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छत्तीसगढ़: खनिज संपदा का खज़ाना — चूना पत्थर, हीरा, सोना और अभ्रक से समृद्ध राज्य

चूने का पत्थर – छत्तीसगढ़ चूने के पत्थर की दृष्टि से सम्पन्न है और यह पूरीतरह चूने के पत्थर के कमिक निक्षेप के ऊपर बसा हुआ है। यहाँ इसके विशाल भंडार है। प्रदेश में पाया जाने वाला चूना पत्थर उत्तम श्रेणी का है, जिसमें 40-50 प्रतिशत तक चूना पाया जाता है। चूने के पत्थर के प्रमुख क्षेत्र हैं- रायपुर (18775.2 लाख टन), दुर्ग (5180.8 लाख टन), राजनांदगाँव (250 लाख टन), कवर्धा (130 लाख टन), बस्तर (3180 लाख टन), बिलासपुर (5380 लाख टन), जांजगीर (2550 लाख टन) तथा रायगढ़ (1370 लाख टन) जिले। यहाँ जिलेवार क्षेत्रों का विवरण इस प्रकार है-

रायपुर – माँढ़र, सिलियारी, तिल्दा, बहेसर, सोनाडीह, हिरना, झीपन, चंडी, गैतरा, मोरा, पौसरी आदि। दुर्ग– जामुल, नंदिनी, खुदिनी, सेमरिया, अदौली, आदि। राजनांदगाँव – भाटागाँव, चारभाटा आदि। कवर्धा – रणजीतपुर आदि। बस्तर – पोकनार, रयकोट, देवरा, पाल, माझी डोंगरी, तथा जूनागढ़ आदि। बिलासपुर – चिलहाटी, तेंदुआ आदि। जॉजगीर – आरमेटा, अकलतरा, ऊभाटा आदि। रायगढ़ – खरसिया, सारंगगढ़ आदि।छत्तीसगढ़ में कड़प्पा-शैल-समूह में रायपुर में सबसे नीचे 60 मीटर, बीच में 45 मीटर तथा सबसे ऊपर 60 मीटर मोटी चूने के पत्थर की परतें हैं। अकलतरा में यह 750 लाख टन अनुमानित है। दुर्ग जिले के नंदनी खुदनी-क्षेत्र में 1980 लाख टन तथा जामुल-पथरिया-क्षेत्र में 392 लाख टन भंडार का अनुमान है। राजनांदगाँव के निकट रणवीरपुरा के निकट 1800 लाख टन भंडार का पता चला है। बस्तर में कांगेर घाटी, सुकमा, पाकेला तथा भोपालपटनम में भी चूने के भंडार हैं। डोलोमाइट – यह छत्तीसगढ़ के कड़प्पा शैल-समूह में पाया जाता है। वितरणकी दृष्टि से रायपुर जिले के भाटापारा-टिकुलिया में 140 लाख का डोलोमाइट का खनिज भूगर्भ में है। इसी प्रकार दुर्ग जिले के कोदवा में 280 लाख टन एवं बस्तर जिले के तिरिया-मचकोटा में 450 लाख टन की उपलब्धता है। बिलासपुर-रायपुर सड़क-मार्ग के किनारे अवस्थित हिरों की खदानों से आज डोलोमाइट निकाला जाता है। रायगढ़ तहसील के तुरकेटा के 2.45 एकड़ क्षेत्र में डोलोमाइट निकालने के पट्टे दिए गए हैं।सिलीमिनाइट – यह खनिज दन्तेवाड़ा तथा बस्तर जिलों में पाया जाता है। कोरंडम – कठोरता की दृष्टि से हीरे के उपरांत इसी खनिज का नाम है। यह एल्युमिनियम का आक्साइड है। यह बस्तर जिले के भोपालपटनम, दंतेवाड़ा जिले के कुचनूर में पाया जाता है। रायपुर जिले में भी इसकी प्राप्ति के संकेत मिले हैं। दंतेवाड़ा के भोपालपटनम् में 25 लाख टन कोरंडम का भंडार है। 1995-96 में बस्तर 850 कि.ग्रा. कोरंडम निकाला गया था। यह खनिज अर्ध-बहुमूल्य रत्न की तरह आभूषणों में जड़ा जाता है तथा कठोरता के कारण इसे चिकना करने, पालिश करने तथा पत्थरों को काटने के काम में लाया जाता है। हीरा – यह एक बहुमूल्य रत्न है। रायपुर तथा बस्तर जिले हीरा के उत्पादन की दृष्टि से दो प्रमुख जिले हैं। हीरा कार्बन का एक एलोट्रोप खनिज है। रायपुर जिले के मैनपुर व देवभोग तहसील में हीरे की प्रमुख भंडार हैं। रायपुर के अतिरिक्त यह बस्तर के तोकापाल व मेजरापदर में भी इसकी उपलब्धता प्रमाणित होती है। हीरा-प्राप्ति के अन्य क्षेत्रों को हम छत्तीसगढ़ में इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं। ईब-मैनी नदी क्षेत्र रायगढ़, सारंगगढ़-क्षेत्र, पिथौरा-क्षेत्र, बेहराडीह-क्षेत्र, कांकेर क्षेत्र, केशकाल-क्षेत्र, नारायनपुर-लंजौड़ा-क्षेत्र, छोटे डोंगर-क्षेत्र तथा तोकापाल-क्षेत्र । सोना – यह बहुमूल्य धातु महासमुंद, रायपुर, राजनांदगाँव, कांकेर, दुर्ग, सरगुजा तथा जशपुर आदि जिलों में सोनाखान, सोनादेही, टप्पाक्षेत्र तथा तपकरा आदि में मिलती है। एक अनुमान के तहत छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में 18126 वर्ग कि.मी. में स्वर्ण-भंडार है। यह प्रदेश की नदियों के बालू में मिलता है। यहाँ के लोग नदियों के बालू को धोकर सोना निकालते हैं। जशपुर में ईब नदी, मैनी नदी, बस्तर में सबरी नदी, दुर्ग में अमोल नदी के रेत में सोना मिलता है। सोनाखान-क्षेत्र स्वर्णप्राप्ति का प्रमुख क्षेत्र है। माना जाता है कि ईबमैनी नदियों के रेत में 2780 किलोग्राम स्वर्ण-भंडार है। महानदी की रेत में भी सोना पाया जाता है।अभ्रक – छत्तीसगढ़ में इस खनिज के प्रमुख क्षेत्र हैं- जगदलपुर (बस्तर) तथा जशपुर। बस्तर के जीरम, गोलापल्ली तथा बोरनार में अभ्रक के टुकड़े प्राप्त होते हैं। जगदलपुर सुकमा मार्ग पर दरभा घाटी के किनारे भूरे अभ्रक के क्षेत्र हैं। जशपुर के रंगोला जगरार, उमरघाट, बोरतली, ताराटली, झरनगाँव ता बुरनीराजटोला में भी अभ्रक मिलता है। ताँबा – यह धातु मुख्य रूप से आग्नेय या कायांतरित चट्टानों से प्राप्त होती है,जो प्रदेश में मुख्य रूप से बस्तर, कांकेर, राजनांदगाँव, दंतेवाड़ा एवं बिलासपुर में स्थित है। इस धातु का प्रमुख रूप से प्रयोग विद्युत तारों में किया जाता है।क्वार्टजाइट – यह धातु दंतेवाड़ा, राजनांदगाँव, दुर्ग तथा रायगढ़ में मिलती है। दुर्ग के दानीटोला (200 लाख टन) तथा दंतेवाड़ा के डिलमिली (50 लाख टन) में इसकी प्राप्ति का प्रमाणीकरण हो चुका है। एक्लेक्जेण्ड्राइट – यह धातु रायपुर जिले के देवभोग-क्षेत्र (सेदमुड़ा, लाटापारा)में मिली है, किन्तु अभी तक इसका प्रमाणीकरण नहीं हुआ। गार्नेट – यह धातु रायपुर के धूपकोट तथा गोहेकला व दंतेवाड़ा के भोपालपटनम में मिलती है, किन्तु अभी तक इसका प्रमाणीकरण नहीं हो सका।होती है। यूरेनियम – प्रदेश के सरगुजा, दुर्ग तथा बिलासपुर जिलों में यूरेनियम की प्राप्ति होती है सिलीमेनाइट प्रमुख रूप से बस्तर तथा दंतेवाड़ा जिलों में मिलता है। एसबेस्टास – बस्तर तथा दुर्ग में उपलब्ध है।एण्डेलुसाइट – यह खनिज नीस, शिष्ट एवं स्लेट शैलों में प्राप्त होता है। प्रमुख रूप से प्राप्ति-स्थान बस्तर का नेतानगर है। यहाँ प्रचुर मात्रा में उत्पादन होता है। गेरू – लौह अयस्क का पीला व लाल आक्साइड है। यह बस्तर के ब्रेहबेड़ा, कुंदरी तथा डोडानाला की कटान पर मिलता है। इसके अतिरिक्त यह सरगुजा, रायगढ़ तथा राजनांदगाँव जिलों में भी पाया जाता ।है। फ्लोराइट -यह राजनांदगाँव, रायगढ़ तथा बस्तर जिलों में पाया जाता है। फेल्स्पार – प्रदेश में यह धातु बिलासपुर तथा रायगढ़ जिलों में पायी जाती है। यह धातु चीनी-मिट्टी के उद्योग में बर्तन बनाने तथा काँच बनाने के लिए उपयोग में आती है। बेरिल – जशपुर जिले के कुनकुरी-क्षेत्र के ग्राम बोराकछार में बेरिल खनिज प्राप्त होता है। दंतेवाड़ा जिला के बीजापुर तहसील में इसका भंडार है। यह सरगुजा तथा रायगढ़ में भी प्राप्त होता है। यह अणु खनिज है। इसका उपयोग आभूषणों के नगों के रूप में हो सकता है। टाल्क – यह बस्तर, दुर्ग, राजनांदगाँव तथा सरगुजा में प्राप्त होता है। संगमरमर – संगमरमर की प्राप्ति की सूचना बस्तर जिले से मिली है। चीनी मिट्टी प्रदेश के अधात्विक खनिज वर्ग में सम्मिलित उक्त खनिजों केप्रमुख स्त्रोत दुर्ग जिले में केयोलिन, हिया पहाड़, जुगेरा कलाँ, भंडार टोला आदि हैं। राजनांदगाँव जिले के हर्रा टोला, बाँदामोटा, कोहका, मरकाटोला, मुसलीजोल तथा ढ़ाबा में भी खनिज मिलते हैं। ये बर्तन, पाइप, बेसिन बनाने में प्रयुक्त होते हैं। बर्तन बनाने योग्य सफेद मिट्टी बस्तर के भानुपुरा, छींदगढ़ जोजन तथा उलनार में भी मिलती है। अग्निसह्य मिट्टी – प्रदेश में अग्नि मिट्टी या फायरक्ले मुख्य रूप से रायगढ़तथा बिलासपुर में पाए गए हैं। रायगढ़ में यह कोयले के परतों के बीच मिलती है। यह 1600 फैरनहाइट तक नहीं जलती है। इस कारण नई अग्निसह्य ईंटे तथा उच्च ताप सह्य वस्तुओं के बनाने में इसका उपयोग होता है। इसका उपयोग भिलाई इस्पाल संयंत्र तथा सीमेंटके कारखानों आदि में किया जाता है।भवननिर्माण पत्थर– भवननिर्माण के पत्थरों में ग्रेनाइट, क्वार्टजाइट तथा संगमरमर का उल्लेख पहले किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त बालू का पत्थर, स्लेट, तथा बेसाल्ट का भी यहाँ उत्पादन होता है। इसका उत्पादन स्थानीय माँग की पूर्ति के लिए होता है। बस्तर जिले में फर्शीपत्थर की उपलब्धता है। खनिज तेल – इसकी प्राप्ति की सूचना सरगुजा जिले से है। समस्याएँ : प्रदेश खनिज सम्पदा की दृष्टि से उत्यधिक सम्पन्न है, किन्तु उनके उत्खनन तथा परिवहन में अनेकानेक तकनीकी बाधाएँ मौजूद हैं-1.प्रदेश के सभी खनिजों का अभी तक पूरी तरह परिमापन नहीं किया जासका है।2. कुछ उन्नत क्षेत्रों को छोड़कर अन्य खनिज-क्षेत्र पूरी तरह उपेक्षित हैं।3.परिवहन की सुविधा के अभाव में अनेक समस्याएँ उठ खड़ी हुई हैं। 4. प्रदेश के उत्तम कोटि के खनिजों की अभी तक पहचान नहीं की गयी है। 5.6.प्रशिक्षित कर्मियों तथा आधुनिक मशीनों का अभाव है।हीरे की खदानों पर काम अभी तक विविध विवादों के कारण प्रारंभ नहीं हो पाया।

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