शिक्षा

छत्तीसगढ़: दण्डकारण्य की धरती जहाँ वन हैं आर्थिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय समृद्धि का आधार

ऋवेद द्वारा ‘वनस्पति शत्वत्सो विरोह’ का उद्घोष करने वाले इस अंचल में वनों के महत्व की चेतना प्रागैतिहासिक युग से ही मिलती है। प‌द्मपुराण के अनुसार “अपुत्र के लिए वृक्ष ही पुत्र है और एक वृक्ष सहस्त्र सुपुत्रों का कार्य करता है” – यह संदेश युगों से यहाँ गूँजता आ रहा है। अपनी बहुमुखी उपादेयता के कारण छत्तीसगढ़ की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था उनसे प्रभावित है। ये एक ओर तो ‘कृषि की पोषक माता’ का रूप धारण करते हैं, तो दूसरी ओर उद्योग धंधों की समृद्धि करते हैं। प्रकृति ने छत्तीसगढ़ को इस अमूल्य सम्पत्ति से सम्पन्न बनाया है। छत्तीसगढ़ के आर्थिक सामाजिक तथा पर्यावरणमूलक खुशहाली में वनों का सार्थक योगदान रहा है। छत्तीसगढ़-जैसे नवोदित राज्य में वनों की महती भूमिका है। यहाँ के पर्याप्त वनों और वृक्षों से स्थायी पर्यावरण की स्थिति है, जो कि धारणयोग्य कृषि-उत्पादन के लिए सहायक है। जंगलों के कारण मिट्टी का क्षरण कम हुआ है तथा इनसे ‘रिसाइक्लिंग’ से पोषक तत्वों का विकास हुआ है। इनसे छत्तीसगढ़ के जलप्रवाह की रक्षा हुई है तथा नदियों के प्रवाह सूखे नहीं। छत्तीसगढ़ के जंगल पौधों तथा पशुओं के जैविक संसाधनों के ‘स्टोरहाउस’ हैं। प्रदेश की जैविक विविधता के लिए इसका योगदान महत्वपूर्ण है।

‘बायोलाजिकल’ विविधता अन्न के उत्पादन की किसी भी संभावित ‘क्रायसिस’ के लिए बीमा का काम करती है।छत्तीसगढ़ प्राकृतिक वनसम्पदा के लिए अनादि काल से प्रसिद्ध रहा है तथा इसके विविध अंचलों को रामायण, महाभारत, पुराण, काव्य, या अभिलेखों में दण्डकारण्य, नागवन, झाडेशवन, महाटवी या महाकान्तार आदि नामों से पुकारा जाता रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य का 56,772 वर्ग कि.मी. (अर्थात 59285.27 हेक्टेयर) भूभाग वनों से आच्छादित है, जो प्रदेश के कुल क्षेत्रफल का 43.85 प्रतिशत है। दण्डकारण्य क्षेत्र (प्राचीन बस्तर) में अभी भी सबसे अधिक भूमि वनों के अन्तर्गत है। यहाँ की उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वनस्पति शाल वृक्षों के लिए पहचानी जाती है। यही स्थिति प्राचीन झारखण्ड की है और वनों के आधिक्य में इसका दूसरा स्थान है। यहाँ भी शालवृक्षों की अधिकता है। जशपुर के एक तिहाई भाग में उष्ण कटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन मिलते हैं। इसीलिए यहाँ मिश्रित वन की बहुलता है। महानदी बेसिन प्रमुखतया मिश्रित वनों का क्षेत्र है, यहाँ की वनसम्पदा को तृतीय क्रम में रखा जा सकता है। रायपुर, राजनांदगाँव तथा रायगढ़ में महानदी का बेसिन वन-विहीन है और यहाँ दस प्रतिशत से कुछ ही अधिक भूमि वनों के अन्तर्गत है। सबसे कम वन दुर्ग जिले (3.2 प्रतिशत) में है। सबसे अधिक वन अबुझमाड़ (50 प्रतिशत से अधिक) में है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि खनिजों संसाधनों की दृष्टि से छत्तीसगढ़ देश का सबसे धनी राज्य है। यहाँ हीरा, सोना सहित प्रमुख रूप से 28 प्रकार के खनिजों का भंडार है। विश्व का सर्वश्रेष्ठ लौह अयस्क यह भंडार है। देश का सम्पूर्ण टीन- भंडार यहीं है। देश का 85 प्रतिशत कोयला छत्तीसगढ़ व उससे संलग्न राज्यों में हैं। गारनेट, पन्ना, क्रिस्टल, बाक्साइट, होलामाइट, चूना पत्थर, कोरंडम, केशीटेराठ- जैसे खनिजों का यहाँ विपुल भंडार ।है।

छत्तीसगढ़ की प्रचुर वनसम्पदा की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं- (क) देश के सम्पूर्ण वनों में से 12 प्रतिशत छत्तीसगढ़ में । (ख) नवीनतम रिर्पोट के अनुसार राज्य के वनों का कुल क्षेत्रफल 59,772 वर्ग किलोमीटर अर्थात् कुल क्षेत्रफल में से 44 प्रतिशत वन। (ग) जैव विविधता से समृद्ध, दो सौ से अधिक प्रकार की लघु वनोपज, विलक्षण एवं बहुमूल्य वन-संसाधनों के साथ ही वन्य प्राणियों से परिपूर्ण। (घ) 3 राष्ट्रीय उद्यान तथा 11 अभयारण्य । (ड़) कुल वनक्षेत्र के 36 प्रतिशत हिस्से में शाल वृक्ष, दूसरे स्थान पर सागौन, इनके अतिरिक्त बाँस साजा, सरई, बीजा, हल्दू भी बहुतायत में। (च) देश के कुल तेदूपत्ता-उत्पादन का 17 प्रतिशत छत्तीसगढ़ में, लघु वनोपज लाख, महुआ, गोंद चिरौंजी, इमली, इत्यादि की विपुलता। (छ) वनौषधियों की प्रचुरता, संरक्षण तथा बृहद उत्पादन की संभावना को देखते हुए वनौषधि राज्य घोषित । (ज) जनमुखी वननीति लागू करने में देश में अव्वल, विनाश-विदोहन तथा संयुक्त वन-प्रबन्धन के जरिए जन-वन-विकास पर जोर ।

वनों के प्रकार- छत्तीसगढ़ प्रदेश की भौगोलिक विभिन्नताओं के आधार पर यहाँ प्रमुख रूप से चार प्रकार के वन पाये जाते हैं शालवन, सागौन-वन, मिश्रित वन तथा बांस-वन। (क) शाल वन : छत्तीसगढ़ के कुल वनक्षेत्र के 36 प्रतिशत हिस्से में शाल केवन है। दूसरा स्थान सागौन के वन का है। वाल्मीकि रामायण (2.71.16) में कलिंग के निकट स्थित शाल वन की चर्चा है। भरत के पास श्रीराम का संदेश ले जाते समय हनुमान ने मार्ग में इस भयंकर वन को देखा था (रामायण 6.125.26)। दण्डकवन को वामनपुराण (90.26,90.32) में शाल वन भी कहा गया है।शालवन दण्डकारण्य के अतिरिक्त झारखंड में भी मिलते हैं। शालवृक्ष जलाभाव में ऊँची-नीची और बलुआ पत्थर के अंचल में होते हैं। प्रदेश में आर्द्र शालवन तथा शुष्क शालवन पाए जाते हैं। आर्द्र शाल वन दक्षिणी सरगुजा, जशपुर, बिलासपुर, के उत्तर-पूर्व, फरसगांव (कॉकेर), माकड़ी, गीदम, देवभोग तथा गरियाबंद आदि में पाए जाते हैं। समूचा प्राचीन बस्तर आर्द्र शाल वन क्षेत्र है। दुर्ग तथा राजनांदगाँव के मैदानी भाग में शाल, अन्य वृक्षों के साथ पाया जाता है। बस्तर के कुछ भागों में शालवृक्षों के साथ धवड़ा, जामुन, महुआ, साजा आदि वृक्ष मिलते हैं। (ख) सागौन-वन : छत्तीसगढ़ में सागौन के वन पश्चिमी और दक्षिणी भाग में पाए जाते हैं। ये वन 85, 151 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हुए हैं। सागौन वन छत्तीसगढ़ के छोटे भागों में मिलते हैं, जैसे सारंगगढ़ रेंज, बीजापुर (पश्चिम तथा उत्तर), तथा कोंटा के दक्षिण में। महानदी के मैदान के दक्षिणी तथा पश्चिमी भाग में भी ये वन मिलते हैं।शालवन की ही तरह सागौन वन के दो भाग हैं- आर्द्र सागौन वन तथा शुष्क सागौन वन। आर्द्र सागौन वन नारायनपुर, दंतेवाड़ा, गीदम, कांकेर, अंतागढ़, कोण्टा, डोंगरगढ़, अम्बागढ़ चौकी, छुरा, डौंडीलोहारा आदि में मिलते हैं। शुष्क सागौन वन धमतरी, कवर्धा, गंडई, राजनांदगाँव, भानुप्रतापपुर, अंतागढ़ और कांकेर में मिलते हैं। (ग) मिश्रित वन : मिश्रित वन समग्र छत्तीसगढ़ में पाए जाते हैं। इनमें शाल और सागौन के अतिरिक्त अन्य पर्णपाती वृक्ष जैसे तेंदू, चार, बीजा, हलदू, साजा, सलई, बबूल, इमली, महुआ, कुसुम, जामुन, हर्रा, धवड़ा तथा बेर आदि प्रमुख है।मिश्रित वन भी दो प्रकार के हैं- आर्द्र मिश्रित वन तथा शुष्क मिश्रित वन। आर्द्र मिश्रित वनों की सघनता अधिक होती है और उनमें सदाबहार वृक्ष पाए जाते हैं, जबकि शुष्क मिश्रित वन अधिक सघन नहीं होते। साधारणतया शुष्क मिश्रित वन उथली, अनाच्छादित मिट्टी वाले स्थानों में मिलते हैं। आर्द्र सघन वनों में वृक्षों के नीचे लताएँ तथा छोटे पौधे भी उगते हैं। अनेक प्रकार की घास भी उगती है, जो रस्सी बनाने के काम में आती हैं। इन वनों में लकड़ी के अतिरिक्त अन्य उपज भी मिलती है। तेंदू के पत्ते से बीड़ी बनायी जाती है। महुआ, इमली भोज्य पदार्थ है। इन वनों में लाख, गोंद, राल भी प्राप्त होती है। कत्था, खस तथा चिरोंजी भी प्राप्त होती है। कुसुम वृक्ष की छोटी शाखाओं को लाख के कीड़े ढंक लेते हैं, जिससे पपड़ीदार लाख बनती है। राल शाल वृक्षों से प्राप्त होती है। साजा के वृक्षों पर टसर के कोए बनते हैं। (घ) बॉस के वन : मिश्रित वनों में ही बाँस के वृक्ष मिलते हैं। रायगढ़ केघड़‌घोड़ा, लैलूंगा तथा खरसिया रेंज में बाँस पाया जाता है। यहाँ का बॉस मोटा होता है, जो कागज के कारखानों में भेजा जाता है। बाँस का प्रयोग घरों में होता है। इससे टोकनी, चटाई आदि भी बनती हैं। बस्तर के नामकरण के मिथक में वेंशतरि का प्रयोग मिलता है।

सरगुजा के शुष्क मिश्रित वनों में बाँस प्रमुख हैं

भौगोलिक वर्गीकरण : छत्तीसगढ़ में वर्षा, तापमान एवं अन्य भौगोलिक कारकों के आधार पर वर्गीकृत निम्नलिखित श्रेणी के वन पाए जाते हैं- (क) उष्ण कटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन – ये वन उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं,जहाँ औसत वर्षा 100 से 150 सेमी, के बीच होती है। इनसे मुख्यतः वनोपज एवं लकड़ी दोनों ही प्राप्त होती है। इनमें शाल, सागौन, बाँस की बहुतायत सहित बीजा, जामुन, महुआ, साजा, हर्रा आदि भी पाए जाते हैं। ये वन दक्षिण सरगुजा जिले तथा जशपुर जिले के तपकरा रेंज में है। बिलासपुर, रायपुर, बस्तर तथा रायगढ़ में भी ऐसे वन हैं। (ख) उष्ण कटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन: ये अपेक्षाकृत कम वर्षा वाले (25 से 75 सेमी.) क्षेत्रों में पाए जाते हैं। ये वन प्रमुखतया वनोपज से सम्बंधित होते हैं। ये आंशिक रूप से इमारती लकड़ी भी देते हैं। इनमें बबूल, कॉकर, हर्रा, पलाश, तेंदू, धोर्य, शीशम, हल्दू, सागौन, सिरीश, आदि की बहुतायत होती है। ये वन रायगढ़, जशपुर,उत्तर-पूर्वी बिलासपुर, रायपुर, धमतरी ता मैनपुर में पाए जाते हैं।

प्रशासनिक वर्गीकरण: प्रशासकीय आधार पर छत्तीसगढ़ के वनों को तीन भागोंमें विभाजित किया गया है-( क) आरक्षित वन :इस प्रकार के वनों का कुल प्रतिशत 43.13 है तथा (ख) संरक्षित वनयह बस्तर के वनों तक विस्तृत है। (ग) अवर्गीकृत वन :: यह कुल वनक्षेत्र का 40.2 प्रतिशत है।यह कुल वक्षेत्र का 16.66 प्रतिशत भाग को घेरे हुएहै।प्रबंधन की दृष्टि से वर्गीकरण प्रबंधन की दृष्टि से छत्तीसगढ़ राज्य 6 वनवृतों में इस प्रकार विभाजित है- (क) बिलासपुर वृत : 14002.52 वर्ग किमी. में विस्तृत। (ख) काँकेर वृत :10001.85 वर्ग किमी. में विस्तृत।(ग) दुर्ग वृत :5201.11 वर्ग किमी. में सीमित।(घ) जगदलपुर वृत :12417.83 वर्ग किमी. क्षेत्र में विस्तृत ।(ड.) रायपुर वृत7262.48 वर्ग किमी. में प्रसार।(च) सरगुजा वृत :12091.19 वर्ग किमी. में विस्तार।

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