हीरादास की हरि भक्ति
हीरादास जी वन में बगैर अन्न-जल के भक्ति में लीन थे। प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने एक बालक के रूप में उन्हें दर्शन दिए।

SCIENCE/विज्ञानं : हीरादास महाराज उच्च श्रेणी के महात्मा थे। हीरादास जी जब बालक थे, तभी उनके माता-पिता का देहांत हो गया था। इसलिए उनका पालन-पोषण दूसरे परिवार में हुआ था। उस परिवार में रहने के बदले में हीरादास जी को हर दिन ऊंट चराना पड़ता था। एक बार उस गांव में कबीरपंथी साधुओं की मंडली आई और उन्होंने देखा कि एक होनहार बालक ऊंट चरा रहा है। साधुओं की मंडली ने बालक हीरादास से पूछा, ‘क्या तुम पढ़ना चाहते हो? यदि चाहते हो, तो क्या हम लोगों के साथ चलोगे?’हीरादास जी शिक्षा ग्रहण करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने स्वीकृति दे दी और साधुओं के साथ चले गए।
साधुओं ने अपने मठ में हीरादास जी के लिए पढ़ने का प्रबंध कर दिया। हीरादास जी ने वहां धर्मशास्त्र और व्याकरण की शिक्षा प्राप्तअंतर्यात्रासंकलितकी। लेकिन जब हीरादास जी की उम्र पच्चीस वर्ष की हुई, तो वह वहां से सीधे वृंदावन चले गए। वृंदावन पहुंचते ही उनका परिचय बड़े महात्माओं से हो गया। हीरादास जी के सद्गुणों के कारण थोड़े ही दिनों में वहां उनकी प्रसिद्धि हो गई। कहते हैं कि हीरादास जी गोवर्धन पर्वत के समीप किसी वन में कई दिनों तक बगैर अन्न-जल के भगवान की भक्ति में लीन थे। हीरादास जी के संत जीवन और भक्ति से प्रसन्न होकर भक्त वत्सल भगवान श्रीकृष्ण ने एक सुंदर बालक के रूप में दर्शन देकर उन्हें खाने के लिए मिठाइयां दी थीं।
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