छत्तीसगढ़ में कृषि का नियोजित विकास: एक-फसली से बहु-फसली अर्थव्यवस्था की ओर

कृषि का नियोजित विकास -छत्तीसगढ़ की 85 प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या अपनी आजीविका के लिए कृषि पर अवलम्बित है। छत्तीसगढ़ के 43.78 प्रतिशत क्षेत्र में कृषि कार्य होता है। धान प्रमुख फसल है, जो कुल खाद्यानों में लगभग 83 प्रतिशत बोयी जाती है। 1997-98 ई. के भू-अभिलेख के अनुसार छत्तीसगढ़ के कुल बोए गए क्षेत्र के 63.6 प्रतिशत भाग में धान की खेती होती थी। धान बोए गए क्षेत्र के 28.1 प्रतिशत भाग में सिंचाई सुविधाओं की व्यवस्था थी और छत्तीसगढ़ की फसल-गहनता मात्र 123 थी। इस प्रकार सिंचाई-सुविधाओं के अभाव में छत्तीसगढ़ ‘एक फसली क्षेत्र’ बन कर रह गया है। इसके लिए आवश्यक है कि छत्तीसगढ़ में सिंचाई सुविधाओं का विस्तार किया जाय। भूमि-सुधार के कार्यक्रम को लागू किया जाय।1980 के दशक के मध्य तक छत्तीसगढ़ का अधिकांश भाग एक-फसली इलाका था। बोए गए क्षेत्रफल का मात्र 20-25 प्रतिशत क्षेत्र ही दो फसली था। चूँकि इस क्षेत्र की आबादी का बहुत बड़ा किस्सा खेती पर निर्भर है, अतएव एक फसल वाली 80 प्रतिशत जमीन को फौरी तौर पर दो-फसली जमीन में बदलने की जरूरत है।
इसके अलावा छत्तीसगढ़ में बहुत कम नकदी फसलें उगाई जाती है। इसलिए क्षेत्र के कृषि उत्पादन में तिलहनी और अन्य नकदी फसलों को शामिल कर इसे और भी अधिक विविधतापूर्ण बनाने की जरूरत है। छत्तीसगढ़ के 5804540 हेक्टेयर है।छत्तीसगढ़ के सम्पूर्ण आर्थिक विकास के लिए कृषि का समुचित विकास आवश्यक है। इसे ध्यान में रखते हुए कृषि विकास के क्षेत्र के अनेक कार्यक्रम छत्तीसगढ़ में चलाए जा रहे हैं, ताकि उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि हो सके। इनमें प्रमाणित बीजों का प्रदाय, कृषि-यंत्र एवं रासायनिक उर्वरकों का वितरण, पौध संरक्षण हेतु कीटनाशक दवाओं का प्रदाय, प्राकृतिक विपदाओं से होने वाली हानि का क्षतिपूर्ति के लिए कृषकों के लिए ‘फसल बीमा योजना’ इत्यादि प्रमुख हैं।
इसके अतिरिक्त राज्य में दलहन तथा तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देने हेतु ‘राष्ट्रीय तिलहन विकास परियोजना’ एवं तिलहन उत्पादन कार्यक्रम भारत सरकार की 75 प्रतिशत वित्तीय सहायता से क्रियान्वित किए जा रहे हैं।नवोदित छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले तीन वर्षों के दौरान ‘राजीव किसान मितान अभियान’ को प्रारंभ किया है। प्रदेश में पाँच नए कृषि महाविद्यालयों की स्थापना की है, जो जगदलपुर, बिलासपुर, अम्बिकापुर, धमतरी तथा दुर्ग में हैं। रायपुर में एक निजी उद्यानिकी महाविद्यालय की स्थापना हुई हैं।कृषि जलवायु की स्थिति एवं फसल क्षेत्र : राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान परियोजना के अन्तर्गत इस पूरे इलाके को तीन मुख्य कृषि जलवायु इकाइयों के रूप में इस प्रकार विभाजित किया गया है-
1. छत्तीसगढ़ का बेसिन – रायगढ़, बिलासपुर, कोरबा, रायपुर, दुर्ग, राजनांदगाँव, कवर्धा, महासमुंद, जांजगीर, धमतरी 2. दण्डकारण्य का पठार – बस्तर, दंतेवाड़ा, काँकेर 3. नागपुर का पठार (झारखंड) -सरगुजा, कोरिया, जशपुरनगर
इस सम्पूर्ण क्षेत्र की औसत वर्षा 1400 मि.मी. है। इसमें से 90 प्रतिशत वर्षा दक्षिणी मानसून (जून से लेकर सितम्बर तक) से प्राप्त होती है। कृषि जलवायु क्षेत्रों में छत्तीसगढ़ का मैदानी भाग सबसे बड़ा है। इस क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की मिट्टियाँ पायी जाती हैं, जिनमें भाठा, मटासी, डोरसा एवं कन्हार हैं। कन्हार भूमि धान की खेती के लिए उपयुक्त होती है। बस्तर में भुइँहा के (भूमि) के अनेक प्रकार हैं। इनमें गभार या धार-गहरी या झिलान भूमि धनाई खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। काली भूमि कन्हार का ही प्रतिरूप है। मरान, भरी जमीन को कहते हैं। यह बिना मेड़पार वाली, हल्की जमीन है, जिसमें कोदो, कुटकी वगैरह पैदा होते हैं।
कृषि, फसलों का क्षेत्रीय वितरण, कृषि का नियोजित विकास और हरित क्रांति : कृषि छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था का मेरूदण्ड है। कृषि समूची अर्थव्यवस्था की मूलभावना को प्रभावित करती है। छत्तीसगढ़ की गरीबी के उन्मूलन में इसका महत्वपूर्ण योगदान है, क्योंकि अधिकतर निर्धन समूह की आजीविका का प्रमुख साधन कृषि ही है। भविष्य में ‘रिलीम’ छत्तीसगढ़ के कृषि उत्पादों के विकास में खलल डाल सकती है और उन चुनौतियों का सामना छत्तीसगढ़ को करना होगा।
कृषि और फसलों का क्षेत्रीय वितरणः छत्तीसगढ़ के निवासियों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। धान यहाँ की प्रमुख फसल है। यहाँ के समूचे क्षेत्र में धान की पैदावार के कारण इसे धान का कटोरा कहा जाता है। छत्तीसगढ़ में लगभग बीस हजार किस्मों के धान का संग्रह किया गया है। यहाँ धान का उत्पादन प्रमुखतया दुर्ग, राजनांदगाँव, बिलासपुर, कोरबा, कांकेर, बस्तर तथा दंतेवाड़ा जिलों में होता है। धान के अतिरिक्त गेहूं, मक्का, ज्वार, बाजरा व कोदों आदि फसलें भी हैं। दलहन और तिलहन की भी खेती होती है। छत्तीसगढ़ की प्रमुख दलहन फसल तिवरा है। अन्य दलहनों में चना, तुअर, उड़द, कुल्थी तथा मूंग आदि प्रमुख हैं। अलसी यहाँ की प्रमुख तिलहन फसल है। मूंगफली की खेती रायगढ़ व जशपुर जिलों में होती है। यहाँ छत्तीसगढ़ की कृषि उपज एवं उत्पादक क्षेत्र की तालिका प्रस्तुत है-
कृषि उपज उत्पादक क्षेत्र धान (चांवल) दुर्ग, रायपुर, राजनांदगाँव, बिलासपुर, सरगुजा, बस्तर, गन्ना रायपुर, बिलासपुर, बस्तर तुअर (अरहर) सरगुजा, रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, कवर्धा, राजनांदगाँव तिलहन बस्तर, बिलासपुर, राजनांदगाँव, रायपुर, दुर्ग, सरगुजा, कोरिया, दंतेवाड़ा मूँगफली जशपुर, कोरिया, मेस्ट रायगढ़ सनई रायगढ़ अलसी राजनांदगाँव, कवर्धा, दुर्ग, रायपुर गेहूँ दुर्ग, बिलासपुर, रायपुर, धमतरी, महासमुंद, रायगढ़, कवर्धा मक्का-ज्वार सरगुजा, कोरिया, कांकेर, दंतेवाड़ा बाजरा बस्तर, दंतेवाड़ा, काँकेर, रायगढ़, जशपुर चना बिलासपुर, राजनांदगाँव, कवर्धा, दुर्ग, जांजगीर-चाम्पा मूँग रायगढ़, जशपुर, रायपुर, बिलासपुर
छत्तीसगढ़ को प्रकृति ने विशाल कृषियोग्य भूमि की देन दी है। इस समय राज्य के 40 प्रतिशत भूमि पर खेती होती है। राज्य की विशेष भौगोलिक स्थिति, भूमि के प्रकार और प्रमुख फसलों के उत्पादन को दृष्टिगत रख उसे स्थूल रूप से चावल का क्षेत्र या ‘धान का कटोरा’ के रूप में ही परिभाषित किया जा सकता है। इस प्रदेश में विभिन्न प्रकार की जमीनें पायी जाती हैं और इसलिए यहाँ अनेक प्रकार की फसलें विभिन्न कृषि-पद्धतियों द्वारा उत्पन्न की जाती है, किन्तु धान ही इस प्रदेश की प्रमुख फसल है। यहाँ धान की खेती के लिए अनेक पद्धतियाँ अपनाई जाती हैं, जिनमें से रोपण विशेष प्रचलित है। धान पैदा करने की ‘बिआसी पद्धति’ भी अधिक लोकप्रिय है। इसी प्रकार अन्य क्षेत्रों में भूमि के प्रकार, वर्षा और सिंचाई की सुविधाओं के अनुसार पद्धतियाँ अपनाई जाती है।
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