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छत्तीसगढ़: बैलाडीला से रावघाट तक लौह अयस्क का खज़ाना — एशिया की सबसे बड़ी खान यहीं स्थित

लौह अयस्क : छत्तीसगढ़ में लौह अयस्क दन्तेवाड़ा, बस्तर, काँकेर तथा राजनांदगाँव जिलों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यहाँ लौह अयस्क कैम्ब्रियनपूर्व-युग की चट्टानों के नीचे पाया जाता है। यहाँ पाए जाने वाले लौह अयस्क की उद्यमता-कोटि 68 प्रतिशत से भी अधिक होती है। यहाँ पाया जाने वाला लौह अयस्क हेमेटाइट प्रकार का होता है, जिसमें बैलाडीला (जिला दंतेवाड़ा) में पाया जाने वाला लौह अयस्क विश्व के उच्चतम कोटि के लौह अयस्क में से है। इसमें लौह अंश 55-60 तक है। बैलाडीला की लौह अयस्क खान एशिया महाद्वीप की सबसे बड़ी खान है।राज्य में कुल 2336 मिलियन टन लौह अयस्क का भंडार है। विवरण इस प्रकार है

दंतेवाड़ा जिल्ला : दंतेवाड़ा के बैलाडीला में 61 मीटर की गहराई तक लौह-अयस्क प्राप्त होने की संभावना है। यहाँ 70 करोड़ टन के करीब के लौह अयस्क की प्राप्ति का अनुमान है। यहाँ खनन का कार्य आधुनिक मशीनों के द्वारा किया जा रहा है। यहाँ लौह खनन का प्रथम संयंत्र किरंदूल में 1968 में लगाया गया था। 1980 से बचेली में लौह अयस्क का उत्पादन हो रहा है। यहाँ निक्षेप क्रमांक 5 से 14 तक के क्षेत्र में एन.एम.डी.सी. के द्वारा उत्खनन कार्य किया जा रहा है।बैलाडीला के लौह अयस्क का विस्तार 18°35’30” से 81°50’03” अक्षांश और 81°10″ से 81°15″ देशांतर तक है। यहाँ दो समानांतर पहाड़ियाँ है, जिनके बीच एक घाटी है। यह कटाव से बनी है। ये पहाड़ियाँ लगभग 36 कि.मी. लम्बी तथा 10 कि.मी. चौड़ी है। इस क्षेत्र में 14 निक्षेपण है तथा निकट ही मालेंगर नदी घाटी में दो अन्य निक्षेपण हैं।

बस्तर जिला – यहाँ रावघाट (653 लाख टन तथा, छोटा डोंगर (33 लाख टन) के लौह अयस्क के संचित भंडार प्रमुख है रावघाट की पहाड़ी अबूझमाड़ के पहाड़ी क्षेत्र की पूर्वी सीमा पर स्थित है। यहाँ लौह निक्षेपण के छह क्षेत्र मिले है। यहाँ के अयस्क में लोहे की मात्रा 60-68 प्रतिशत तक है। भानुप्रतापपुर तहसील में आरी डोंगरी में भी लौह अयस्क निकाला जाता है।

कांकेर जिला : कांकेर जिले में लौह अयस्क के प्रमुख क्षेत्रों में चारगाँव (21.80 लाख टन), मेटाबोदेली (15.60 लाख टन) दलहद्दे माटी (12.4 लाख टन), कोलमसार तथा अरी डोंगरी आदि हैं।है।

राजनांदगाँव जिला – यहाँ बोरिया टिब्बू में 10 लाख टन लौह अयस्क अनुमानित है।

बाक्साइट – यह एल्युमिनियम का खनिज अयस्क है। साधारणतया जब अयस्क में एल्युमिनियम की मात्रा 40 प्रतिशत से अधिक होती है, तब उसे बाक्साइट कहते हैं, अन्यथा प्रकृति में पाया जाने वाला यह एक साधारण अयस्क है। एल्युमिनियम हल्का होता है और आसानी से मुड़ जाता हैं। इसे सरलता से आकार दिया जा सकता है। हल्का होने के कारण एल्युमिनियम की माँग निरंतर बढ़ रही है और अब इसका उपयोग वायुयान बनाने में होता है। इसे घरेलू बर्तन तथा इमारती सामान भी बनता है। रसायन उद्योग में एल्युमिनियम का उपयोग महत्वपूर्ण है।छत्तीसगढ़ के पठारी अंचल में बाक्साइट का विशाल भंडार है। रायपुर, सरगुजा, बिलासपुर, कोरबा, कवर्धा, रायगढ़ बस्तर तथा राजनांदगाँव जिलों में एल्युमिनियम की लम्बी पट्टियाँ हैं। सरगुजा जिले के परपटिया एवं उरंगा-क्षेत्र में उच्चश्रेणी बाक्साइट के 19 लाख टन भण्डार हैं। सरगुजा में निक्षेपण मैनपाट, सात पटरी पहाड़ तथा पेरता पहाड़ पर मिलते हैं। जशपुर जिले में खुड़िया तथा मारोल तथा जमीर पाट में बाक्साइट के भंडार है। बाक्साइट के निक्षेप बैलाडीला के आसपास बड़ी मात्रा में हैं। नारायणपुर, करकानार, मोहिन्दीबेड़ा तथा कुतल-क्षेत्रों में भी बाक्साइट के भंडार है। बिलासपुर, राजनांदगाँव एवं कवर्धा में भी बाक्साइट उपलब्ध होता है। बिलासपुर जिले के पुटका पहाड़ से प्राप्त बाक्साइट का उपयोग कोरबा के एल्युमिनियम कारखाने में होता है। अनुमान है कि जॉजगीर जिले में हिरी क्षेत्र, बेलपान, धूमा, बारादार, मदनपुर तथा लगरा में 5190 लाख टन बाक्साइट है। कवर्धा जिले में बोदई दलदली में यह 67 लाख टन अनुमानित है। कोरबा जिले के फुटका पहाड़ में यह 30 लाख टन उपलब्ध हो सकता है। बस्तर के किरीत गाँव, आसना-क्षेत्र, बुधियारमारी, कुदारवाही तथा केशकाल में 103 लाख टन अनुमानित है। सरगुजा के मैनपाट तथा जमीरपाट में 670 लाख टन का भंडार है।

टिन – इसके उत्पादन में भारत के छत्तीसगढ़ का प्रथम स्थान है। यह कैसेटेराइटखनिज से प्राप्त होता है, जो बस्तर के दक्षिण-पूर्वी भाग सुकमा, चिंतलनार, गोविंदपाल तथा मुंडपाल में ही प्राप्त होता है। यहाँ प्राप्त टिन का अनुमानित भंडार 547630 टन आंका गया है। यह धातु सामरिक एवं उद्योग के महत्व की है। इसे धातु-मिश्रण, टिनशेड एवं बर्तन बनाने हेतु प्रयुक्त किया जाता है। ‘भाभा एटामिक रिसर्च सेंटर’ की सहायता से रायपुर में 2 टन वार्षिक क्षमता का एक संयंत्र लगाया गया है।

सीसा – सीसा एक भारी धातु है, किन्तु यह सरलता से गला ली जाती है। यह मुद्रण-सामग्री बनाने, चादरों पर मढ़ने, केबल पर मढ़ने, काँच बनाने, विस्फोटक पदार्थ आदि बनाने के काम में आता है। जहाजों पर पेण्ट करने के काम भी आता है। कपड़ा रंगने तथा छापने के काम में भी इसका उपयोग होता है।बिलासपुर जिले में पदमपुर, दुर्ग जिले में बिलोची तथा थेलकादांड, दंतेवाड़ा जिले में भान्सी तथा बेंजाम, सरगुजा में चिरई खुर्द तथा भेलौडा, महासमुंद जिले में रामपुर गाँव आदि में सीसा अयस्क की सूचना है। दुर्ग जिले में विलोची का क्षेत्र 2.5 किलोमीटर लम्बाई में पसरा हुआ है।

मैंगनीज – छत्तीसगढ़ में मैंगनीज के उत्पादन क्षेत्र की दृष्टि से बिलासपुर, कांकेर, बस्तर तथा दंतेवाड़ा जिलों के प्रक्षेत्र प्रमुख हैं।

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