्तर स्थित है।
रायगढ़ क्षेत्र : उड़ीसा के हिमगिर-रामपुर-क्षेत्र का विस्तार रायगढ़ जिले तक पाया जाता है और यह रायगढ़-कोयला क्षेत्र के नाम से परिचित है। यह 518 वर्ग किलोमीटर में व्याप्त है। यहाँ का कोयला साधारण किस्म का है।
(च) बिलासपुर जिला 1. हसदो रामपुर क्षेत्र इस कोयले क्षेत्र का विस्तार बिलासपुर तथा सरगुजा जिलों में है। इसका क्षेत्रफल 1035 वर्ग किलोमीटर है। यहाँ तीन मीटर तक की मोटी तहें हैं। यहाँ का कोयला सामान्य कोटि का है, जिससे गैस, कोलतार आदि उत्पाद बनाए जा सकते हैं।
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