प्रेरणा

प्रेम ही परमात्मा: जहाँ अहं मिटता है, वहीं आनंद प्रकट होता है

अनुभवी जनों ने कहा है- ‘प्रेम ही परमेश्वर है’। प्रेम करने वाला जहाँ शून्य हो जाता है, वहीं परमात्मा प्रकट होता है। अपने अनंत-अनंत रूपों में उसकी वास्तविकता प्रकट होने लगती है। जहाँ हम स्वयं को खो देते हैं, वहीं उसकी वीणा बज उठती है। उसके अनंत स्वर अस्तित्व को घेर लेते हैं। यह ऐसी विलक्षण अनुभूति है, जिसे कहने के लिए पाने वाला नहीं बचता। प्रेम को जानने वाला उसे जानने में खो जाता है, उसी में पिघल जाता है, बह जाता है। बोलने के लिए बचता ही नहीं। प्रेम एक ऐसी गेंद है, जिसे जितनी जोर से फेंका जाए वह उतनी ही जोर से वापस हमारी ओर आती है।यदि हम किसी को सच्चे हृदय से याद करते हों तो उस तक हमारी तरंगें पहुँचेंगी ही। इस प्रकार जिसे भी याद किया जाए, वह हमारे पास दौड़ा चला आता है। इसी का नाम प्रेम है। प्रेम का दूसरा नाम भक्ति है। यह मनुष्य के भीतर एक विशेषता है, जो जितनी मनुष्य में होगी उसको उतना ही स्नेह से भरपूर व खुशहाल बनाए रखेगी। आनंद की तलाश में हम इधर-उधर भटकते रहते हैं। हम खाने-पीने और भोगने की चीजों को आनंद समझ बैठते हैं। यह आनंद नहीं है, इंद्रियजन्य संवेदना है। मनुष्य की जीभ का स्वाद थोड़ी देर के लिए है।आनंद क्या है ? सौंदर्यशाला की भाषा में इसे सौंदर्य कहा जाता है। आनंद मनुष्य के भीतर ही है और इसी को लोग भगवान मानते हैं। उसी में भगवान का स्वरूप दिखता है। वह आनंद है, परमात्मा तो केवल अनुभव करने वाली चीज है।

खुदा हमको ऐसी खुदाई न दे, कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे खुदा ऐसे एहसास का नाम है, रहे सामने और दिखाई न दे।

इन पंक्तियों के माध्यम से मुंशी प्रेमचंद लिखते हैं कि जो वस्तु आनंद नहीं दे सकती है, वह सुंदर नहीं हो सकती है। वह सत्य भी नहीं हो सकती है। आनंद क्या है ? सत्य क्या है ? सुंदर क्या है ? इसका उत्तर है कि सुंदर वह है, जो शाश्वत है, नित्य है; ठीक उसी तरह, जिस तरह प्रेम अजर-अमर है। प्रेम के आधार पर हम स्वयं व दूसरों को सुधार सकते हैं। प्रह्लाद अपने पिता से बहुत प्रेम करते थे, लेकिन उन्होंने अपने पिता की अनुचित आज्ञा को स्वीकार नहीं किया। प्रेम करते-करते उनकी आज्ञा का पालन करना छोड़ दिया। हम भी ऐसी ही किसी से नाराजगी जता सकते हैं। यह उसे रास्ते पर लाने का उपयुक्त ढंग है। शर्त यह है कि उसका आधार हमारा प्रेम हो।इस तरह हमारे आनंद, शांति, खुशहाली, गौरव, गरिमा में वृद्धि होती है। यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम दूसरों को किस दृष्टिकोण से देखते हैं। यदि हम सबको अपना समझते हैं तो सभी हमको अपने नजर आएँगे। हमको चारों तरफ अपनापन बिखरा नजर आएगा। प्रेम पाषाणों के घरों में नहीं, वरन मानव-मन के मंदिर में निवास करता है। पृथ्वी का प्रेम ही परलोक का परमात्मा है। प्रेम ही शक्ति, भक्ति और मुक्ति का परम साधन है। अतः प्रेम की पवित्र भावना को स्वप्न में भी हमें अपने से अलग नहीं होने देना चाहिए।प्रेम परमानंद है, जिसके बल पर ही हृदय से घृणा की भावनाओं को मिटाया जा सकता है। प्रेम से ही सत्य और शांति को प्राप्त किया जा सकता है तभी तो संत कबीर ने कहा है-

कबीर प्याला प्रेम का अंतर लिया लगाय, रोम-रोम में रमि रहा और अमल क्या खाय। प्रेम न बाड़ी ऊपजे, प्रेम न हाट विकाय, राजा प्रजा जेहि रुचे, शीश देइ ले जाय।

जिसने एक बार प्रेम का प्याला पी लिया, उसे फिर किसी और वस्तु की आवश्यकता नहीं रहती है; क्योंकि प्रेम न तो किसी दुकान पर बिकता है और न ही खेतों में उत्पन्न होता है। इसे प्राप्त करने के लिए अहंकार को नष्ट करना पड़ता है। जब इसका मानव मन पर पूरा अधिकार हो जाता है तो स्वयं भगवान भी उससे मिलने के लिए अधीर हो उठते हैं। प्रेम की शक्ति ही प्रभु की भक्ति है। इसलिए सूफी संत कहते हैं-मुहब्बत की नहीं जाती, मुहब्बत हो ही जाती है, यह शोला खुद भड़कता है, भड़काया नहीं जाता।प्रेम की सीमा असीम है। यह समय और देश के बंधनों से मुक्त है। इसे बंदी नहीं किया जा सकता है। यह सभी बंधनों को नष्ट कर देता है।हम प्रेम के शीतल जल द्वारा हृदय से घृणा की प्रचंड अग्नि को शांत कर सकते हैं। प्रेम की भावना पैदा होने से हमारे हृदय में किसी के विरुद्ध घृणा की भावना नहीं रहती है। हम सभी को अपना निजस्वरूप ही समझेंगे फिर अपने-पराये का दुराव ही समाप्त हो जाएगा। परायेपन की भावना समाप्त होगी तो कोई किसी को कष्ट नहीं देगा।तब कोई किसी को दुःखी नहीं करेगा; क्योंकि औरों की पीड़ा कष्ट और दुःख तब अपने ही बन जाते हैं, जब हमारा हृदय प्रेम से सराबोर हो जाएगा तो हमसे पशु-पक्षी भी प्रेम करेंगे। वे भी हमारे प्रेम के वश में होकर स्वयं प्रसन्नता से रहेंगे किंतु प्रेम-भावना के अभाव में हम उन्हें पीड़ा पहुँचाते और दुःखी करते हैं।मुक्ति का रहस्य पवित्र प्रेम और परोपकार में ही छिपा हुआ है। इसलिए प्रेम को अपना लें; क्योंकि प्रभु ही प्रेम हैं।

सूफी संतों का हृदय उद्‌गार इस तरह पुकार उठता है-है इंसान का मजहब मुहब्बत-मुहब्बत बढ़ाए यह आपस में रिश्ता-ए-उल्फत । जीव की उत्पत्ति और जीवन का आधार भी प्रेम ही है। हमारी आत्मा का आहार प्रेम ही है। प्रेम से बढ़कर दूसरी कोई आराधना नहीं है और प्रभु को प्राप्त करने का साधन भी प्रेम ही है। प्रेम जीव का स्वाभाविक गुण है, प्राकृतिक आवश्यकता है। जैसे रोटी हमारे शरीर का आहार है, वैसे ही प्रेम हमारी आत्मा का आहार है। रोटी हमें शारीरिक बल देती है; जबकि प्रेम हमें आत्मिक शक्ति प्रदान करता है।प्रेम का मार्ग विकास की ओर ले जाता है और हमें खुशी व शांति देता है। प्रेम करने वाले खिले हुए फूल की तरह होते हैं। उनके चेहरे पर सदा ओजस्वी चमक रहती है जिसे देखकर हर कोई प्रसन्न होता है। उसका व्यवहार फूल की सुगंध की तरह सभी को आनंद देता है। प्रभु की रचना से प्रेम करना ही प्रभु को पाना है, परंतु वहाँ पर आसक्त नहीं होना चाहिए। प्राणी-मात्र की पीड़ा को अनुभव करना ही प्रेम-मार्ग की पहली सीढ़ी है।किसी ने सही ही कहा है-

नहीं प्रेम जिसमें वह क्या आदमी है, वह दुनिया में आकर करें दिन कटी है।

इसके विपरीत जो आदमी प्रेम करता है, उसे सारी दुनिया अपनी लगती है व सारी दुनिया भी उसे अपना ही समझती है। एक ऐसी जगह है प्रेम, जहाँ स्वयं को खोया तो जा सकता है, लेकिन खोजा नहीं जा सकता। इसकी प्रगाढ़ अनुभूति में खोता है स्वयं का अस्तित्व और मिलता है परमात्मा ।

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