एकत्व’ की अनुभूति: परम चेतना से जुड़ने का दिव्य मार्ग

विविधता से भरे इस संसार में एक चेतन सत्ता विद्यमान है, जिसकी तरंगें ही स्थूल से लेकर सूक्ष्मजगत् का निर्माण करती दिखाई पड़ती हैं। वह परमशक्ति, परमेश्वर, परमात्मा ही ‘एकत्व’ का प्रतीक है, जिसे विभिन्न पथों में, विभिन्न नामों से पुकारा गया है। उसी एक तत्त्व से यह सारा संसार जन्मता है और फिर उसी में विलीन भी हो जाता है।जाने-अनजाने हम सभी उसी की ओर बढ़े चले जा रहे हैं। जिस तरह अपने उद्गम से निकलने के बाद नदी, सागर से मिलने के बाद ही पूर्ण विराम पाती है- वैसे ही, हम सभी अपना गंतव्य न जानते हुए भी निरंतर उसी परम चेतना की ओर बढ़ते चले जा रहे हैं।यही कारण है कि समस्त आध्यात्मिक अनुसंधान एकत्व की प्राप्ति, एकत्व की अनुभूति को ही जीवन का परम लक्ष्य मानते हैं।यह जानकर ही श्रुति कहती है कि- यथा सौम्य वयांसि वासोवृक्षं संप्रतिष्ठन्तो । एवं हवै तत् सर्वं पर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥ अर्थात हे सौम्य ! जिस तरह से पक्षीगण अपने वास वृक्ष में आकर ही स्थिर होते हैं, उसी प्रकार यह सारा संसार परमात्मा में ही प्रतिष्ठित होता है।
उसी एक परमात्मा की चेतना सभी के भीतर समायी हुई एवं क्रीड़ा-कल्लोल करती हुई दिखाई पड़ती है। दार्शनिक दृष्टि से कहें तो भासित होने वाली संसार की अनेकता-अखंडता में एकता-अखंडता का दर्शन करना ही तत्त्वज्ञान है। इसीलिए ज्ञानियों ने कहा है कि-एकधैवानुद्रष्टव्यमेतहप्रमेयं ध्रुवम् ॥अर्थात सृष्टि की विचित्रता व विभिन्नता में भी अपरिमेय ध्रुव की एकता देखनी होगी। कहने का अर्थ स्पष्ट है कि सर्वत्र एक ही परमात्मा विद्यमान है। हम सभी उसी से गुँथे हुए हैं।यदि उस ‘एकत्व’ की अनुभूति मनुष्य को हो जाए तो सभी तरह के भेद-विग्रह समाप्त हो जाते हैं। इसलिए प्रयत्न यही करें कि अपने हृदय की भावनाओं, चिंतन एवं चेष्टाओं को उस ‘एकत्व’ को समर्पित कर दें। आत्मकल्याण एवं विश्वकल्याण का यही सर्वश्रेष्ठ उपाय है। इसी पथ पर चलने की आवश्यकता सभी को है।
एक दुर्बल व्यक्ति संत सुकरात के पास गुरुदीक्षा लेने पहुँचा। सुकरात उसे एक बिना पेंदी का लोटा दिखाते हुए बोले- “दीक्षा लेने से पहले तुम इस लोटे में पानी भर लाओ।” वह व्यक्ति आश्चर्यचकित होकर बोला- “आप भी क्यों मजाक करते हैं। भला इसमें पानी कैसे ठहरेगा?” सुकरात बोले- “तो वत्स ! बिना शरीर को संयमित और दृढ़ किए तुम ब्रह्मतेज कैसे सँभालोगे ? पहले शरीर मजबूत करो, फिर मन को साधना।” सुकरात का कहा उस व्यक्ति की समझ में आ गया।
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