Chandrayan 3 : भारत की ऐतिहासिक उपलब्धि

Chandrayan 3 : चंद्रयान-3 की सफल लैंडिंग के साथ भारत ने एक नया इतिहास रच दिया है। इसरो के वैज्ञानिकों की इस ऐतिहासिक उपलब्धि के साथ जहाँ पूरा देश रोमांचित हुआ, वहीं समस्त भारतवंशियों के लिए विश्वभर में ये गर्व एवं गौरव के अविस्मरणीय * पल रहे। इसने जहाँ अंतरिक्ष में और आगे इसके गहन विस्तार में यात्राओं एवं खोज का मार्ग प्रशस्त किया, वहीं पूरे विश्व को भारत की अंतरिक्षीय क्षेत्र में अनुसंधान-क्षमता की धमक से भी गाढ़ा * परिचय करवाया।
हालाँकि चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की सतह पर * यह लैंडिंग इतनी आसान नहीं थी; क्योंकि यहाँ बड़े-बड़े गड्ढे हैं हैं। तथा तापमान माइनस 300 डिगरी फारेनहाइट तक नीचे जाता है। साथ ही यहाँ अंधकार की स्थिति कार्य को और कठिन बना देती है। आश्चर्य नहीं कि रूस का मून मिशन लूना-25 भारत की इस उपलब्धि के कुछ ही दिन पहले चाँद * की सतह से टकराकर क्रेश हो गया था।
भारत भी सन् 2019 में चंद्रयान-2 अभियान के दौरान ऐसी असफलता का दंश झेल चुका है, जब लैंडिंग के दौरान विक्रम लैंडर चंद्रमा की सतह पर टकराकर नष्ट हो था। हमारे वैज्ञानिकों ने गया इसकी गलतियों से सीख लेते हुए, अपने अथक श्रम, समर्पण एवं होशियारी के बल पर चंद्रयान 53 मिशन को सफल बनाकर, एक इतिहास रच दिया। आज भारत पूरे विश्व में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचने वाला पहला देश बन बन गया है। जिस भारत को कभी एलीट स्पेस क्लब में प्रवेश को • लेकर विदेशी अखबारों में मजाक भरे कार्टून छपते थे, भारत को इस एलीट ग्रुप के दरवाजे के बाहर गाय के साथ खड़े एक गरीब किसान के रूप में दरवाजा खटखटाता हुआ चित्रित किया जाता था तो वहीं इस सफल अभियान के साथ भारत ने न केवल एलीट स्पेस क्लब में धमाकेदार एंट्री की है, बल्कि वह सबके लिए एक मिसाल भी बन गया है।
पूरा विश्व भारत की इस अभूतपूर्व सफलता के साथ चमत्कृत है और आशा व उत्सुकता भरी दृष्टि के साथ भारत के अगले कदमों की ओर निहार रहा है, जिसमें उसे सूर्ययान, गगनयान, शुक्रयान जैसे अभिनव अभियानों के साथ अनंत आकाश में अपने रोमांचक अभियानों को अंजाम देना है। भारत की यहाँ तक की यात्रा इतनी सरल भी नहीं रही है। एक दीर्घकालीन संघर्ष, अथक श्रम एवं अध्यवसाय के बल पर देश इस मुकाम तक पहुँचा है। वैज्ञानिकों की पीढ़ियाँ इसमें खपी हैं, डॉ० विक्रम साराभाई से लेकर डॉ० अब्दुल कलाम आजाद, डॉ० के सिवान से लेकर डॉ० एस० सोमनाथन व सहयोगी वैज्ञानिकों तथा तकनीकी विशेषज्ञों की टीम के दशकों के कठोर श्रम व एकनिष्ठ समर्पण का यह सुखद परिणाम रहा है। निस्संदेह रूप में पूरा देश इनके त्याग-तप भरे कुशल नेतृत्व एवं प्रयासों के लिए हृदय की गहराइयों से कृतज्ञता एवं शुभकामनाओं से भरा हुआ है।
आजादी के बाद भारत ने अंतरिक्ष से जुड़े रहस्यों को जानने के लिए 16 फरवरी, 1962 को परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत इंडियन नेशनल कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च नामक यूनिट का गठन किया था। यूनिट गठन के साढ़े सात वर्ष पश्चात 15 अगस्त, 1969 को इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन अर्थात इसरो की स्थापना हुई। इसने सन् 1975 में रूस के सहयोग से अपने पहले कृत्रिम उपग्रह आर्यभट्ट का प्रक्षेपण किया, जिसके साथ देश ने अंतरिक्ष में अपने पैरों को जमाया। इसके बाद सन् 1980 में भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह रोहिणी का सफल प्रक्षेपण किया गया और फिर सन् 1994 में पीएसएलवी को लान्च किया। इस तरह भारत ने चंद्रयान से पहले अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए थे और उपग्रहों के प्रक्षेपण की स्वदेशी तकनीक को विकसित किया था।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और सोवियत संघ के इंटरकॉस्मिक कार्यक्रम के संयुक्त अभियान के अंतर्गत वर्ष 1984 में राकेश शर्मा ने आठ दिन तक अंतरिक्ष में रहकर इतिहास रचा था, जब वे अंतरिक्ष यात्रा करने वाले पहले भारतीय बने थे। सन् 2013 में इसरो ने मंगल ग्रह से जुड़ी जानकारियाँ जुटाने के उद्देश्य से मंगलयान छोड़ा। म जो अपनी किफायती तकनीकि व न्यूनतम खरचे में सफलता के लिए पूरे विश्व में चर्चा का विषय रहा। इस बीच स्वदेशी उपग्रह के निर्माण और उपग्रह स प्रक्षेपण की कम तुलनात्मक लागत के कारण ज वैश्विक स्तर पर भारत तेजी से आगे बढ़ता रहा। ज वर्ष 2017 में इसरो ने 104 उपग्रहों को एक साथ नि अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित करने का कीर्तिमान स्थापित किया था, जिसमें 101 स्वदेशी उपग्रह थे। ए इसके साथ भारत विश्व में सौ से अधिक उपग्रह भेजने वाला पहला देश बन गया था।
आश्चर्य नहीं कि आज भारत उपग्रहों के प्रक्षेपण म करने वाले पसंदीदा देशों में शीर्ष पर है। इसी तरह स चाँद पर जीवन की संभावनाओं को तलाशने के लिए इसरो ने तीन मिशन चलाए। चंद्रयान-1 का सफल प्रक्षेपण 22 अक्टूबर, 2008 को संपन्न हुआ था, जिससे चंद्रमा से जुड़े रहस्यों को जानने में सहायता मिली। प्रक्षेपण से मात्र आठ महीनों में ही चंद्रयान- 1 ने मिशन के सभी लक्ष्यों को पूरा कर लिया था। इस मिशन के अंतर्गत चंद्रमा के सतह पर जल तथा बरफ की खोज के साथ खनिज और रासायनिक तत्त्वों की पुष्टि हुई थी। साठ हजार से अधिक फोटो भेजने के साथ इसने चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्र के स्थायी रूप से छायादार क्षेत्रों में पहाड़ों तथा क्रेटर के दृश्यों को कैमरे में कैद किया था।
चंद्रयान-3 को इसी का अगला सफल चरण रहा। कभी साईकल पर रॉकेट लादकर अपने आकाशीय अभियान की शुरुआत करने वाला भारत आज इस क्षेत्र में एक विशेषज्ञ के रूप में स्थापित हो चुका है और अपनी स्वदेशी प्रतिभाओं तथा देशज तकनीक के बल पर उभरते भारत की धमक लिए गगनमंडल के अनंत विस्तार में अपने महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों का संधान कर रहा है। हर नागरिक, हर भारतवंशी के हृदय का इन पलों को अपने जीवनकाल में घटित होते हुए देखकर गर्व एवं गौरव-भाव से ओत-प्रोत होना स्वाभाविक है। निश्चित रूप से ये पल भारतवर्ष के जागरण के हैं, विश्वपटल पर उदय के हैं, जिसमें उसे न केवल अपना घर सँभालना है, बल्कि पूरे विश्व का नेतृत्व करना है, उसका मार्गदर्शन करना है।
अमृतकाल के इन विशिष्ट पलों में हर नागरिक एवं भारतवंशी का कर्त्तव्य बनता है कि वे अपने- अपने क्षेत्र में ऐसी ही लगन, निष्ठा व प्राणपण के साथ सृजनकार्य में जुट जाएँ और राष्ट्रनिर्माण के महायज्ञ में अपनी भावभरी आहुति देते हुए एक सुंदर, सुखी एवं खुशहाल विश्व के निर्माण में अपना योगदान दें तथा इस सुरदुर्लभ जीवन को सार्थक-सफल बनाएँ।
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