प्रभु खाने को देंगे तो खायेंगे
स्वामी शिवरामकिंकर ने चिकित्साशास्त्र का अध्ययन किया, किन्तु उन्होंने चिकित्सा को धन कमाने का साधन नहीं माना तथा सदाचारी जीवन में विश्वास किया।

स्वामी शिवरामकिंकर योगत्रयानंद जी चौदह-पंद्रह वर्ष की आयु में ही बंगला, अंग्रेजी तथा संस्कृत में पारंगत हो गए। वे वेद, वेदांत, ज्योतिष तथा पुराण आदि के विद्वान बन गए। इसके बाद उन्होंने कर्मयोग, भक्तियोग तथा ज्ञानयोग का एक साथ अभ्यास किया। स्वामी शिवरामकिंकर ने कोलकाता में चिकित्साशास्त्र का अध्ययन किया तथा अपनी प्रतिभा से आयुर्वेद विज्ञान के विद्वान बन गए। वे शास्त्रानुसार सदाचार का पालन करते थे तथा एक कमरे में बैठकर भगवान की भक्ति में लीन रहते थे। शाम को दो-चार सज्जन स्वामी जी के पास शास्त्र आदि सुनने तथा अपनी शंकाओं का समाधान करने आते थे।
उन्होंने स्वामी जी से कहा कि यदि आप चिकित्सा के माध्यम से धन कमाने लगते तो अच्छा होता। स्वामी जी ने कहा, ‘हमें भगवान की सेवा के अतिरिक्त कुछ नहीं करना है। भगवान हमें भोजन देंगे तो खाएंगे, अन्यथा उपवास करेंगे।’ एक दिन ऐसा हुआ कि उनके घर में खाने को कुछ नहीं था, परिवार के सभी सदस्य उपवास करने लगे। इसी बीच एक सज्जन जो स्वामी जी को अपना गुरु मानते थे, दौड़े-दौड़े आए और उनके चरणों में दो रुपए रखकर प्रणाम किया। पूछने पर उन्होंने कहा कि मैं काम कर रहा था, तभी मेरे कानों में आवाज आई कि जिसे आप अपना गुरु मानते हैं, वह आज अपने परिवार के साथ भूखा है। मुझे आश्चर्य हुआ कि यह मेरे गुरु की आवाज थी। स्वामी जी बोले, ‘ईश्वर हम सबके गुरु हैं।’




