आत्मकेंद्रित जीवन ही है आध्यात्मिक जीवन

MOTIVATION| प्रेरणा : धर्म-अध्यात्म को लेकर जनमानस में कई प्रकार की भ्रांतियाँ भरी हुई होती हैं। अपना काम- धाम छोड़कर धर्म-कर्म करना भला यह कौन-सी समझदारी है ? और अभी हमारी उम्र ही क्या हुई है कि हम धर्म-कर्म करके साधु-फकीर बनते फिरें ? उम्र के अंतिम पड़ाव में कुछ धर्म-कर्म कर लेंगे; क्योंकि अभी तो जिंदगी में मजे करने का समय है।कुछ लोग कहते हैं कि हमारी बहू की एक बहुत गंदी आदत है। क्या है ? वह रोज सुबह उठकर जप-ध्यान, पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन में लगी रहती है। इतना ही नहीं, अब तो वह अपनी बेटियों को भी उसी राह पर ले जा रही है। अभी तो बेटियों के खाने-खेलने के दिन हैं। उन्हें कुछ सिखाना ही है तो कोई अच्छी चीज सिखाओ, अच्छे पकवान, सुस्वाद भोजन बनाना सिखाओ, जो उसके ससुराल में काम आए।
कुछ अन्य की शिकायत होती है कि जब से अयोध्या, काशी, मथुरा, हरिद्वार से लौटे हैं, तब से इनके लक्षण कुछ ठीक नहीं लग रहे। क्यों? क्योंकि पहले ताश खेलने, जुआ खेलने, गाँजा-भाँग-शराब पीने में वे हम लोगों का साथ दिया करते थे, लेकिन जब से हरिद्वार से लौटे हैं, तब से हम लोगों से मुँह छिपाते फिर रहे हैं।सुना है वहाँ किसी गुरु से मंत्र लेकर आए हैं। यह मंत्र-तंत्र, धर्म-अध्यात्म सब बकवास है। अच्छा हो यदि तुम फिर से रास्ते पर लौट • आओ और फिर से मौज-मस्ती करो। मौज- * मस्ती नहीं तो जीवन कैसा? जो मजा रिश्वत और घूसखोरी में है, भला वह मासिक मानदेय में कहाँ! पर यह हरिद्वार क्या हो आया, मानो वहाँ से ईमानदारी का ताबीज पहनकर आया हो।
क्यों, क्योंकि अब वह न तो स्वयं रिश्वत लेता है न तो हम लोगों को लेने देता है; आदि बातें लोग अक्सर कहते और सुनते हुए पाए जाते हैं।दरअसल धर्म-अध्यात्म के विषय में सही समझ नहीं होने के कारण ही लोग ऐसी बेतुकी बातें किया करते हैं। धर्म-अध्यात्म न तो जीवन के विरोधी हैं, न ही धर्म-अध्यात्म का मतलब जीवन से पलायन होना है। धर्म तो धारण करने की चीज है, त्याग करने की नहीं। जो धारण करने में समर्थ है, जो हमारे जीवन को धारण करने में, थामे रहने में समर्थ है; वही धर्म है।धर्म का आशय किसी मत, पंथ, मजहब, संप्रदाय से कतई नहीं है। ये तो धर्मप्राप्ति के साधन मात्र हैं, साध्य नहीं। धर्म एक मर्यादा- बंधन है, जो मनुष्य को मर्यादा में रहने को प्रेरित करता है, तैयार करता है। जो मर्यादा की सीमा को लाँघता है, वह अपने जीवन में तबाही और विनाश को ही आमंत्रित करता है।
दुर्योधन, दुःशासन, रावण, कुंभकर्ण आदि कई ऐसे पौराणिक, ऐतिहासिक चरित्र हैं, जो धन- धान्य से परिपूर्ण होते हुए भी मर्यादा में नहीं रहने के कारण विनाश को प्राप्त हुए। मर्यादा से तात्पर्य मानवीय मर्यादा से है। मनुष्य में मनुष्योचित मर्यादा न हो, मानवीय गुण न हो, मानवीय चरित्र न हो, तो फिर वह मनुष्य कैसा ? हाँ ! वह आकृति से मनुष्य जैसा दिख अवश्य सकता है, पर मनुष्यता अर्थात मानवीय गुणों के अभाव में वह वास्तव में मनुष्य जैसा व्यवहार नहीं कर सकता।धर्म ही मनुष्य में मानवीय गुणों को भरकर उसे सही माने में मनुष्य बनाता है। जैसे तूफानों में भारी बरबादी, तबाही देखने को मिलती है, वैसे ही धर्म के बजाय जब मनुष्य अधर्म अर्थात बुराई, बेईमानी, अनीति, असत्य, अनाचार, दुराचार, हिंसा आदि के मार्ग पर चल पड़ता है, तब उसके जीवन में भी भारी तबाही के तूफान आते रहते हैं, जिसके कारण उसका सर्वनाश हो जाता है।
उसका भौतिक जीवन बरबाद हो जाता है और उसका धार्मिक जीवन तो बरबाद है ही। धार्मिक जीवन से तो उसका कोई लेना-देना है ही नहीं। जो धार्मिक है, वह बुरा हो ही नहीं सकता। वह बुरे कर्म कर ही नहीं सकता और जो अधार्मिक है, वह अच्छे कर्म करने को न तो प्रेरित होता है और न ही अच्छे कर्म करता है।जैसे समुद्र में ज्वार-भाटे उठते रहते हैं, समुद्र में तूफान आते रहते हैं, उसी प्रकार धार्मिक दृष्टि न होने के कारण मनुष्य के मन में विषय-वासना, क्रोध, लोभ, मोह, दंभ, दुर्भाव, द्वेष आदि विचार रूप में ज्वार-भाटे की तरह उठते रहते हैं, फिर उन दुर्गुणों के आवेश में मनुष्य अधर्म के मार्ग पर चल पड़ता है, बुराई के मार्ग पर चल पड़ता है- जिससे उसका जीवन तबाह हो जाता है।
मनुष्य जब धर्ममय जीवन जीता है तो उसका जीवन सुख-समृद्धि, शांति से परिपूर्ण होता है, वैसे ही जैसे जब तक नदी अपनी सीमा में बहती है, तब तक वह जीवन देती है, हरियाली देती है, खुशहाली देती है, पर जब वह सीमा लाँघ जाती है तो बाढ़ जैसी विभीषिका लाती है, बरबादी लाती है।सीमा तोड़ते ही जीवनदायिनी नदी जीवन लीलने लगती है। वैसे ही अधर्म हमारे लिए भारीvविभीषिका की तरह है, जो हमारे साथ-साथ औरों के लिए भी तबाही का कारण बनता है। इसलिए हमारे जीवन में धर्म होना ही चाहिए, जो हमें थामे रखे, जो हमारी रक्षा कर सके।वैसे ही जैसे एक माँ आग की तरफ, गहरी नदी की तरफ बढ़ते हुए छोटे बच्चे को उधर जाने से रोककर उसकी प्राणरक्षा करती है, वैसे ही धर्म हमारी रक्षा करता है।
जैसा कि कहा गया है ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ अर्थात जो धर्म की रक्षा करता है अर्थात जो धर्म-भावना में जीता है – धर्म उसकी रक्षा करता है। धर्म हमें बुराई की ओर जाने से रोककर हमारी रक्षा करता है।धार्मिक होने का तात्पर्य किसी विशेष वेश- विन्यास को धारण करना नहीं होता। जो धारण करने योग्य है और जिसे धारण कर लेने पर जीवन सुंदर, सुगढ़, सुखद और समृद्ध होता है, वही धर्म है। नैतिकता, ईमानदारी, जिम्मेदारी, समझदारी, बहादुरी, श्रमशीलता आदि गुण जीवन को निस्संदेह सुगढ़, सुंदर और समृद्ध बनाते हैं तो वहीं अनैतिकता, बेईमानी, अनाचार, दुराचार, आलस्य, प्रमाद आदि अवगुण जीवन में दुःखों का पहाड़ खड़ा कर देते हैं, जिससे जीवन बोझ लगने लगता है, भार लगने लगता है।ऐसी गलत चीजें करने पर, बुरे कर्म करने पर हमें उनका बुरा परिणाम भुगतना पड़ता है। हम आत्मग्लानि, अवसाद, तनाव, कुंठा, चिंता, उद्विग्नता के शिकार होते हैं और अपने अनमोल जीवन को स्वयं ही दुःखों से भर लेते हैं।
हमारी कार्यक्षमता, उत्पादकता कम होने लगती है, जिससे हम किसी भी कार्य को सही ढंग से नहीं कर पाते। नैतिकता, ईमानदारी, जिम्मेदारी, समझदारी, बहादुरी, श्रमशीलता आदि का किसी मजहब, पंथ, संप्रदाय, मत से कोई लेना-देना नहीं। इन गुणों के कारण मनुष्य जीवन में सारी खुशियाँ प्राप्त कर सकता है। धन-वैभव, सुख- समृद्धि सब कुछ पा सकता है। धार्मिक होने का अर्थ है आकृति के साथ-साथ प्रकृति से भी मनुष्य होना, मनुष्योचित व्यवहार करना। धार्मिक होने का अर्थ है ईमानदार होना, समझदार होना, जिम्मेदार होना, बहादुर होना, श्रमशील होना, कर्मशील होना, कर्त्तव्यनिष्ठ होना और अपने कर्त्तव्य-पथ पर अडिग रहना।धर्म जीवन से पलायन का नाम नहीं है, बल्कि यह तो हमें जीवन से पलायन करने से रोकता है। अपने कर्त्तव्य-पथ पर अविचल चलते रहने का नाम ही धर्म है।
इसलिए धर्म का व्यापक अर्थ है कर्त्तव्य। एक माता-पिता, भाई-बहन के रूप में हमारा जो कर्त्तव्य है, उसे पूरा करना ही धर्म है।मनुष्य होने के नाते परिवार, समाज में मनुष्योचित व्यवहार करना यही हमारा धर्म है, यही हमारा कर्त्तव्य है। एक नागरिक होने के नाते अपने राष्ट्र की आन-बान-शान के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने के लिए सदैव तत्पर रहना यही धर्म है। दूसरों की सेवा, सहायता, परोपकार करना ही धर्म है।हम अपने मत, संप्रदाय के आधार पर जो भी धार्मिक क्रियाएँ करते हैं, उसका उद्देश्य हमारा इसी अर्थ में धार्मिक होना है। हाँ! यह समझना भी महत्त्वपूर्ण है कि सिर्फ कहने या चाहने मात्र से हम धार्मिक नहीं हो सकते, ईमानदार नहीं हो सकते, नैतिक नहीं हो सकते, परोपकारी नहीं हो सकते, जिम्मेदार नहीं हो सकते, बहादुर नहीं हो सकते ।
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