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30 रुपये से सुपरस्टार तक: देव आनंद की संघर्ष, सफलता और शोहरत की प्रेरक कहानी

देव आनंद की सफलता की कहानी संघर्ष, टैलेंट और लगन का एक उदाहरण है, जहाँ पंजाब के एक साधारण परिवार से आए धरमदेव पिशोरिमल आनंद सिर्फ़ 30 रुपये लेकर मुंबई आए और अपनी आकर्षक पर्सनैलिटी और ज़बरदस्त एक्टिंग से हिंदी सिनेमा के “आनंद” बन गए। उन्होंने ‘बाज़ी’, ‘गाइड’ और ‘जॉनी मेरा नाम’ जैसी कई हिट फ़िल्में दीं और पद्म भूषण और दादासाहेब फाल्के पुरस्कार जैसे सम्मान हासिल किए। उनके भाइयों ने भी उनकी सफलता में अहम भूमिका निभाई, अपने डायरेक्शन और स्क्रीनराइटिंग से उनकी फ़िल्मों को बेहतर बनाया। 26 सितंबर, 1923 को पंजाब के गुरदासपुर में जन्मे देव आनंद ने लाहौर में पढ़ाई की, लेकिन पिता की आर्थिक तंगी के कारण उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी और वे सिर्फ़ 30 रुपये लेकर फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी किस्मत आज़माने मुंबई आ गए।

उन्होंने शुरू में ‘हम एक हैं’ (1946) से डेब्यू किया, लेकिन ‘ज़िद्दी’ (1948) और ‘बाज़ी’ (1951) जैसी फ़िल्मों से पहचान मिली। ‘बाज़ी’ ने ‘बॉम्बे नॉयर’ जॉनर की फ़िल्मों की नींव रखी और देव आनंद को एक स्टार के तौर पर स्थापित किया। उन्होंने ‘टैक्सी ड्राइवर’, ‘सी.आई.डी.’, ‘काला पानी’, ‘गाइड’, ‘जॉनी मेरा नाम’ और ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ जैसी कई सदाबहार फ़िल्में दीं, जो सभी बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रहीं। ‘गाइड’ (1965) को उनके करियर की सबसे अच्छी फ़िल्मों में से एक माना जाता है, जिसके लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड भी मिला। उनके भाइयों का साथ (द आनंद ब्रदर्स): उनके बड़े भाई चेतन आनंद ने ‘नीचा नगर’ (जिसे कान्स फ़िल्म फ़ेस्टिवल में अवॉर्ड मिला) और ‘टैक्सी ड्राइवर’ जैसी फ़िल्में बनाईं। उनके छोटे भाई विजय आनंद (गोल्डी) ने ‘गाइड’, ‘जॉनी मेरा नाम’ और ‘तेरे मेरे सपने’ जैसी कई हिट फ़िल्मों का डायरेक्शन किया, जिसने देव आनंद के करियर को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया।

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