ध्यान, योग व आत्म-साक्षात्कार की रात
हिं दू धर्म में मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहारों में से एक है महाशिवरात्रि, जो भगवान शिव की आराधना और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने का विशेष अवसर है।
फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाने वाला यह एक महान आध्यात्मिक पर्व है। पुराणों में वर्णित है कि इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था, इसलिए इस दिन को भगवान शिव और देवी पार्वती के मिलन के रूप में भी मनाया जाता है। यह पर्व भगवान शिव की आराधना और उनकी दिव्य कृपा प्राप्त करने का विशेष अवसर प्रदान करता है। पंचांग के अनुसार, फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 26 फरवरी को होगी। महाशिवरात्रि का तात्पर्य ‘शिव की महान रात्रि’ से है और इस अवसर पर शिवलिंग की विशेष पूजा की जाती है। महाशिवरात्रि का महत्व धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप में अत्यधिक है।
भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में भक्त इस पर्व को बड़े श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाते हैं। शिवभक्त इस दिन उपवास रखते हैं, रात्रि जागरण करते हैं और भजन-कीर्तन द्वारा भगवान शिव की स्मृति करते हैं। महाशिवरात्रि का उल्लेख कई पुराणों में मिलता है। स्कंद पुराण, शिव पुराण और पद्म पुराण में इस पर्व का विशेष वर्णन किया गया है। शिव पुराण के अनुसार, इस दिन शिवलिंग की पूजा करने से समस्त दोष समाप्त होते हैं और साधक को भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। इस दिन व्रत् रखने बाने भक्तों को विशेष फल की प्राप्ति होती है और उनकी समस्त इच्छाएं पूर्ण होती हैं। कहा जाता है कि जो व्यक्ति महाशिवरात्रि के दिन पूरी रात जागरण करता है और भगवान शिव का ध्यान करता है, वह जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त हो जाता है।महाशिवरात्रि को आध्यात्मिक जागृति की रात भी माना जाता है। इस राप्त ध्याम और योग करने से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
यह रात ध्यान और चिंतन के लिए भी बहुत अच्छी है। शैव परंपरा में तो महाशिवरात्रि का विशेष महत्व है क्योंकि यह आत्म-साक्षात्कार और मोक्ष की ओर ले जाने वाला पर्व है। योग और ध्यान के मार्ग पर चलने वाले साधकों के लिए यह रात अत्यंत महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इसे आध्यात्मिक उन्नति के लिए सर्वोत्तम समय माना जाता है। कहा जाता है कि इस रात को भगवान शिव की आराधना करने से समस्त पापों का नाश होता है और व्यक्ति को आत्मज्ञान प्राप्त होता है। इस अवसर पर भारत के सभी शिव मंदिरों में भक्तों की अपार भीड़ उमड़ती है। काशी विश्वनाथ, महाकालेश्वर, सोमनाथ, केदारनाथ, ओंकारेश्वर, तिरुवन्नामलाई तथा अन्य प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंगों में इस दिनविशेष पूजा-अर्चना की जाती है। भारत में महाशिवरात्रि के अवसर पर अनेक स्थानों पर विशेष मेलों का भी आयोजन किया जाता है। उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर इस दिन भक्तों से खचाखच भरा रहता है और काशी में शिव भक्त गंगा स्नान कर बाबा विश्वनाथ के दर्शन हेतु उमड़ पड़ते हैं।
नेपाल में पशुपतिनाथ मंदिर में इस दिन विशेष अनुष्ठान होते हैं। दक्षिण भारत के कई मंदिरों में अभिषेक और रात्रि जागरण का आयोजन होता है। शिव अनादि हैं, शिव अविनाशी हैं और उनकी आराधना मोक्ष और परंम आनंद की ओर ले जाती है। शिव को ध्यान और योग का आदिगुरु माना जाता है। शिव का शांतस्वरूप हमें धैर्य और संतुलन की शिक्षा देता है जबकि उनके रुद्र रूप से हमें अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा मिलती है। शिव अर्धनारीश्वर के रूप में यह संदेश देते हैं कि खी और पुरुष समान है और दोनों का समभाव में रहना आवश्यक है। उनके गले में सर्प हमें यह सिखाते हैं कि भव से मुक्त होकर जीवन जीना चाहिए। शिव का त्रिनेत्र ज्ञान, कर्म और भक्ति का प्रतीक है और उनका डमरू सृष्टि की अनाहत ध्वनि का संकेत देता है। महाशिवरात्रि का संदेश केवल धार्मिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक और दार्शनिक भी है।
यह पर्व हमें सिखाता है कि हमें जीवन में कठिनाइयों से नहीं डरना चाहिए बल्कि शिव की तरह धैर्य और साहस के साथ उनका सामना करना चाहिए। शिव हमें यह भी सिखाते हैं कि अहंकार को त्यागकर विनम्रता को अपनाना चाहिए क्योंकि सच्ची शक्ति विनम्रता में ही निहित होती है। शिव अपने गणों और भक्तों को समान दृष्टि से देखते हैं, जिससे हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हमें भी सभी प्राणियों के प्रति समान दृष्टि रखनी चाहिए। महाशिवरात्रि हमें भक्ति, ध्यान और आत्म संयम का संदेश देती है। यह पर्व हमें शिव के अद्वितीय स्वरूप को समझने और उनके आदशों को अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा देता है। शिव हमें सिखाते है कि कि सादगी और सरलता ही जीवन का सार है और सच्ची भक्ति यही है जो अहंकार और आसक्ति से मुक्त हो। महाशिवरात्रि से संबंधित कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।
एक अन्य कथा के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंचन किया था, तब उसमें से अमृत के साथ विष (हलाहल) भी निकला था। उस विष से समस्त सुटि के विनाश का संकट उत्पन्न हो गया था। उस समय भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया था और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए। उस घटना की स्मृति में महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाने लगा। महाशिवरात्रि केवल शिव की आराधना का पर्व ही नहीं है बल्कि यह जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझने और आत्मचिंतन करते का भी अवसर है। भगवान शिव को ‘संहार का देवता कहा जाता है लेकिन उनका संहार विनाश नहीं बल्कि नवीनीकरण का प्रतीक है। शिव का तांडव नृत्य न केवल विनाश का बल्कि सूजन का भी द्योतक है। यह पर्व हमें जीवन में संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देता है और शिक्षा देता है कि नकारात्मकता से बाहर निकलकर सकारात्मकता की ओर बढ़ना ही सच्या शिवत्व है।
महाशिवरात्रि का महत्व केवल धार्मिक दृष्टिकोण से ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। माना जाता है कि इस दिन पृथ्वी की ऊर्जा विशेष रूप से शिव तत्व से प्रभावित होती है। वैज्ञानिक दृष्टि से देख जाए तो यह समय ब्रह्मांडीय ऊर्जा के प्रवाह का काल होता है, जब ध्यान और साधना के माध्यम से व्यकित अपने भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर सकता है। योगी और साधक इस अवसर का उपयोग आत्मचिंतन और आध्यात्मिक उन्नति के लिए करते हैं।इस रात ग्रहों की स्थिति ऐसी होती है, जो मानाव शरीर और मन पर सकारात्मक प्रभाव डालती है। रात्रि जागरण से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है और ध्यान तथा साधना से मानसिक शांति प्राप्त होती है। महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं बल्कि आत्मशुद्धि भक्ति और साधना का अद्भुत संगम है। यह पर्व हर भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का अवसर प्रदान करता है। शिव की आराधना से व्यक्ति न केवल सांसारिक जीवन में सुख प्राप्त करता है बीक आध्यात्मिक उन्नति भी करता है। इसलिए महाशिवरात्रि के दिव्य अवसर पर हम सभी की संकल लेना चाहिए कि हम अपने जीवन में सकारात्मकता क अपनाएंगे, आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होने और शिव के आदर्शों को आत्मसात करेंगे।




