प्रेरणा

प्रभावशाली जीवन के स्वर्णिम सूत्र

 Motivation| प्रेरणा: सफलता हर व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, लेकिन चाहते हुए भी अधिकांश एक सफल जीवन नहीं जी पाते, जिसमें बाहरी उपलब्धियों के साथ जीवन में सार्थकता का बोध भी हो। इसी विषय पर अमेरिकी लेखक स्टीफन कॉवे की पुस्तक सेवेन हेबिट्स ऑफ हाईली इफेक्टिव पीपल, प्रखर मार्गदर्शन करती है।

व्यक्तिगत, सामाजिक तथा पेशेवर जीवन में सफलता को सुनिश्चित करने वाली इस पुस्तक में सात आदतों की चर्चा की गई है, जो हर प्रभावशाली व्यक्ति में पाई जाती हैं। पुस्तक में पूर्वी एवं पश्चिमी चिंतन के ज्ञान-सार को समेटते हुए लेखक ने अपने सफल व्यावसायिक जीवन के अनुभवों को साथ जोड़कर प्रस्तुत किया है। प्रस्तुत है पुस्तक में वर्णित सात स्वर्णिम सूत्रों का सार-संक्षेप ।

पहले चरण की आदत है, बी प्रोएक्टिव अर्थात अपने कर्मों की जिम्मेदारी लें और अपने समय व ऊर्जा को उन क्षेत्रों में केंद्रित करें, जो आपके प्रभावक्षेत्र में आती हों।

भविष्य में जो चुनौतियाँ आ सकती हैं, जिन समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, जिस तरह का उज्ज्वल भविष्य आप देखना चाहते हैं, इनके अनुरूप वर्तमान रणनीति पर विचार प्रोएक्टिव होने की आदत में शामिल है, जिससे कि हम वर्तमान कर्मों को ऐसा स्वरूप देते हैं कि भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए पूर्व से ही तैयार होते हैं, जिससे भविष्य में इच्छानुकूल अपेक्षित परिणाम आ सकें। ‘ 

एक प्रोएक्टिव व्यक्ति बनने के लिए आवश्यक हो जाता है कि हम अपने व्यक्तित्व व जीवन के हर आयाम से अधिकाधिक परिचित हों तथा उन चीजों के प्रति जागरूक हों, जिन्हें हम अपनी क्रियाओं द्वारा प्रभावित कर सकते हैं, बदल सकते हैं, न कि उन चीजों पर, जो हमारे प्रभावक्षेत्र से बाहर हैं व जिन्हें हम बदल नहीं सकते।

दूसरा चरण है, बिगिन विद दि एंड इन माइंड अर्थात अपनी रुचि, क्षमता, संभावना तथा यथास्थिति को देखते हुए अपने लक्ष्य का निर्धारण करना। यह अपने जीवनलक्ष्य से जुड़ी आदत है। हमारा जीवनलक्ष्य कितना स्पष्ट है, एक मिशन स्टेटमेंट के रूप में क्या यह परिभाषित है, जिसमें आपका जीवन-दृष्टिकोण परिलक्षित होता हो।

यह मायने रखता है और एक प्रभावशाली जीवन का निर्णायक तत्त्व रहता है। लक्ष्य स्पष्ट न होने पर जीवन के प्रति रवैया भी ढुलमुल रहता है, व्यक्ति के प्रयास आधे-अधूरे व शिथिल रहते हैं तथा जीवन में कहने योग्य सफलता अर्जित नहीं हो पाती, क्योंकि जीवन की शक्तियाँ इधर-उधर बिखरी रहती हैं।

इसी आधार पर आप अपने जीवन की नैया के खेवनहार की भूमिका में आ जाते हैं, अपने जीवन की पटकथा के लेखक की भूमिका में स्वयं को खड़ा पाते हैं। आप अपने भाग्य विधाता स्वयं बनते हैं।

प्रोएक्टिव माइंडसेट या मनःस्थिति के साथ यह जीवन-बोध मिलकर सुनिश्चित करते हैं कि आप जो भी निर्णय लेंगे, वे आपके अपने जीवन- ध्यय के साथ मेल खा रहे हैं, जैसा कि आप बनना चाहते हैं और आप अपने जीवन के लिए स्वयं पूरी तरह से जिम्मेदार रहते हैं।

तीसरे चरण की आदत है, पुट फर्स्ट थिंग फर्स्ट, अर्थात यह समय प्रबंधन से जुड़ा पहलू है। यहाँ निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप अपनी प्राथमिकताओं को परिभाषित करना होता है। इस चरण में अपने विजन को वास्तविकता में रूपांतरित किया जाता है और इसके अनुरूप उचित निर्णय लिए जाते हैं।

इसके लिए अपने जीवन में महत्त्वपूर्ण, गैर-महत्त्वपूर्ण तथा आवश्यक व गैर आवश्यक कारकों की पहचान आवश्यक हो जाती है, साथ ही तात्कालिक चीजों को कैसे निपटाया जाना है, इसका त्वरित निर्णय लेना पड़ता है अर्थात जीवन के हर पल का श्रेष्ठतम उपयोग कैसे हो, यह इसके अंतर्गत आता है और यह लक्ष्य की स्पष्टता के अनुरूप तय होता है। यदि लक्ष्य स्पष्ट व जीवंत नहीं है, तो गैर महत्त्वपूर्ण एवं अनावश्यक कार्यों में व्यक्ति का उलझना तय हो जाता है।

चौथे चरण की आदत है, थिंक विन-विन। यह सोचने का स्वस्थ व संतुलित तरीका है, जो सकारात्मक व सृजनात्मक सोच को परिलक्षित करता है। पिछले तीन चरणों के आधार पर व्यक्ति में वह विश्वास व साहस आ जाता है कि वह थिंक विन-विन की मनःस्थिति को धारण कर सके।

इसके आधार पर ही सुनिश्चित होता है कि जब हम साथ में कार्य कर रहे होते हैं, तो आपसी आदान-प्रदान के आधार पर हम आगे बढ़ते हैं, विकसित होते हैं तथा परस्पर लाभान्वित होते हैं। यह मिल-जुलकर टीमवर्क के रूप में कार्य को संभव बनाता है तथा थिंक विन-लूज या लूज-विन की नकारात्मक स्थिति व इसके दुष्परिणामों से बचाता है।

पाँचवें चरण की आदत है, सीक फर्स्ट टू अंडरस्टैंड, देन टू बी अंडरस्टुड-यह हमारे वाणी- व्यवहार से जुड़ा भावनात्मक पहलू है। इसके अंतर्गत किसी व्यक्ति को उसके बौद्धिक एवं भावनात्मक स्तर पर जानने के लिए हम संवेदी श्रवण का सहारा लेते हैं।

इसे स्टीफन कॉवे एम्पैथिक लिस्टिंग कहते हैं, जो सर्वोच्च स्तर का श्रवण कौशल है, जो जिम्मेदारी तथा संवेदनशीलता के भाव को विकसित करता है। इसी आधार पर आवश्यकता पड़ने पर ईमानदार एवं स्टिक परामर्श देना संभव होता है। स्टीफन कॉवे के अनुसार, इसका अभ्यास व्यक्ति के इमोशनल बैंक एकाउंट को समृद्ध करता है, जिसके आधार पर व्यक्ति अधिक भावप्रवण बनता है और उसके व्यक्तित्व की विश्वसनीयता एवं प्रामाणिकता में इजाफा होता है, जो सामूहिक एवं सामाजिक स्तर पर सफल जीवन का एक निर्णायक आधार रहता है।

छठे चरण की आदत है, साइनर्जायज की, जिसके अंतर्गत भिन्न-भिन्न पृष्ठभूमि, सोच-विचार और क्षमता के लोगों के बीच उनकी क्षमताओं का नियोजन किया जाता है, जिससे कि श्रेष्ठतम परिणाम आ सकें। इसके माध्यम से वे चीजें उभरती हैं, जो अन्यथा अकेले कार्य करने पर संभव नहीं होतीं। यह एक प्रभावी टीमवर्क को सुनिश्चित करता है।

सातवें चरण की आदत है, शार्पन दि सॉ की, जिसके अंतर्गत आत्मनिरीक्षण, सुधार व नवीनीकरण के लिए समय निकालना पड़ता है, जिससे कि जीवन के हर क्षेत्र में एक संतुलन सधे और मिलकर एक प्रभाव उत्पन्न करे। यहाँ आरे को एक उपमा के रूप में उपयुक्त किया गया है। जिस तरह आरे के दाँतों को धार देने पर उससे वृक्ष या लकड़ी को चीरना सरल हो जाता है, वैसे ही जीवन के विभिन्न पहलुओं को नियमित रूप से तराशने से उनकी प्रखरता बनी रहती है व इनका नियोजन एक सफल एवं प्रभावी जीवन को संभव बनाता है।

इसके अंतर्गत स्टीफन कॉवे जीवन के चार पक्षों पर नियमित रूप से कार्य करने की बात करते हैं। शारीरिक, भावनात्मक-सामाजिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक । उपयुक्त आहार, व्यायाम, विश्राम-नींद आदि के साथ शारीरिक पक्ष को सबल एवं स्वस्थ रखा जा सकता है। संवेदी श्रवण, अर्थपूर्ण संवाद एवं कर्त्तव्यप्रधान सेवा के साथ रिश्ते भावपूर्ण रहते हैं। नित्य अध्ययन व ज्ञानवर्द्धन के साथ बौद्धिक विकास सुनिश्चित होता है तथा नित्य ध्यान, प्रार्थना व स्वाध्याय जैसे उपक्रम आध्यात्मिक रूप से व्यक्ति को जीवंत रखते हैं। प्रकृति के मध्य विचरण इन सभी पक्षों को पुष्ट करता है। सातवीं आदत पिछली छह आदतों को पुष्ट करती है, जीवन में एक संतुलन बिठाती है और व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाती है तथा एक सफल-सार्थक जीवन को सुनिश्चित करती है। 

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