प्रेरणा

मुक्ति का द्वार

 Motivation| प्रेरणा: बारह वर्षों की घोर तपस्या के फलस्वरूप वर्धमान महावीर को पूर्ण ज्ञान प्राप्त हुआ था। उन्हें  सत्य का बोध हुआ था। पूर्णज्ञान की प्राप्ति के उपरांत वे संसार के प्राणियों को यह बतलाने लगे व कि उनके दुःखों का कारण क्या है और उन कारणों को दूर कर सच्चा सुख, अनंत सुख कैसे पाया जा सकता है। इस प्रकार तीस वर्षों तक वे संसार को  ज्ञानदान करते रहे और समस्त प्राणियों को कल्याण का मार्ग दिखाते रहे। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि संसार के जीवों के दुःखों का मूल कारण उनका अपना अज्ञान ही है। 

                 अज्ञान के कारण ही मनुष्य अपने शरीर को ही अपना सब कुछ मानता रहा है। वह शरीर के सुख-दुःख को ही वास्तविक सुख-दुःख मानता रहा है। वह अज्ञान के कारण ही  किसी से राग और किसी से द्वेष करता रहा है।  अस्तु यह जान लेना आवश्यक है कि यह शरीर क्षणभंगुर है और शरीर के सुख-दुःख भी क्षणभंगुर  हैं। अतः हमें इस शरीर को सुख-दुःख देने की ओर ध्यान न देकर अपनी आत्मा की ओर देखना चाहिए, क्योंकि वास्तविक जीव तो यह आत्मा ही है। वस्तुतः हम आत्मा ही हैं और जिस क्षण हम अपने को आत्मा और शरीर को पर मान लेंगे, जान लेंगे; उसी क्षण हमारी जीवन-दृष्टि बदल जाएगी और जीवन दृष्टि बदलते ही हम तदनुरूप आचरण करना प्रारंभ कर देंगे और फिर हमारे दुःखों के कारण स्वयमेव ही दूर होते जाएँगे।

                        भगवान महावीर ने यह बतलाया कि किसी भी जीव को सुख व दुःख देने वाला कोई अन्य जीव नहीं है, अपितु पूर्व में किए हुए उसके स्वयं के अच्छे व बुरे कर्म ही उसके सुख और दुःख के कारण हैं। अस्तु हमें तटस्थ व समताभाव से अपने सुख और दुःख को सहन करते रहना चाहिए। इससे हमारे पुराने कर्म अपना फल देकर नष्ट हो जाएँगे और भविष्य के लिए हमारे कर्मों के संचय होने की संभावना समाप्त होती जाएगी। यदि हम फल की आशा किए बगैर ही सदैव शुभ कर्म, अच्छे कर्म करें तो इससे कमाँ के संचय होने की संभावना समाप्त होती जाएगी और शनै: शनैः हमारे दुःखों के कारणों का अभाव होता जाएगा और शुभ कर्मों के परिणामस्वरूप हमें सुख की प्राप्ति होती जाएगी। 4                                यदि हम समताभाव से सदैव तप-साधना करते रहें तो एक समय अवश्य ही ऐसा आएगा, जब हमारे दुःखों के कारण समस्त कर्मों का सर्वथा अभाव हो जाएगा। भगवान महावीर ने यह बतलाया कि इस संसार की समस्त आत्माएँ सदैव से हैं और वे सदैव ही रहेंगी। वे अपने-अपने कर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न शरीर धारण करती रहती हैं और उन्हीं कर्मों के अनुसार सुख और दुःख भोगती रहती हैं। उन्होंने यह भी बताया कि जब तक उनके कर्मों का क्षय नहीं हो जाता, तब तक वे कोई-न-कोई शरीर धारण करती ही रहेंगी। जब उनके कर्मों का क्षय हो जाएगा, तभी उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी और मोक्ष की प्राप्ति होने पर ही उन्हें सच्चा सुख, अनंत सुख प्राप्त हो सकेगा। हमें जीवन में सत्य, अहिंसा,अपरिग्रह, संयम आदि का पालन करते हुए सदैव तप-साधना व शुभ कर्म करते रहना चाहिए। इसी से हमारा जीवन सुंदर और सुखी बनेगा। यही है सुंदर व सुखी जीवन का राजमार्ग ।

                    भगवान महावीर ने यह स्पष्ट किया कि जब तक जीव के साथ अच्छे व बुरे कर्मों का बंधन लगा हुआ है, तब तक यह जीव इस संसार में जन्म- मरण करता हुआ सुख व दुःख भोगता रहेगा, परंतु जब यह जीव अपने सत्पुरुषार्थ अर्थात सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, तप, त्याग, ध्यान, संयम आदि के द्वारा इन कर्मों के बंधन को छिन्न-भिन्न कर देगा, तभी यह जीव मुक्ति व आनंद पाने का अधिकारी हो जाएगा। अपने कर्मों को नष्ट करने में उसे किसी भी अन्य जीव की सहायता की अपेक्षा नहीं है।

                     उन्होंने आगे बताया कि यह कार्य वह – स्वयं अपने सत्पुरुषार्थ के द्वारा कर सकता है। – एक बार मुक्ति प्राप्त कर लेने पर यह आत्मा अनंत काल तक मुक्ति में ही रहती है और फिर लौटकर संसार में नहीं आती; क्योंकि इस जीव को संसार में जन्म-मरण कराने व सुख-दुःख देने के कारण जो कर्म होते हैं, उनका ही सर्वथा अभाव हो जाता है। मुक्ति में यह आत्मा अनंतकाल तक एक अनुपम, अद्वितीय, अलौकिक व अतींद्रिय आनंद की अनुभूति करती रहती है। मुक्ति व आनंद का यह द्वार संसार के सभी प्राणियों के लिए समान रूप से खुला हुआ है, केवल उसको सम्यक पुरुषार्थ करने की आवश्यकता भर है।

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    पेड़ की ऊँची डाली पर नारियल लटका हुआ था। उसने नीचे नदी पर पड़े पत्थर को देखकर कहा- “ओ पत्थर! यह नदी तुम्हें क्या देती है ? इसकी धाराओं के रोज पड़ते प्रहारों से तुम घिस-घिसकर मर जाओगे, लेकिन नदी नहीं छोड़ोगे। अपमान सहने की भी कोई सीमा होती है या नहीं। मुझे देखो, कैसी शान से आसमान में बैठा हूँ।” पत्थर ने उसकी बात सुनकर भी अनसुनी कर दी। 

                      कुछ दिनों बाद नारियल ने देखा कि नदी का वही पत्थर शालग्राम के रूप में मंदिर में प्रतिष्ठित है, जिसकी पूजा के लिए उसे सामग्री के रूप में लाया गया है। इस बार पत्थर बोला -“नारियल भाई ! देखो घिस-घिसकर परिष्कृत होने वाले प्रभु के अनन्य बनते हैं और आदर के पात्र बनते हैं; जबकि अहंकार के मतवाले अपने ही दंभ से पीड़ित होकर नीचे आ गिरते हैं।” भगवान की दृष्टि में मूल्य समर्पण का है, अहंकार का नहीं।

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