प्रेरणा

धर्म के नाम पर पशुबलि: क्या सच में यह धार्मिक है या केवल अंधविश्वास

धर्म, यज्ञ, अनुष्ठान आदि के नाम पर पशुओं की बलि देने की घटनाएँ अक्सर देखने-सुनने को मिलती हैं। धर्म के नाम पर पशुओं की बलि उचित है या अनुचित ? अक्सर इसके पक्ष एवं विपक्ष में हमें तर्क-कुतर्क देखने व सुनने को मिलते हैं, पर आखिर पशुबलि, पशुवध को उचित माना जाए या अनुचित ? इसे उचित मानने वालों के अपने तर्क हैं, कुतर्क हैं। जाहिर है इसके पीछे उनके अपने निजी स्वार्थ हैं और साथ ही इसके पीछे उन्हें शास्त्रों व धर्म का वास्तविक ज्ञान न होना भी प्रमुख कारण है।शास्त्रीय व व्यावहारिक ज्ञान के अभाव में समाज में अक्सर ऐसी कई मूढ़मान्यताएँ पनपती व विकसित होती रहती हैं, पर समाज के व मानवता के व्यापक हित में ऐसी मूढ़परंपराओं का खंडन आवश्यक ही नहीं, बल्कि अनिवार्य भी है। इसलिए शास्त्रों के वास्तविक मर्मज्ञ ऋषियों, संतों, मुनियों आदि ने शुरू से ही ऐसी मूढ़परंपराओं का खंडन किया है एवं उन्हें व्यक्ति एवं समाज के लिए अनुचित बताया है। हिंसा से समाज में हिंसा का ही जन्म हो सकता है। धर्म तो धारण करने की चीज है। धर्म तो मनुष्य के मनुष्योचित स्वभाव का ज्ञान है।फिर धर्म में पशुबलि जैसे अधार्मिक कृत्य के लिए कोई स्थान कैसे हो सकता है? किसी भी वस्तु के स्वाभाविक गुणों को उसका धर्म कहते हैं।

हर वस्तु का अपना धर्म है। जैसे कि ऊष्मा अग्नि का धर्म है, तपना सूर्य का धर्म है, शीतलता जल का धर्म है, बहना वायु का धर्म है। वैसे ही मनुष्यता ही मनुष्य का स्वभाव है। मनुष्यता ही मनुष्य का धर्म है।इसलिए वेद कहता है- मनुर्भव ! (ऋग्वेद-10-53-6) अर्थात मनुष्य बन जाओ। अस्तु धर्म तो मनुष्य-को-मनुष्य बनाने का विधान है, मनुष्य को हिंसक, हत्यारा बनाना या अमानवीय कृत्यों के लिए प्रेरित करना धर्म नहीं हो सकता। धृति (धैर्य), क्षमा, दम (मन को वश में करना), अस्तेय (मन, वचन, कर्म से) दूसरे के धन का, पदार्थ का लालच न करना। शौच (शरीर, मन, बुद्धि को पवित्र रखना), इंद्रियनिग्रह, धी (बुद्धिमान बनना) अर्थात प्रत्येक कर्म को सोच-विचार कर करना, विद्या (सज्ञान ग्रहण करना), सत्य (सत्य बोलना, सत्य का आचरण करना), अक्रोध (क्रोध न करना एवं क्रोध को वश में करना) आदि धर्म के 10 लक्षण बताए गए हैं। इनमें कोई भी लक्षण पशुबलि जैसे कृत्य को जायज या सही नहीं ठहराता। अतः जाहिर है कि यह कृत्य अधार्मिक है और धर्म की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।शास्त्रों में तो शाश्वत सुख पाने के मार्ग बताए गए हैं। हिंसा को पाप की श्रेणी में रखा गया है; क्योंकि जो चीज हमें अपने लिए पसंद नहीं, उसे दूसरों के साथ करना कैसे – उचित हो सकता है? पुराणों में परोपकार को पुण्य एवं दूसरों को पीड़ा देने को ही पाप कहा गया है। अस्तु पशुवध, पशुबलि को उचित मानने वालों का यह कहना कि यज्ञ अथवा विशेष धर्म-अनुष्ठान में पशुबलि को जायज ठहराया गया है, बिलकुल गलत है।

यह कहना या मानना कि यज्ञ में – या धर्म-अनुष्ठान विशेष में बलि देने से देवता प्रसन्न होते हैं, भगवान प्रसन्न होते हैं, बिलकुल गलत धारणा है।यह सत्य है कि शास्त्रों में यज्ञ में, धर्म-अनुष्ठान में ‘बलि’ देने की बातें कही गई हैं, पर इसका पशुओं की । बलि से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। शास्त्रों में वर्णित – ‘पशुबलि’ का दार्शनिक, वैज्ञानिक व व्यावहारिक अर्थ व तात्पर्य ‘पशुओं की बलि’ से नहीं, बल्कि पशुता की बलि 1 से है; पाशविक प्रवृत्ति की बलि से है।यहाँ ‘पशु’ शब्द का तात्पर्य मनुष्य के अंदर निहित ‘पशुता’ अथवा ‘पाशविक प्रवृत्ति’ से है और ‘बलि’ का – आशय ‘बलिदान’ से ‘से है, त्याग से है। इस प्रकार ‘पशुबलि’ 7 का तात्पर्य ‘पशुता’ अथवा ‘पाशविक प्रवृत्ति’ जैसी बुराइयों 1 की बलि देने से है अर्थात उसका आशय बलिदान, त्याग या – परित्याग से है। पशुता का त्याग करने से ही मनुष्य वास्तव 1 में मनुष्य हो सकता है अन्यथा पशु और मनुष्य में क्या अंतर रह जाता है। शास्त्र, पुराणों में या अन्य धर्म-संप्रदायों के धार्मिक * ग्रंथों में जो भी धार्मिक कृत्य, यज्ञ, अनुष्ठान आदि बताए गए * हैं, वे मनुष्य-को-मनुष्य बनाने के लिए ही हैं।

वे मनुष्य को * दिव्य बनाने के लिए हैं, मनुष्य को देवता बनाने के लिए हैं। जब मनुष्य में करुणा, प्रेम, संवेदना, क्षमा, त्याग, साहस आदि दिव्य गुण, दैवी गुण विकसित हो जाते हैं तब मनुष्य वास्तव में दिव्य बन जाता है, देवता बन जाता है। वह पेट, प्रजनन व परिवार की संकीर्ण सीमा को पार कर समष्टिगत हित में सोचने लगता है।दैवी गुणों के अभाव में मनुष्य आकृति से मनुष्य जैसा दीख सकता है, पर वस्तुतः प्रकृति से वह मनुष्य नहीं हो सकता है। वह पशु ही हो सकता है। समाज में आएदिन जो हिंसा, हत्या, लूट, बलात्कार, अनाचार, भ्रष्टाचार की घटनाएँ सामने आती हैं, उनके पीछे मनुष्य का प्रकृति से, प्रवृत्ति से मनुष्य न होना ही तो मूल कारण है। मनुष्य में जब तक पशुता है, पाशविक प्रवृत्ति है; तब तक वह मनुष्य होकर भी मनुष्य नहीं है; क्योंकि उसमें मानवीय गुणों का अभाव है।ऐसे लोग व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र तथा विश्व के लिए हमेशा ही समस्याएँ व परेशानियाँ पैदा करने वाले होते हैं। आज पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय व वैश्विक स्तर पर हिंसा, अपराध, आतंकवाद, अशांति, युद्ध, कटुता आदि जो समस्याएँ बनी हुई हैं- इनके पीछे मनुष्य की पाशविक प्रवृत्ति ही तो मूल कारण है। इस पाशविक प्रवृत्ति के रहते हुए व्यक्ति में, परिवार में, समाज में, राष्ट्र में, विश्व में-सुख, शांति, समृद्धि, सेवा, सद्भाव, प्रेम आदि की कल्पना नहीं ही की जा सकती है। अस्तु व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व आदि सबमें सुख, शांति, प्रेम व आनंद का साम्राज्य हो, इस हेतु मनुष्य को पाशविक प्रवृत्ति से मुक्त होना व करना आवश्यक है।इस पशुता व पाशविक प्रवृत्ति से मनुष्य को मुक्त कर उसे दिव्य व देवता बनाने मात्र के लिए ही सारे धर्म-अनुष्ठान, यज्ञ एवं धार्मिक कृत्य बने हैं, बनाए गए हैं।

अस्तु मनुष्य में हिंसा की भावना भरकर उसे पशुतुल्य बनाने वाली ‘पशुवध, पशुबलि’ जैसी मूढ़परंपराओं का समर्थन शास्त्र कर ही नहीं सकते। कई बार ऐसी मूढ़परंपराओं के पनप जाने पर लोग अंधाधुंध उनकी नकल करने लगते हैं व * शास्त्रीय ज्ञान के अभाव में उसे अवैज्ञानिक व अव्यावहारिक, * असामाजिक व अशास्त्रीय होते हुए भी उचित मान बैठते हैं। अहिंसा को परम धर्म मानने वाले महापुरुष व शास्त्र इसका समर्थन कैसे कर सकते हैं? इसलिए संत कबीर, रैदास, तुलसी, नानक, महावीर, गौतम आदि सभी महापुरुषों ने ऐसी मूढ़परंपराओं को अनुचित व अव्यावहारिक बताया है। भगवान महावीर ने स्पष्ट कहा है कि यज्ञ बुरे नहीं, परंतु यज्ञों के नाम पर होने वाली हिंसा बुरी है। यह हिंसा मानव जाति के लिए हानिकारक है और समाज को हिंसक बनाकर जीवन को अस्त-व्यस्त कर देने वाली है।उसी प्रकार भगवान गौतम बुद्ध ने भी यज्ञ का विरोध नहीं किया, बल्कि यज्ञ के नाम पर होने वाली हिंसा, पशुबलि आदि का विरोध किया।

युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव ने पशुबलि जैसी मूढ़परंपराओं को मिटाने के लिए विवेकसम्मत, वैज्ञानिक दृष्टि व शास्त्रीय दृष्टि विकसित किए जाने पर जोर दिया है। साथ ही कहा है कि मनुष्य उपासना, साधना, आराधना की त्रिवेणी में नित्य स्नान कर अपने भीतर सोए देवत्व को अर्थात करुणा, प्रेम, संवेदना आदि दिव्य भावों को जगाकर न सिर्फ पाशविक प्रवृत्तियों से मुक्त हो सकता है, बल्कि वह दिव्य हो सकता है, देवता हो सकता है और यह धरा स्वर्ग बन सकती है।शास्त्रों में वर्णित पशुबलि का तात्पर्य पाशविक प्रवृत्ति के त्याग या बलिदान से ही है। अस्तु शास्त्र की आड़ में, धर्म की आड़ में पशुबलि जैसे कृत्य अधार्मिक, अशास्त्रीय, अवैज्ञानिक, अव्यावहारिक व अनुचित हैं। हर हाल में इनका खंडन होना ही चाहिए। यह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। जो प्रभु करुणासिंधु हैं, आनंदस्वरूप हैं, प्रेमस्वरूप हैं- वे भला हिंसा से, पशुबलि से कैसे प्रसन्न हो सकते हैं ?वे तो सभी प्राणियों के पिता हैं, फिर कोई पिता किसी प्राणी की हिंसा या हत्या से कैसे प्रसन्न हो सकता है ? पशुबलि को लेकर गुरु नानकदेव से जुड़ा एक रोचक प्रसंग है। अपने प्रथम प्रचार के दौरान एक बार गुरु नानकदेव ने लाहौर पहुँचकर जवाहरमल के चौहटे में एक कुएँ के पास पीपल के पेड़ के नीचे अपना डेरा डाल दिया। जब प्रातःकाल (अमृतवेला) का समय हुआ तो वे स्नान आदि से निवृत्त होकर प्रभुचरणों में लीन हो गए, परंतु कुछ लोग वहाँ पर पशुओं का वध करने लगे। पशुओं की चीख-चिल्लाहट सुनकर गुरु नानकदेव की समाधि में बाधा उत्पन्न हुई।

अमृतवेला का समय निरर्थक होता जानकर वे बहुत क्षुब्ध हुए। उन्होंने देखा कि पशुओं की बलि देकर एक व्यक्ति कलमा पढ़कर यह दावा कर रहा है कि उसे कुरबानी का पुण्य प्राप्त हुआ है तथा मारे गए पशुओं को जन्नत नसीब हुई है। गुरु नानकदेव ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि अपने स्वार्थ के लिए जीवों की हत्या करना पाप है तथा यह सब उस समय दुगना हो जाता है, जब हत्याओं को उचित दरसाने के लिए कुछ लोग इसे धार्मिक कृत्य घोषित करने या इससे पुण्य मिलने का दावा करते हैं। यह कैसी मान्यता है कि प्रभु के बनाए जीवों की हत्या को पुण्य मानकर अपने आप को धोखा दिया जाता है। परमात्मा सब जीवों के पिता हैं। फिर कोई पिता अपनी संतान की हत्या के कृत्य से भला कैसे प्रसन्न हो सकता है ? अस्तु इस प्रकार हम देखते हैं कि पशुबलि का तात्पर्य अपने अंदर निहित ‘पशुता’ या ‘पाशविक’ प्रवृत्ति की बलि से है, त्याग से है, बलिदान से है। धर्म या यज्ञ के नाम पर पशुबलि की परंपरा अधार्मिक है, अवैज्ञानिक है, अशास्त्रीय है, अतार्किक है, अव्यावहारिक है।

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