50% टैरिफ से भारतीय अर्थव्यवस्था पर मंदी का खतरा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने से चालू वर्ष 2025-26 में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर में 0.4 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है। इस टैरिफ का असर कपड़ा, कीमती पत्थर, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, ऑटो पार्ट्स और एमएसएमई क्षेत्र पर पड़ सकता है। ट्रंप के इस कदम से न केवल भारत के निर्यात पर असर पड़ेगा, बल्कि श्रम-आधारित क्षेत्रों में रोज़गार का भी बड़ा संकट पैदा होगा।
6.4-6.6% विकास दर का जोखिम: बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्र विशेषज्ञ सोनल बधान का कहना है कि भारतीय वस्तुओं पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने से हमने जीडीपी में 0.2 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान लगाया था। अब 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया गया है। अगर भारत व्यापार वार्ता में टैरिफ दर कम करने में विफल रहता है, तो इससे चालू वित्त वर्ष में 6.4-6.6 प्रतिशत की विकास दर हासिल करने में जोखिम पैदा होगा।
व्यापार अब संभव नहीं: बैंकिंग और बाजार विशेषज्ञ अजय बग्गा ने कहा कि 50 प्रतिशत का भारी टैरिफ भारत के लिए बड़ा झटका है। लेकिन, सच कहूँ तो, एक बार जब यह 25 प्रतिशत को पार कर जाता है, चाहे टैरिफ 1,000 प्रतिशत हो या 5,000 प्रतिशत, व्यापार संभव नहीं रह जाता। उन्होंने कहा, क्रिसमस के ऑर्डर तैयार हैं। शिपमेंट तैयार हैं। ऐसे में निर्यातकों को भारी नुकसान होगा। अगर एक अरब डॉलर का कपड़ा निर्यात रुक जाता है, तो एक लाख कर्मचारी सीधे तौर पर प्रभावित होंगे।
संतुलित समाधान की आवश्यकता: वैश्विक पेशेवर सेवा संगठन ईवाई इंडिया के व्यापार नीति प्रमुख अग्निश्वर सेन ने अतिरिक्त टैरिफ को अनावश्यक बताया। उन्होंने कहा, राजनीतिक मतभेद बातचीत और स्थापित मंचों के ज़रिए सुलझाए जा सकते हैं, ऐसे उपायों से नहीं। उम्मीद है कि भारत सरकार अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखेगी और एक संतुलित समाधान निकालने की कोशिश करेगी। खरीदारों ने अब निर्यात ऑर्डर रोकने शुरू कर दिए हैं: भारतीय निर्यात संगठनों के महासंघ, फियो ने कहा, भारतीय वस्तुओं पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अमेरिका का फैसला बेहद चौंकाने वाला है। इस कदम से अमेरिका को होने वाले 55 प्रतिशत निर्यात पर असर पड़ेगा। कम प्रतिशोधात्मक शुल्क वाले देशों की तुलना में भारतीय निर्यातकों को 30-35 प्रतिशत का प्रतिस्पर्धात्मक नुकसान होगा। फियो के अध्यक्ष एससी रल्हन ने कहा, “कई खरीदार अब उच्च शुल्कों के कारण निर्यात ऑर्डर रोक रहे हैं। एमएसएमई के लिए उच्च लागत वहन करना आसान नहीं है। इससे उद्योगों को पुराने ग्राहक खोने पड़ सकते हैं।”
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