प्रेरणा

मनःस्थिति बदले तो परिस्थिति बदले motivation

 Motivation| प्रेरणा: एक महात्मा से किसी व्यक्ति ने कहा- “महाराज! घर-गृहस्थी व कारोबार से फुरसत ही नहीं मिलती। फिर मैं भगवान का ध्यान कब और कैसे करूँ?” महात्मा बोले- “एक मंदिर में तीन लोग भगवान को धन्यवाद दे रहे थे। एक ने कहा- ‘हे प्रभु! आप बड़े कृपालु हैं। मेरी पत्नी इतनी धार्मिक है कि वह भगवद्ध्यान, भगवत्पूजा और स्वाध्याय-सत्संग में कभी बाधक नहीं बनती। मैं इसी कारण निश्चित होकर, एकाग्र होकर नित्यदिन आपकी पूजा करता हूँ, ध्यान करता हूँ, स्तुति करता हूँ, यज्ञ करता हूँ, शास्त्रों का स्वाध्याय करता हूँ। सत्संग करता हूँ, दान करता हूँ, परोपकार करता हूँ, जनसेवा करता हूँ और बड़े आनंदपूर्वक जीवन जीता हूँ। 

                       हे प्रभु! यह सब आपकी कृपा के कारण ही संभव हो पाया है। इसलिए आपको बारंबार धन्यवाद देता हूँ।’ “वहाँ खड़ा दूसरा व्यक्ति बोला- ‘हे प्रभु! आपने मेरे उपर बड़ा उपकार किया है कि मुझे कर्कशा पत्नी मिली है। मेरी पत्नी इतनी कर्कशा है कि उसके प्रति मेरी कोई आसक्ति रही ही नहीं। प्रारंभ में उसके प्रति मेरे मन में जो भी आसक्ति थी वह एक-एक कर मिटती चली गई और यह सब उसके कर्कशा होने के कारण ही संभव हो पाया। यदि वह कर्कशा न होती तो शायद मैं उसके प्रति अधिक-से-अधिक आसक्त होता और तब मैं आपके प्रति आसक्त नहीं हो पाता। मैं धन-दौलत, पुत्र- पत्नी के चिंतन और चिंता में ही इतना अधिक  डूबा होता कि फिर आपका चिंतन, आपका ध्यान नहीं कर पाता। हे प्रभु! पत्नी व घर-गृहस्थी के प्रति आसक्त न होने के कारण मैं आपके प्रति आसक्त हुआ हूँ। और दिन-रात मैं आपके ध्यान में डूबा रहता हूँ। 

    फलस्वरूप मुझे हर पल आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है और मैं कष्ट और कठिनाइयों में भी अविचलित रहकर सदा ईमानदारी और सच्चाई के मार्ग पर चलता हुआ अपने गृहस्थ जीवन व सामाजिक जीवन की जिम्मेदारियों का पालन करने में सफल होता हूँ। हे प्रभु! इसके लिए आपको बारंबार धन्यवाद।’ “वहीं भगवान की प्रतिमा के समक्ष खड़े तीसरे व्यक्ति ने कहा- ‘हे परमात्मा ! आप बड़े दयालु हैं। मेरे तो बीबी-बच्चे ही नहीं हैं, जो आपके और मेरे बीच में दीवार बनते। अतः मेरा मन आपके चरणों में लगा रहता है। हे भगवान! आपकी पूजा-भक्ति और ध्यान से मुझे जो आत्मिक सुख की प्राप्ति होती है, 

            वह बीबी-बच्चे और धन-दौलत के बीच होते हुए भी नहीं मिल पाती। हे प्रभु! आपकी मेरे ऊपर बड़ी कृपा है। आपको बारंबार धन्यवाद।’ “इस प्रकार मंदिर में उपस्थित उन तीन लोगों द्वारा भगवान को धन्यवाद ज्ञापित किए जाने की बातें सुनाकर उन महात्मा ने उस व्यक्ति को समझाते हुए कहा-‘देखो! अलग-अलग स्थिति में होते हुए भी तीनों व्यक्ति प्रसन्नचित्त, ईश्वर के प्रति कृतज्ञ और भक्ति में लीन थे। उन तीनों के मन में ईश्वर के प्रति या परिस्थितियों के प्रति कोई शिकायत नहीं थी । अतः परिस्थिति चाहे जैसी भी हो, अपनी मनःस्थिति को ठीक रखना चाहिए।’ महात्मा के वचन सुनकर उस व्यक्ति की समस्या का समाधान हो गया।” 

                                        यह कहानी यह स्पष्ट करती है कि मनःस्थिति से ही अच्छी या बुरी परिस्थिति का निर्माण होता  है। यदि मनःस्थिति ठीक है तो विपरीत परिस्थितियाँ  भी अनुकूल हो जाती हैं और मनःस्थिति ठीक न  होने पर अनुकूल परिस्थितियाँ भी प्रतिकूल प्रतीत  होती हैं, प्रतिकूल होती जाती हैं और जीवन में कष्ट-कठिनाइयों की बाढ़-सी आने लगती है, जिससे जीवन कष्टप्रद हो जाता है। मनःस्थिति यदि सकारात्मक हो, हमारी दृष्टि यदि सकारात्मक हो तो हम नकारात्मक विचारों से अछूते, अप्रभावित रहकर सदा अच्छे कर्म, सत्कर्म करते हैं और सुख पाते हैं, पर मन नकारात्मक विकारों, विचारों से भरा हो तो इस दुनिया में हर चीज हमें बुरी ही लगती है। सौंदर्य से भरी हुई दुनिया भी बड़ी उदासीन लगती है। यह उदासी बाहर नहीं, बल्कि हमारे मन में है। मन पर जिस रंग का चश्मा चढ़ा हुआ होता है,  हमें दुनिया भी उसी रंग की दिखती है, वैसी ही  दिखती है।

                        हम सुख में भी दुःख ढूँढ़ते फिरते हैं। फिर हम वही पाते हैं, जिसे हम ढूँढ़ते फिरते हैं।  अस्तु यह सारा खेल हमारी मनःस्थिति का है, परिस्थिति का नहीं। यदि हमारी दृष्टि ही दोषपूर्ण है, यदि हमारे मन में ही कषाय-कल्मष भरा पड़ा है तो उस मन से देखने भर से यह दुनिया भी कषाय-कल्मषों से  भरी हुई दिख पड़ेगी, पर यदि मन स्वच्छ है, मन निर्मल है, मन पवित्र है तो संपूर्ण सृष्टि में सौंदर्य और पवित्रता ही दृष्टिगोचर होंगे।  पवित्र मन, निर्मल मन ही इस संसार के सौंदर्य और सुख का पान कर पाता है, वहीं मलिन  मन में सदा ही बुरे विचारों व विकारों का वास  होता है, जिससे प्रेरित होकर व्यक्ति बुरे कर्म करता है और दुःखी होता है।

                                         जब मन निर्मल हो तो यह संसार स्वर्ग-सा दीख पड़ता है, पर यदि मन निर्मल न हो तो स्वर्ग भी नरक-सा प्रतीत होता है और व्यक्ति स्वर्गीय, आनंददायी अनुकूल परिस्थितियों को भी दुःखदायी और प्रतिकूल बना लेता है और दुःख तथा कष्ट भोगता है। इसलिए यह सारा खेल मनःस्थिति का ही है। इसलिए तो संत इमर्सन कहा करते थे कि ‘तुम मुझे नरक में भेज दो, मैं वहाँ भी स्वर्ग बना लूँगा।’ परमपूज्य गुरुदेव ने इस संबंध में ठीक ही कहा है कि स्वर्ग और नरक कोई स्थान नहीं, बल्कि मनःस्थितियाँ हैं; जिनके कारण मनुष्य के जीवन में स्वर्गीय (सुखद) या नारकीय (दुःखद)परिस्थितियाँ बनती हैं। सचमुच मनःस्थिति बदले तो परिस्थिति बदले। यदि हम चाहते हैं कि हमारे जीवन में सदैव स्वर्गीय अर्थात सुखद परिस्थितियाँ बनी रहें तो इस हेतु हमारी मनःस्थिति का भी ठीक वैसा होना आवश्यक है। 

                   हमारी दृष्टि का भी वैसा होना जरूरी है। पवित्र मन, निर्मल मन से ही पवित्र मनःस्थिति बनती है, इसलिए हमें हमारे मन को सदा पावन, पवित्र और निर्मल बनाए रखना चाहिए और मन को निर्मल बनाए रखने के लिए नित्य भगवत्पूजा, भगवद्रुपासना, भगवद्ध्यान, शास्त्रों व सत्साहित्य का स्वाध्याय, सेवा, सत्संग, यज्ञ, दान, परोपकार आदि करते रहना चाहिए।

       धर्म यो बाधते धर्मो न स धर्मः कुधर्मकः ।                 अविरोधात्तु यो धर्मः स धर्मः सत्यविक्रम ।। 

                                  अर्थात जो धर्म दूसरे धर्मों का विरोधी हो, वह वास्तविक धर्म नहीं है। जिसका किसी धर्म से विरोध नहीं होता, वही वास्तविक धर्म कहलाता है।

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