भारतीय संस्कृति सार्वभौमिक और सनातन motivation

Motivation| प्रेरणा: भारतीय ज्ञान-परंपरा का मूल स्वरूप अष्टादश विद्याओं में सन्निहित ज्ञान-विज्ञान के रूप में विद्यमान है। इन विद्याओं के द्वारा जिन सूत्रों-सिद्धांतों का सृजन किया गया है, वे सभी सैकड़ों ग्रंथों का आकार प्राप्त कर हमारी आत्मज्ञान की शिखा को प्रज्वलित बनाए हुए हैं। यह ज्ञानरूपी विरासत भारतीय संस्कृति की हजारों वर्षों की यात्रा में वास्तविक चिन्मय संपत्ति है। इसी ज्ञान-रहस्य के कारण आज तक इस संस्कृति का जीवन अक्षुण्ण बना हुआ है और आगे भी बना रहेगा। अन्य संस्कृतियों की भाँति हमारी देव संस्कृति का ध्येय कभी भी आधिभौतिक नहीं रहा है, बल्कि पूर्णतः आध्यात्मिक है।
ज्ञान इसकी आत्मा है, जो अध्यात्मरूपी प्राण बनकर इसके हर कण-कण में व्याप्त है। अध्यात्म के बिना इस संस्कृति की कल्पना करना भी असंभव है। इसका समस्त कलेवर ही अध्यात्म से ओत-प्रोत है, इसलिए समूचा विश्व भी इसे आध्यात्मिक ज्ञान के पालने के रूप में पहचानता आया है। सर्वोच्च ज्ञान की प्राप्ति हमारी संस्कृति का महानतम आदर्श है। इस आदर्श को प्राप्त करने की चुनौती और उस पर विजय प्राप्त करने का मार्ग, दोनों इस संस्कृति से विनिर्मित सुसंस्कारित समाज की जीवनपद्धति व जीवनमूल्यों में समाहित हैं। सर्वोच्च ज्ञान का स्वरूप पूर्णत: आध्यात्मिक है, जो मानवीय आत्मा के धरातल पर ही प्रस्फुटित होता है। इस परम आदर्श को जानने और जीने की दो भिन्नधाराएँ समान-संयुक्त रूप से हमारी सांस्कृतिक यात्रा का नेतृत्व करती आ रही हैं। एक धारा ज्ञान की है व दूसरी विज्ञान की। ज्ञान को जानने-समझने के लिए विभिन्न शास्त्रों, विधाओं का निर्माण किया गया है और उनकी श्रेष्ठतम व्याख्या-विवेचना की परंपराएँ विकसित की हैं।
दूसरी धारा विज्ञान की है, जिसमें उस प्राप्य ज्ञान को जीने की कला और सुसंगत जीवनपद्धति के विविध आयामों को धर्म, कर्म, संस्कार एवं परंपराओं के रूप में स्थापित किया जाता रहा है। ध्यान रखने योग्य बात यह है कि हमारे ऋषियों ने जिसे विज्ञान कहा है, वह वर्तमान तथाकथित भौतिक विज्ञान के सर्वथा भिन्न है। ऋषि-अवधारणा में विज्ञान का तात्पर्य है – वह ज्ञान, चिंतन अथवा सिद्धांत जो हमारे व्यवहार का, जीवन का, चरित्र का हिस्सा बन गया है अर्थात ज्ञान जब व्यवहार में आ जाता है तो वही विज्ञान कहलाता है। ज्ञान और विज्ञान-दोनों धारा अन्योन्याश्रित, शाश्वत और चिरनूतनता के साथ हमारी सभ्यता, संस्कृति व समाज की ऐश्वर्यता, वैभव, प्रखरता और श्रेष्ठता की परिचायक हैं।
अध्यात्म तत्त्व की ये दोनों विमल धाराएँ विभिन्न मार्गों से बहते हुए भारत भूमि ही नहीं, वरन समस्त विश्व-वसुधा को जीवन की उर्वरता प्रदान कर मानवता को पोषित करती आ रही हैं। हमारे सांस्कृतिक जीवन में समाहित ज्ञान- विज्ञान के अभेदरूपी अध्यात्म तत्त्व को समझना दुनिया के लिए सहज नहीं है। दुनिया यह तो मानती रही है कि हमारी संस्कृति और हमारा देश अध्यात्मवादियों का देश है, लेकिन दुनिया को यह भी समझना आवश्यक है कि यहाँ अध्यात्म का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि लोग केवल आत्मबोध और आत्मचिंतन के कार्यों में निमग्न रहते हों। इस चिंतन का शिखर तो हमारे ऋषियों ने सभ्यता के प्रारंभ से पूर्व ही प्राप्त कर लिया था।
ऋग्वेद के ‘नासदीय सूक्त’ में इस चिंतन की गहनता को देखा जा सकता है। सारा संसार जीवन के जिस स्थायी सुख और आनंद को पागलों की तरह खोजते-भटकते रहा है, उसे हमारे ऋषियों ने आदिकाल में ही खोजकर ब्राह्मीस्थिति, मोक्ष, निर्वाण आदि नाना रूपों में प्रस्तुत कर दिया है तो फिर यह स्वाभाविक प्रश्न उठ सकता है कि जब जीवन में गूढ़तम रहस्य और शाश्वत सुख के स्रोत को ऋषियों द्वारा खोजकर पहले ही प्रस्तुत किया जा चुका है तो अब दुनिया के खोजने लायक शेष क्या रह जाता है ? इसका उत्तर यही है कि जो खोजा जा चुका है और जिसकी सभी को आवश्यकता भी है, उस तक पहुँचने के मार्ग की खोज करना। किसी एक, दो या हजार के लिए नहीं, अपितु मानव मात्र के लिए ऐसे मार्ग की आवश्यकता है, जिस पर चलकर समूची मानव जाति को शाश्वत सुख का, परम शांति और संतुष्टि का लक्ष्य प्राप्त हो सके। दुनिया ने स्थायी सुख-शांति और आनंद की इच्छा को तो मन में जीवंत बनाए रखा है, परंतु इसकी प्राप्ति करा सकने वाला मार्ग खोज निकालने में असफल ही रही है।
भौतिकवाद, भोगवाद और वैज्ञानिक क्रांति के साधन-संसाधनों के उच्चतम विकास ने भी अंतर्मन में दबी इच्छा एवं भावना को कोई सार्थक लाभ नहीं पहुँचाया है, बल्कि इसके उलट अशांति, असंतुष्टि, निराशा और अनेक दुःखदायी स्थितियों को उत्पन्न कर डाला है। जीवन में सुख-शांति, संतुष्टि और आनंद की तलाश यथावत् बनी हुई है। सारी मानवता इसके लिए लालायित नजर – आती है, परंतु उसके पास ऐसा कोई मार्ग नहीं जिस पर चलकर इच्छित लक्ष्य प्राप्त कर सके। इस संदर्भ में सारी दुनिया को यह बताना आवश्यक है कि जिस मार्ग की तलाश की जा रही है, वह मार्ग हमारी ऋषि संस्कृति और जीवनपद्धति में पहले से विद्यमान है। इसका अनुसरण कर दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में चिरस्थायी सुख, आनंद और संतुष्टि को प्राप्त कर सकता है।
भारतीय संस्कृति में जीवनपद्धति का निर्माण जिन आदर्शों और मूल्यों को आधार बनाकर किया गया है, उस पर चलने वालों को जीवन का चरम लक्ष्य मिलना सुनिश्चित है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण भारतभूमि के आद्यतन इतिहास में महापुरुषों, महामानवों व महान व्यक्तित्वों का जीवन-दर्शन है, जिन्होंने हर युग में स्वयं को आदर्श बनाकर विश्वमानवता का मार्गदर्शन किया है। भारतीय संस्कृति के पोषण के लिए हमारे ऋषियों ने जिस जीवनपद्धति का निर्माण किया है, वह आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि पर आधृत एक संपूर्ण जीवन विज्ञान है। शास्त्रों में मनुष्य के चतुर्वर्ग, पुरुषार्थ, वर्णाश्रम, धर्म-कर्म, कर्तव्य आदि की विशद व्याख्याओं में अध्यात्म विज्ञान की ही प्रस्तुति है। मानवीय जीवन की समस्त क्रियाशीलता और संभावनाओं को चार भागों में विभाजित कर पुरुषार्थ का सिद्धांत दिया गया। यह सिद्धांत हमारी जीवनपद्धति का मूल आधार है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्षरूपी पुरुषार्थ की चर्चा प्रायः सभी दर्शनों, धर्मशास्त्रों, इतिहास ग्रंथों, महाकाव्य, स्मृति एवं पुराणों में विस्तार से की गई है।
इस विस्तृत विवेचना में ऋषियों के अध्यात्म विज्ञान के सूक्ष्म एवं मार्मिक पहलुओं को किस प्रकार मानवीय वृत्ति, कर्म, आचरण एवं चरित्र के स्तर पर समाहित कर एक समग्र जीवनपद्धति विनिर्मित की गई है, इस सत्य का अनावरण किया गया है। ललित कलाओं से लेकर आयुर्वेद, धनुर्वेद, शल्यविद्या, रसायन शास्त्र, नक्षत्र विद्या, गणित विद्या, काव्य, नाटक, साहित्य, संगीत आदि अनेक विधाओं में मानवीय रचनात्मकता और सृजनशीलता के विकसित रूप को भारतीय जीवनपद्धति की समग्रता में देखा जा सकता है। हमारी संस्कृति की जीवन-दृष्टि आध्यात्मिक अवश्य है, परंतु उस पर आधृत जीवनपद्धति में अध्यात्म और आधिभौतिक जीवन का सार्थक एवं अनुपम समन्वय है। ज्ञान के साथ कर्म, योग के साथ भोग और अध्यात्म के साथ विज्ञान का समन्वय इसे विश्व की महानतम संस्कृति बनाते हैं। यह समन्वय, ज्ञान को आचरण में, व्यवहार में लाने की उत्कृष्ट तकनीकों के रूप में व्यक्ति, समाज और संस्कृति के जीवन में घुला-मिला है। इसमें समाहित सूक्ष्म मानवीय मनोविज्ञान को भी दुनिया को समझना आवश्यक है। जैसे चार पुरुषार्थ व्यक्ति के जीवन-मार्ग का आदर्श हैं, उसी प्रकार समाज और समष्टि के कल्याण का आदर्श मार्ग चार आश्रमों के रूप में विद्यमान है।
ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास- ये सार्वभौमिक मानवता की प्रतिष्ठा एवं कल्याण के ऋषिप्रणीत स्वर्णिम सूत्र हैं। मानव जीवन के उक्त चार सोपानों में विश्व समाज के सर्वांगीण विकास, संतुलन और परम कल्याण का मनोविज्ञान गुँथा हुआ है। सर्वप्रथम ब्रह्मचर्य आश्रम अर्थात जीवन प्रारंभ के प्रथम चरण में शरीर, मन और बुद्धि को शुद्ध और संवर्द्धित कर एक आदर्श व्यक्तित्व और क्षमतावान, उपयोगी जीवन का निर्माण करना है। दूसरे चरण में साधन-संसाधन और इच्छित कामनाओं की धर्मानुकूल वृद्धि और उपभोग तथा परिवार, समाज और राष्ट्र से जुड़े सभी कर्त्तव्यों का नैतिक रूप से पालन करना होता है। तीसरे सोपान में घर-परिवार की जिम्मेदारियों से बाहर निकलकर अपने अनुभव और चिंतन को समाज में निस्स्वार्थ भाव से बाँटना होता है, ताकि उनके सांसारिक जीवन के दुःख, कष्ट और उलझनों को कम कर सही दिशा प्रदान की जा सके। चतुर्थ चरण है आत्मसिद्धि का, विज्ञान जगत् से ज्ञान जगत् में प्रवेश करने का। यह योग, त्याग, वैराग्य, भक्ति और निवृत्ति का सोपान है। यहाँ पहुँचकर मनुष्य जीवन अपनी संपूर्णता में विकसित हो उठता है।
शाश्वत सुख, परम शांति, पूर्ण संतुष्टि और चरम सत्य की प्राप्ति कराने वाला विज्ञान हमारी जीवनपद्धति के केंद्र में स्थित है। मानवीय स्वभाव और मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए ही हमारे ऋषियों ने एक आदर्श जीवनपद्धति का निर्माण कर प्रत्येक मनुष्य के लिए सार्थक जीवन जीने का मार्ग सृजित किया है। इस मार्ग पर चलकर ही भारतीय संस्कृति विश्व में इतनी महान और उदात्त बन पाई है। यह जीवनपद्धति महज एक जीने का तरीका या व्यवस्था मात्र न होकर जीवन के उत्कृष्टतम विकास का विज्ञान है। पुरुषार्थ के चार स्तंभ, वर्णाश्रम के चार सोपान, संस्कारों के सोलह अनुबंध और जीवनपर्यंत के व्रत, पर्व, त्योहार जैसी दिव्य परंपराएँ-इन सभी में अध्यात्म-विज्ञान समाहित है। – हमारी संस्कृति का सर्वस्व एक श्रेष्ठतम और सर्वोत्कृष्ट संपूर्ण जीवन विज्ञान का पर्याय है। भारत भूमि के अध्यात्मवादी जीवन में शास्त्रों के रूप में मानवीय ज्ञान का शिखर मौजूद है और संस्कृति के रूप में मानवीय विज्ञान की व्यापकता भी विद्यमान है। यह एक सार्वभौम सत्य है कि यहाँ के शास्त्र न और संस्कृति की आवश्यकता समस्त मानवता के लिए विरेन्य हैं।
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