गीतोपनिषद् का सत्य: भगवद्गीता को कृष्ण-वाणी के रूप में ही समझो

भगवद्गीता | भगवद्गीता को गीतोपनिषद् भी कहा जाता है। यह वैदिक ज्ञान का सार है और वैदिक साहित्य का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपनिषद् है। निस्सन्देह भगवद्गीता पर अँग्रेजी भाषा में अनेक भाष्य प्राप्त हैं, अतएव यह प्रश्न किया जा सकता है, कि एक अन्य भाष्य की क्या आवश्यकता है? इस प्रस्तुत संस्करण का प्रयोजन इस प्रकार बताया जा सकता है: हाल ही में एक अमरीकी महिला ने मुझसे भगवद्गीता के एक अँग्रेजी अनुवाद की संस्तुति चाही। निस्सन्देह अमरीका में भगवद्गीता के अनेक अँग्रेजी संस्करण प्राप्त हैं, लेकिन जहाँ तक मैंने देखा है, केवल अमरीका ही नहीं, अपितु भारत में भी कठिनाई से कोई प्रामाणिक संस्करण मिलेगा, क्योंकि लगभग हर एक संस्करण में भाष्यकार ने भगवद्गीता यथारूप के मर्म का स्पर्श किये विना अपने मतों को व्यक्त किया है।भगवद्गीता का मर्म भगवद्गीता में ही व्यक्त है।
यह इस प्रकार है: यदि हमें किसी औषधि विशेष का सेवन करना हो तो उस पर लिखे निर्देशों का पालन करना होता है। हम मनमाने ढंग से या मित्र की सलाह से औषधि नहीं ले सकते। इसका सेवन लिखे हुए निर्देशों के अनुसार या चिकित्सक के आदेशानुसार करना होता है। इसी प्रकार भगवद्गीता को इसके वक्ता द्वारा दिये गये निर्देशानुसार ही ग्रहण या स्वीकार करना चाहिए। भगवद्गीता के वक्ता भगवान् श्रीकृष्ण हैं। भगवद्गीता के प्रत्येक पृष्ठ पर उनका उल्लेख भगवान् के रूप में हुआ है। निस्सन्देह भगवान् शब्द कभी-कभी किसी भी अत्यन्त शक्तिशाली व्यक्ति या किसी शक्तिशाली देवता के लिए प्रयुक्त होता है, और यहाँ पर भगवान् शब्द निश्चित रूप से भगवान् श्रीकृष्ण को एक महान पुरुष के रूप में सूचित करता है।
किन्तु साथ ही हमें यह जानना होगा कि भगवान् श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, जैसा कि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्क स्वामी, श्री चैतन्य महाप्रभु तथा भारत के वैदिक ज्ञान के अन्य विद्वान आचार्यों ने पुष्टि की है। भगवान् ने भी स्वयं भगवद्गीता में अपने को परम पुरुषोत्तम भगवान् कहा है और ब्रह्म-संहिता में तथा अन्य पुराणों में, विशेषतया श्रीमद्भागवतम् में, जो भागवतपुराण के नाम से विख्यात है, वे इसी रूप में स्वीकार किये गये हैं (कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्) । अतएव भगवद्गीता हमें भगवान् ने जैसे बताई है, वैसे ही स्वीकार करनी चाहिए।
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