Motivation: आत्मदेवता

Motivation| प्रेरणा: इस संसार में ऐसे देवताओं की संख्या असीमित हैं, जिन्हें आज तक किसी ने देखा शायद न हो, अनेकों ऐसे भी होंगे, जिन्हें कुछ लोग मानते होंगे, पर अनेकों नहीं। इसके साथ ही अनेकों के पूजा- विधान में भी एकरूपता या मतैक्य दिखाई नहीं पड़ता। इसीलिए पूजा-उपासना के क्षेत्र में विरोधाभासों, विग्रहों की कमी नहीं है।
परंतु परमपूज्य गुरुदेव ने हमारा परिचय एक ऐसे देवता से कराया, जो सभी तरह के विग्रहों से परे भी है और जिसकी उपासना सम्यक तरीके से करने पर उसका अनुग्रह एवं वरदान सुनिश्चित् हो जाता है। उन देवता का नाम है- आत्मदेव । पूज्य गुरुदेव ने कहा कि जो भी अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत बना पाते हैं और जो भी अपने चिंतन, चरित्र, व्यवहार का परिशोधन कर पाते हैं – उनके ऊपर आत्मदेव की अनुकंपा सुनिश्चित रूप से बरसती है।
आत्मदेव की उपासना करने के लिए आवश्यकता एक ही बात की है कि हम अपनी भावनाओं, आस्थाओं एवं मान्यताओं का अहर्निश परिष्कार करते चलें। जिस-जिस मात्रा में हमारे व्यक्तित्व का परिष्कार होता जाता है, हम उतना ही आत्मदेव की कृपा एवं अनुग्रह के अधिकारी बनते जाते हैं। जगाना हो तो अपने भीतर के देवता को जगाना ही श्रेष्ठ है, साधना हो तो अपने मन को साधना ही श्रेष्ठ है और बनाना हो तो अपना व्यक्तित्व बनाना ही श्रेष्ठ है। यही आत्मदेव की उपासना का मूलमंत्र है।
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