वायुमंडल में बढ़ रही है कार्बन डाइऑक्साइडमात्रा

वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ती मात्रा अब खतरे की अंतिम सीमा को छू रही है। मई 2025 में इसका स्तर 430 पार्ट प्रति मिलियन (पीपीएम) को पार कर गया, जो अब तक का सबसे उच्चतम स्तर है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे न केवल धरती का तापमान बढ़ रहा है, बल्कि समुद्री जीवन से लेकर मौसमी बदलावों तक में व्यापक तबाही मची हुई है। मई 2025 के दौरान हवाई स्थित मौना लोआ वेधशाला में किए गए अवलोकनों में पाया गया कि वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का औसत स्तर 430.2 पीपीएम तक पहुंच गया है।
यह जानकारी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के स्क्रिप्स ओशनोग्राफी संस्थान और अमेरिका के राष्ट्रीय महासागरीय वायुमंडलीय संस्थान (NOAA) के वैज्ञानिकों ने दी है। मौना लोआ वेधशाला को वायुमंडल में मौजूद CO2 की निगरानी के लिए दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। संकट का मुख्य कारण मनुष्य ही है वैज्ञानिकों का कहना है कि इस संकट के लिए कोई और नहीं बल्कि स्वयं मानव समाज ही जिम्मेदार है। कोयला, डीजल, पेट्रोल जैसे जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग, तेजी से वनों की कटाई, बढ़ता औद्योगिक उत्पादन और अनियंत्रित परिवहन व्यवस्था ने धरती को इस स्थिति में पहुंचा दिया है।
एनओएए के अनुसार मई में यह औसत 430.5 पीपीएम दर्ज किया गया, जो मई 2024 से 3.6 पीपीएम अधिक है। (एनओएए) वैज्ञानिकों ने यह जानकारी दी है। मौना लोआ वेधशाला को वायुमंडल में मौजूद सीओ2 की निगरानी के लिए दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। संकट का मुख्य कारण मनुष्य ही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस संकट के लिए कोई और नहीं बल्कि मानव समाज ही जिम्मेदार है। कोयला, डीजल, पेट्रोल जैसे जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग, तेजी से वनों की कटाई, बढ़ता औद्योगिक उत्पादन और अनियंत्रित परिवहन व्यवस्था ने धरती को इस स्थिति में पहुंचा दिया है। एनओएए के अनुसार मई में यह औसत 430.5 पीपीएम दर्ज किया गया, जो मई 2024 से 3.6 पीपीएम अधिक है।
औद्योगिक युग से 50% की वृद्धि… पिछले 200 वर्षों के आंकड़ों पर गौर करें तो औद्योगिक युग की शुरुआत से लेकर अब तक वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड में 50% की वृद्धि हुई है। वर्तमान में मानवीय गतिविधियों के कारण हर साल करीब 4,000 करोड़ मीट्रिक टन CO2 वायुमंडल में उत्सर्जित हो रही है। प्राकृतिक आपदाएं इसका मुख्य कारण हैं। CO2 का परिणाम पृथ्वी की सतह के तापमान में वृद्धि के रूप में देखने को मिलता है। इसके कारण मौसम में असंतुलन, बारिश के पैटर्न में बदलाव, लू, सूखा, बाढ़ और जंगल में आग लगने की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं।
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