विज्ञान एवं अध्यात्म का समन्वय

Motivation| प्रेरणा: विज्ञान के अनुसार अंतरिक्ष व उसकी अंतर्वस्तु को ब्रह्मांड कहते हैं। ब्रह्मांड में सभी ग्रह, तारे, आकाशगंगाएँ, अपरमाणविक कण, सारा पदार्थ और सारी ऊर्जा सम्मिलित है। इस प्रकार ब्रह्मांड के दो स्वरूप माने गए हैं। एक भौतिक तथा दूसरा आध्यात्मिक स्वरूप । भौतिक स्वरूप वह है, जो हमें प्रत्यक्ष रूप से अपनी आँखों से दिखाई देता है, कानों से सुनाई पड़ता है, नाक से गंध का बोध कराता है, जिह्वा से स्वाद की पहचान कराता है। भौतिक जगत् ब्रह्मांड में उपस्थित वस्तुओं का प्रकटीकरण है। जड़ और चेतन पदार्थ जैसे भी दृष्टि के सम्मुख होते हैं, उन्हें उसी रूप में स्वीकार कर व्यक्ति अपने भौतिक शरीर की सुविधाओं हेतु उनका प्रयोग करता है। आध्यात्मिक जगत् भौतिकता को स्वीकारता है, किंतु यह मानता है कि ब्रह्मांड में भौतिक तत्त्वों का सृजन किसी परम शक्ति के माध्यम से ही हुआ है तथा वही परम शक्ति समूचे ब्रह्मांड का संचालन कर रही है।
वह परम सत्ता जिसे परमात्मा कहते हैं, उसकी क्रियाशीलता ही प्रकृति है। धर्म चाहे कोई भी हो, मार्ग चाहे कोई भी अपनाया जाए परंतु पूजा, शक्ति की ही होती है। शक्ति परम सत्ता का ही पर्याय है। विचारणीय है कि परम सत्ता की पहचान किस प्रकार संभव है ? इस संदर्भ में कहा जा सकता है कि आडंबरयुक्त पूजा पद्धतियों से परम सत्ता का दर्शन नहीं किया जा सकता। निर्गुण भक्तिशाखाएँ एवं सगुण भक्तिशाखाएँ विपरीत दिशाओं में परम सत्ता को अनुभव करने का प्रयास करती रही हैं, किंतु सच्चे अर्थों में परमसत्ता का अनुभव प्राप्त करना उनके लिए भी आसान एवं सरल नहीं रहा है। हम वैचारिक धरातल पर आस्तिक और नास्तिक जैसी आस्थाओं में सिमटकर तर्क-कुतर्क करने में विश्वास रखते हैं।
जब कभी हम शांतिपूर्ण वातावरण में स्थिर होकर मनन करते हैं, तब हमें सत्य का एहसास अवश्य होता है। सत्य धर्म की संकीर्ण परिभाषाओं में बँधकर छटपटाहट का अनुभव करता है। विशिष्ट पूजा-पद्धतियाँ उसे कृत्रिमता का बोध कराती हैं। वह स्वतंत्र होना चाहता है। सभी बंधनों से मुक्त होना चाहता है। निश्चय ही प्राणी का जन्म किसी धर्म, जाति या संप्रदाय में नहीं होता। जातीय बंधन उसे समाज ने प्रदान किए हैं। प्रकृति ने मानवस्वरूप प्रदान करके हमें सभी प्राणियों में श्रेष्ठता प्रदान की है। उसी श्रेष्ठता को हम संकीर्णता के दायरे में ढालकर स्वयं के लिए बेड़ियाँ बुन रहे हैं।
संकीर्ण विचारधाराएँ समाज में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न कर रही हैं। समूचे विश्व में जातीय और धार्मिक उन्माद का कारण यही संकीर्णता है। यह विश्वशांति भंग कर रही है। ऐसे चिंतन से मानवमात्र के कल्याण की सर्वोपरि कामना व्यक्त होती है। समाज, विचारों को यथार्थ के धरातल पर उतारने से ही विकसित होता है। समाज के कल्याण की पृष्ठभूमि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’ की भावना से ही संभव है, जिसके लिए संकीर्ण बंधनकारी विचारों एवं क्रियाकलापों को त्यागना अनिवार्य है। संकीर्णता चाहे विचारों की हो या भावनाओं की- हमारे विकास को अवरुद्ध करती है। विचार सृजनशील होना चाहिए एवं भावना पवित्र एवंपावन। यही मानवीय विकास का आधार है। ब्रह्मांड सतत विकसित हो रहा है। इस प्रकार हमको भी अपने अंदर की शक्तियों को सक्षम, समर्थ एवं विकसित करना चाहिए और यह तभी संभव है, जब शरीर एवं मन अर्थात भौतिकता एवं आध्यात्मिकता के मध्य हम समुचित समन्वय एवं सामंजस्य स्थापित कर सकें।
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एक वीतराग संत थे। संसार का कोई भी विषय उनमें आसक्ति उत्पन्न नहीं करता था। वे गंगा किनारे बैठे रहते और भजन में लीन रहते। भीड़ से दूर रहने के बाद भी अनेक जिज्ञासु ऐसे थे, जो उनके समीप इस आशा में बैठे रहते, ताकि वे कुछ कह दें और उनका भला हो जाए। एक दिन एक दूसरे संत उसी ओर गंगा किनारे आए और उनके पास आकर कुछ देर खड़े रहे। फिर उन्होंने गंगा किनारे पड़ी रेत को अपने सिर पर लगाया और जाने लगे। यह देखकर वीतराग संत अपने स्थान से खड़े हुए व उनको प्रणाम किया। दोनों संत एकदूसरे को देखकर मुस्कराए और फिर यथास्थान प्रस्थान किया।
यह दृश्य देखकर वीतराग संत के निकट उपस्थित लोगों को कुतूहल हुआ। इस सारी घटना के पीछे के मर्म को जानने की जिज्ञासा वहाँ उपस्थित जनसामान्य ने वीतराग संत के समक्ष प्रकट की तो वे बोले – “भगवान ने गीता में कहा है ‘विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति’ अर्थात नश्वर में जो एक अविनाशी को देखता है, वही वास्तव में सही देखता है। जो संत अभी यहाँ आए थे उन्होंने इस नश्वर संसार में, जिसका प्रतीक मिट्टी है उस अविनाशी आत्मा को देखा, जो कभी विनष्ट नहीं होती। मैंने उनकी उसी दृष्टि को नमन किया।” महात्माओं के प्रत्येक क्रियाकलापों के पीछे कुछ ऐसा होता है, जिसे दिव्य कहा जा सकता है।
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