“स्व” की वैज्ञानिक अवधारणा

हमारे जीवन के कुछ ऐसे पहलू हैं, जिन्हें हम लगभग सुनिश्चित मानकर चलते हैं। हो सकता है कि हमारे आस-पास के परिवेश या वातावरण में कुछ ऐसे तत्त्व या आयाम हों, जिनको कि हम पूर्ण विश्वास के साथ न मानते हों, परंतु हमारे स्वयं के अस्तित्व को, ‘हम हैं’ इस भाव को तो जीवन्मुक्त व्यक्तित्व के अतिरिक्त लगभग हर कोई मानकर के ही चलता है। दार्शनिक दृष्टि से यदि कोई अपने होने के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाता है तो भी यह प्रश्न उठता है कि प्रश्नचिह्न लगाने वाला आखिर कौन है ? वह कौन है, जो अपने या किसी अन्य के अस्तित्व पर शंका व्यक्त कर रहा है ?अभी तक इस तरह की जिज्ञासाएँ दार्शनिक एवं बौद्धिक मनोविनोद का हिस्सा हुआ करती थीं, परंतु विगत दिनों वैज्ञानिकों द्वारा इस विषय पर किए गए शोधों के परिणाम अविस्मरणीय आए हैं, जिनमें ‘स्व’ को परिभाषित करने का प्रयत्न व किया गया है। उन शोधों की गहराई में जाने से पूर्व इस विषय में चिंतन कर लेना अनिवार्य होगा कि हम ‘स्व’ को सामान्य रूप से कैसे परिभाषित करते रहे हैं, क्योंकि हमारी अपने प्रति मान्यताओं के कुछ सार्वभौम आधार सदा से हमारे जीवन का हिस्सा रहे हैं।
पहला तो यह कि हम स्वयं को अपरिवर्तनशील एवं नित्य मानते हैं। हमारे स्वयं के अस्तित्व पर विश्वास करने के मूल आधारों में से यह एक है। इस मान्यता का अर्थ यह नहीं कि हम यह मानते हैं कि हममें या हमारे व्यक्तित्व में कोई परिवर्तन नहीं होता, वरन इस मान्यता का आधार यह है कि हमारे साथ घटने वाले बाह्य परिवर्तनों के मध्य में हमारे भीतर कुछ या कोई ऐसा है, जिसे हम सदा अपरिवर्तनशील मानते हैं।दूसरा, हमारा ‘स्व’ हमारी दृष्टि में एक समन्वयकर्त्ता की भूमिका निभाता है। जैसे, हमारी आँखें अपने आप में अकेले केवल देखने का कार्य करती हैं, कान सुनने का, नाक सूँघने का, त्वचा स्पर्श का और अन्य सभी अंग भी अलग-अलग अपने-अपने निर्धारित कार्यों को संपादित करते हैं, पर जिसे हम ‘स्व’ के नाम से पुकारते हैं-वह ‘स्व’ इन सारी भिन्न-भिन्न सूचनाओं, अनुभवों, अनुभूतियों को एकत्र करके, एक समझने योग्य, बोधगम्य अनुभव में बदलता है।तीसरा हमारी दृष्टि में ‘स्व’ वह है, जो कर्त्ता की भूमिका का निर्वहन करता है।
चाहे मन में उठने वाले विचार हों या हृदय में अनुभव होने वाली भावनाएँ- जब उनके ऊपर क्रियान्वयन करने का समय आता है तब ‘स्व’ ही है, जो कर्ता के रूप में, कर्म करने वाले के रूप में उभरकर सामने आता है। सतही दृष्टि से देखने पर संभवतया यही वो कुछ प्रमुख गुण हैं, जिन्हें कोई ‘स्व’ को परिभाषित करते समय सूची में अवश्य रखना चाहेगा।विगत दिनों वैज्ञानिक जगत् में हुए शोधों ने इन मूलभूत या आधारभूत विश्वासों पर कुछ ऐसा प्रहार किया है कि अब लगता है कि आधुनिक विज्ञान भी वेदांत दर्शन की भाषा को बोल रहा हो। उदाहरण के तौर पर इस वैज्ञानिक तथ्य से सभी परिचित हैं कि प्रकाश की गति, ध्वनि की गति से कई गुना तीव्र होती है और इसीलिए हमें कोई घटना घटती पहले दिखाई पड़ती है, परंतु उससे संबंधित ध्वनि बाद में अनुभव होती है।वैज्ञानिक लंबे समय से इस विषय पर शोध कर रहे थे कि इन दोनों भिन्न-भिन्न संवेदनों को हमारा मस्तिष्क एक साथ किस तरह समायोजित करता है कि यह हमको एक समग्र अनुभव की तरह प्रतीत हो।
यह एक रोचक तथ्य है कि विगत शोधों का यह परिणाम निकलकर आया है कि वे ये इशारा करते हैं कि हम इनका निर्णय अंतर्ज्ञान या यों कहें कि इन्ट्यूशन के आधार पर लेते हैं। यदि यह एक ऐसा अनुभव है, जिसे मस्तिष्क पहले कभी कर चुका है तो वो दो अलग-अलग संवेदनों को एक करने का निर्णय अपने आप ले लेता है। इस तथ्य की पुष्टि के लिए वैज्ञानिकों ने एक सामान्य-सा परीक्षण पहले किया, जिसे अब ‘बीटा फीनोमिना’ के नाम से जाना जाता है।इसमें व्यक्ति को पहले एक स्क्रीन के कोने में एक चमकीला धब्बा जैसा दिखाया गया, जिसके तुरंत बाद वैसे ही धब्बे को उससे भिन्न स्थान पर प्रकाशित किया गया।
यद्यपि ये दोनों अलग-अलग अनुभव थे, परंतु हमारा मस्तिष्क इनको एक निरंतरता में अनुभव करता है और उसे ऐसा लगता है कि मानो वही धब्बा स्क्रीन में अनेक स्थान पर घूम रहा है।परिणाम से यह स्पष्ट था कि दो भिन्न संवेदनों के मध्य के रिक्त स्थान को भरने का कार्य मस्तिष्क अपने आप ही कर देता है। इसका अर्थ यह है कि हमारा ‘स्व’ अपने अनुसार संवेदनों के एकत्रीकरण एवं एकसूत्रीकरण का कार्य करता है। यदि ऐसा है तो प्रश्न उभरता है कि हमारे अनुभवों में क्या सत्य और क्या मिथ्या ?
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि संभवतया मस्तिष्क में अनेक तंत्रिकाएँ बिना किसी केंद्रीकृत व्यवस्था के इस कार्य को कर देती हों। इसी सिद्धांत को मनोवैज्ञानिक भी अब आत्ममुग्धता या आत्मभ्रम, जिसे चिकित्सकीय भाषा में सेल्फडिल्यूशन कहा जाता है, उसे समझने में करने लगे हैं।मनोचिकित्सकीय दृष्टि से यह सदा शोध का विषय रहा है कि आखिर किस कारण से एक व्यक्ति भ्रम का शिकार होता है और होते समय उसके ‘स्व’ को इसका अनुमान क्यों नहीं लग पाता कि यह विश्वास भ्रामक है। ऐसे भ्रम ही सिजोफ्रेनिया से लेकर अन्य साइकोटिक मनोरोगों का कारण बनते हैं और कभी-कभी तो ये भ्रामक विश्वास व्यक्ति के लिए जानलेवा सिद्ध होते हैं।वैज्ञानिक शोध अब यह निष्कर्ष निकालते हैं कि ऐसा इसलिए, क्योंकि यह भ्रम मन से हटकर किसी अन्य व्यवस्था द्वारा निर्धारित होता है और मन तो मात्र उसके क्रियान्वयन का आधार बनता है, पर क्या ये अन्य तत्त्व भारतीय योग विज्ञान में वर्णित चित्त नहीं है?योगसूत्र में इसीलिए महर्षि पतंजलि ने चित्त एवं चित्त की भूमियों की व्याख्या कर्म-संस्कार के आधार पर की है।
उस दृष्टि से देखने पर मनोचिकित्सा में वर्णित ‘डिपर्सनलाइजेशन डिसऑर्डर’ को समझना भी आसान हो जाता है, जिसमें व्यक्ति अपने को आस-पास के परिवेश से विच्छिन्न पाता है।फिर वैज्ञानिक शोधों के आधार पर एक और प्रश्न उभरता है, जिसे भारतीय दर्शन सदा से परिभाषित करता रहा है। यह प्रश्न इस बात का है कि यद्यपि हम स्वयं को या ‘स्व’ को सदा वर्तमान में मानते रहे हैं, परंतु विगत दिनों हुए वैज्ञानिक शोधों ने यह प्रमाणित किया है कि फ्लैश-लेग इल्यूशन’ में हमारा मस्तिष्क अतीत की घटनाओं को वर्तमान में अनुभव कर रहा होता है। यही कारण है कि पुरानी स्मृतियाँ कभी-कभी इतनी ताजा लगती हैं कि मानो तुरंत ही घटी हों। यह शोध भी भारतीय चिंतन के इस भाव की पुष्टि करता है कि समय एवं काल दो भिन्न आयाम हैं।
इसके साथ ही वैज्ञानिक शोधें ये भी प्रमाणित करती हैं कि हम यदि ‘स्व’ के रूप में अपने शरीर के भीतर ही स्थित होते तो ‘हिप्नोगोगिक’ या ‘हिप्नोपोम्पिक’ जैसे अनुभव इनसान को नहीं होते, जिसमें व्यक्ति को लगता है कि वह कुछ देर के लिए अपने शरीर से बाहर निकल गया है।प्रश्न उठता है कि यदि ‘स्व’ शरीर के भीतर स्थित है तो फिर वह कौन है, जो शरीर से बाहर निकलने का अनुभव करता है। कुछ ऐसा ही अनुभव महर्षि रमण को अपने बचपन में हुआ था। भारतीय अध्यात्म की दृष्टि से तो यह स्व या आत्मा, सदा से मन से भिन्न रहा है। यह एक सुखद बदलाव है कि अब विज्ञान भी धीरे-धीरे उसी भाषा को अपना रहा है। संभवतया पूज्य गुरुदेव द्वारा प्रतिपादित वैज्ञानिक अध्यात्म की दिशा में यह एक महत्त्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।
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