प्रेरणा

युवाओ की ऊर्जा एवं बुजुर्गो का अनुभव

उनकी परवाह मत करो, उनके पास तो बस शिकायतें ही शिकायतें हैं।’ एल्विन टोएफलर ने अपनी मशहूर किताब फ्यूचर शॉक में इसको अभिव्यक्त किया है। शायद यह हमेशा से रहा है कि पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी को नासमझ और भटका हुआ समझती है और नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी की परवाह नहीं करती। यह इसी मतभेद और विरोधाभास का नतीजा है कि दोनों पीढ़ियाँ हमेशा एकदूसरे के प्रति विरोधाभासी होती हैं।अब आज के दौर को ही लें। साहित्यकारों से लेकर समाजशास्त्रियों तक की एक मुकम्मिल पुरानी पीढ़ी, आज के युवाओं को बेपरवाह, लापरवाह, भटकी हुई और गलत दिशा का राही मानती है; जबकि किशोर इस विस्फोटक सूचना के प्रौद्योगिकी युग में पुरानी पीढ़ी को चुका हुआ समझता है।पुरानी पीढ़ी के पारंपरिक बुद्धिजीवी नई पीढ़ी को अपने ढंग से परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं और नई पीढ़ी उनकी इस हास्यास्पद कोशिश पर तरस खा रही है।

नई पीढ़ी के साथ अपने दबाव और अपनी समस्याएँ होती हैं तो यह भी सही है कि उसकी अपनी एक सहूलियत भी होती है।नई पीढ़ी अगर पुरानी पीढ़ी से कुछ मामलों में पीछे होती है तो बहुत मामलों में आगे भी होती है, लेकिन यह विरोधाभास ज्यादातर लोगों की समझ में नहीं आता। इसलिए नई और पुरानी पीढ़ी के बीच मतभेद होते हैं। दोनों ही पीढ़ियाँ एकदूसरे के महज नकारात्मक पहलुओं पर ही दृष्टि केंद्रित करती हैं और नतीजा यह होता है कि दोनों एकदूसरे को समझ नहीं पातीं और खारिज कर देती हैं।कुछ बुजुर्गों का कहना है कि नई पीढ़ी पूरी तरह से मुगालते में है। वह भटकी हुई है। भ्रम में जी रही है। नई पीढ़ी जिसे अपनी सफलता, अपनी आजादी, रंगों और सपनों से भरी अपनी दुनिया मान रही है, वह दरअसल एक धोखा है और हकीकत में वह उसके पतन की प्रक्रिया है।नई पीढ़ी को लगता है कि वह नृत्य कर रही है, लेकिन वह नृत्य नहीं कर रही, बल्कि उनके पैरों के नीचे की धरती हलचल करते हुए खिसक रही है।

दरअसल उनकी उछल-कूद उनके पैरों के नीचे से खिसकती जमीन का नतीजा है।अगर इस कल्पना की नकारात्मकता की तह तक पहुँचेंगे तो केवल कल्पना ही नजर आती है। आखिर नई पीढ़ी क्यों और कैसे इस कदर मुगालते में हो सकती है ? क्या उसके सपने काल्पनिक हैं? क्या उसकी महत्त्वाकांक्षाएँ महज रूमानियत से भरी और अव्यावहारिक हैं ? क्या वह मेहनत नहीं करती ? क्या वह नया नहीं सोचती ? क्या उस पर बेहतर साबित होने के दबाव नहीं हैं? क्या वह कल्पनाशील नहीं है ? क्या वह दुनिया के तमाम खतरों से परिचित नहीं है ?हैरानी होती है, जब कोई पूरी पीढ़ी के बारे में एकतरफा नजरिया बना लेता है और वह भी बेहद नकारात्मक नजरिया। नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी शायद इसलिए समझ नहीं पा रही है, क्योंकि बदलाव की जिस रफ्तार से नई पीढ़ी गुजर रही है और बदलाव की जिस तेज रफ्तार में नई पीढ़ी ने आँखें खोली हैं, उससे पुरानी पीढ़ी कदमताल कर पाने में खुद को असमर्थ पा रही है।इस पीढ़ी ने वास्तविक ग्लोबल जेनरेशन की अवधारणा के विकास क्रम के दौर में आँखें खोली हैं और पुरानी पीढ़ी ने सिर्फ नीति-वचनों में ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसे आप्त वचन पढ़े हैं।

इस पीढ़ी का भावनाओं से कम, वास्तविकता से ज्यादा लेना-देना है। पुरानी पीढ़ी वास्तविकताओं में कम और भावनाओं में ज्यादा जीती है।यह पीढ़ी अगर सचमुच में ग्लोबल जेनरेशन है, भूमंडलीय पीढ़ी है तो इसका मतलब सिर्फ यह नहीं है कि नई पीढ़ी सिर्फ और सिर्फ बुराइयों या खामियों का ही वैश्विक विस्तार कर रही है। नई पीढ़ी अपनी खूबसूरत, मौलिक ऊर्जा, कल्पनाओं, क्षमताओं, कोशिशों और सपनों को भी एकदूसरे के साथ बाँटती है।इसी युग ने हिंदुस्तानी युवाओं को डिस्कवरी और हिस्ट्री जैसे चैनल भी दिए हैं, जो इतना ज्ञान परोसते हैं, जो बड़ी-बड़ी लाइब्रेरियों तक में नहीं है।

अगर ग्लोबल जेनरेशन एकदूसरे के ऐबों से रूबरू हुई है तो एकदूसरे की खूबियों से भी तो परिचित हुई है। आज कितने बच्चे हैं, जो दुनिया के किसी भी कोने के बारे में सटीक और वास्तविक जानकारी रखते हैं।यह सब इसी इंटरनेट के सूचना विस्तार का ही तो नतीजा है। पुरानी पीढ़ी को लगता है कि नई पीढ़ी सिर्फ-और-सिर्फ बुराइयाँ सीखती है। खराब लोगों में भी अच्छाइयाँ होती हैं और अच्छे लोगों में भी खराबियाँ होती हैं। नया और भविष्य, अगर इतने ही खराब होते तो दुनिया कभी आगे न बढ़ती, बल्कि आगे बढ़ने के बजाय पीछे खिसकती जाती।

जबकि तथ्य, आँकड़े और इतिहास इस बात की तस्दीक करते हैं कि दुनिया का लगातार विकास हो रहा है। इनसान लगातार मानवीय हो रहा है, दोस्ताना हो रहा है और दुनिया लगातार बेहतर हो रही है। कुछ थोड़े-से क्षेत्रों को छोड़कर जहाँ हम अगर पहले आज से बेहतर थे तो अपनी कोशिशों के कारण नहीं, बल्कि कुछ न करने के कारण।आवश्यक है कि नई पीढ़ी अपनी नवीन सूचनाओं को परस्पर बाँटे और पुरानी पीढ़ी अपने अनुभवों से उनको नवीन दिशा प्रदान करने में सहायक बने। युवाओं की ऊर्जा, साहस और मनोबल को जब बुजुर्गों का अनुभव एवं समझदारी का साथ मिल जाता है तो सारी समस्याओं का समाधान हो जाता है, जो कि आज के इस दौर में अत्यधिक आवश्यक प्रतीत होता है।

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