चैतन्य है हम या यह एक भ्रम मात्र है

मोटिवेशन: चेतनता या काँशसनेस एक ऐसी चुनौती कही जा सकती है, जिसका सम्यक समाधान वर्तमान वैज्ञानिक उपलब्धियों के परिक्षेत्र से बाहर का कहा जा सकता है। संभवतया यही कारण है कि वैज्ञानिकों ने इसे आज के समय की सबसे गंभीर वैज्ञानिक चुनौतियों में सम्मिलित किया है। उनके ऐसा कहने के पीछे का कारण भी स्पष्ट है।हमारे पैर में चोट लगती है तो पैर की चोट जो कि भौतिक घटनाक्रम है, एक चैतन्य घटनाक्रम को जन्म देता है, जिसमें हम उस चोट के दरद को महसूस कर पाते हैं और कई बार तो किसी भौतिक घटनाक्रम की भी आवश्यकता नहीं होती है और एक चैतन्य घटनाक्रम घटित हो जाता है। उदाहरण के तौर पर किसी को याद करके मन में जो भावनाएँ जन्म लेती हैं, उन्हें हम किस रूप में परिभाषित करें ?वैज्ञानिकों की दृष्टि में प्रश्न स्पष्ट है, पर उत्तर जटिल है। प्रश्न यह है कि इन घटनाक्रमों का आधार क्या होगा? हमारे भीतर चेतनता को जन्म देने का कार्य कौन करता है? 16वीं सदी में प्रसिद्ध वैज्ञानिक देकार्त ने ड्यूअलिज्म के सिद्धांत के माध्यम से यह कहने का प्रयत्न किया था कि इस संसार में माइंड स्टफ या मन से संबंधित चेतनात्मक ज्ञान और मैटर स्टफ या जड़ शरीर से संबंधित ज्ञान एक दूसरे से भिन्न हैं और इनमें कभी भी एकात्मता संभव नहीं है।एक समय बड़ा प्रभावी माना जाने वाला यह * सिद्धांत अब अधिकतर वैज्ञानिकों द्वारा ठुकरा दिया * गया है। \
आश्चर्य की बात यह है या यों कहें कि यह अवश्यंभावी ही था कि अब ज्यादातर वैज्ञानिक चेतनता के जिस सिद्धांत को मानते हैं- वह सिद्धांत वही है, जिसे वर्षों पहले भारत की भूमि पर आचार्य शंकर ने जन्म दिया था।विगत वर्षों में किए गए वैज्ञानिक शोध ऐसा मानते हैं कि जिसे हम संसार मानते हैं या संसार को अनुभव करने का जो हमारा भाव या चेतना है, वह मात्र एक भ्रम है, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। उदाहरण के तौर पर यह जानकर अनेकों को आश्चर्य होगा कि अनेक वस्तुओं का अपना कोई रंग नहीं और हमारा मस्तिष्क उनके सरलीकरण के लिए उनको एक तरह से कलर कोड कर देता है, ताकि बहुत-सी जानकारियों को साथ-साथ संगृहीत करने में सुविधा रहे।कुछ ऐसा ही वर्तमान समय में सर्वमान्य वैज्ञानिक अवधारणा कहती है। टफ्ट्स विश्वविद्यालय, अमेरिका के वैज्ञानिक डेनियल डेनेट कहते हैं कि जिसे हम चेतनता या अनुभव कहते हैं, वह वस्तुतः मन के द्वारा पैदा किया गया भ्रम मात्र है। भ्रमवाद या इल्यूजनिज्म के नाम से विख्यात यह वैज्ञानिक अवधारणा लगभग उसी चिंतन की पुष्टि करती है, जिसे वर्षों पहले आचार्य शंकर द्वारा ‘ब्रह्म सत्यं जगत् मिथ्या’ कहकर – परिभाषित किया गया था।ऐसा नहीं है कि इस निष्कर्ष पर वैज्ञानिक तुरंत पहुँच गए हों।
सन् 1998 में प्रसिद्ध वैज्ञानिकों में इस बात को लेकर एक शर्त लगी थी कि हमारे शरीर में चेतनता का जो केंद्र है, उसे वैज्ञानिक परीक्षणों से खोजा जा सकता है। क्रिस्टॉफ कॉक सहमत थे कि ऐसा संभव है; जबकि डेनियल चाल्टर्स ने कहा कि ऐसा हो पाना संभव नहीं।क्रिस्टॉफ के ऐसा मानने के पीछे एक कारण भी था। वो उस समय एलन इंस्टीट्यूट के निदेशक थे, जिसकी स्थापना उन्होंने DNA के खोजकर्त्ता फ्रांसिस क्रिक के साथ की थी। उनका ऐसा मानना था कि जिस तरह जीवन के आधार DNA को खोजा जा सका, वैसा ही चेतनता के साथ भी संभव है।* दुर्भाग्यवश ऐसा हो न सका। कभी वैज्ञानिक परीक्षणों में क्लॉस्ट्रम को चेतनता का केंद्र माना गया तो कभी थैलेमस को। सन् 2021 में न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में ओमरी राका द्वारा किए गए परीक्षण में पता चला कि प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स को काँशसनेस का रिले सेंटर कहा जा सकता है, पर समग्र अनुभव के लिए ये एकाकी रूप से जिम्मेदार नहीं है।यदि बाह्य जगत् के अनुभवों का संग्रहीकरण यहाँ हो भी रहा हो तब भी हमारी, हमारे प्रति जागरूकता (यह कि हम हैं) और हमारी जागरूकता के प्रति जागरूकता (यह कि हम यह अनुभव कर पा रहे हैं कि हम हैं)- इनका केंद्र ये नहीं है।
सारांश में यह कहा जा सकता है कि वर्तमान वैज्ञानिक परीक्षण ये सिद्ध करने में असमर्थ हैं कि हमारे अस्तित्व में काँशसनेस का भौतिक केंद्र कहाँ और क्या है ?इस क्षेत्र में और किए गए परीक्षणों ने यह स्पष्ट किया कि मस्तिष्क एक ग्लोबल वर्कप्लेस की तरह कार्य करता है, जहाँ पर बहुत सारे अनुभव तो अचेतन मन में ही एकत्रित होते हैं और कुछेक को हमारा मस्तिष्क एकरूपता प्रदान करने के लिए चेतन मन को उपलब्ध कराता है।इस सिद्धांत को इंटीग्रेटेड इंफोर्मेशन सिद्धांत कहकर पुकारा गया। इस सिद्धांत को चुनौती देने वाले वैज्ञानिकों में प्रिंसटन विश्वविद्यालय के माइकल ग्रेजिनो एवं ससेक्स विश्वविद्यालय के डॉ. अमित सेठ हैं, जिनका यह मानना है कि चेतनता एक परिष्कृत मानसिक प्रक्रिया है, परंतु तब भी यह एक भ्रम के अतिरिक्त कुछ और नहीं।हम चैतन्य हैं, इस बात का परिचय वैज्ञानिक दृष्टि से अनेकों माध्यम से मिलता है। उदाहरण के तौर पर, स्वयं को पहचानना, अपने मन एवं मानसिक क्रियाकलापों के प्रति जागरूकता, निर्णय क्षमता और गलत निर्णय लेने पर दुःखी अनुभव करना, तनाव को अनुभव करना, नींद एवं सपनों का आना इत्यादि ।
वैज्ञानिक दृष्टि से इन सारे अनुभवों का होना हमारे चेतन या काँशस होने का प्रमाण है। धीरे-धीरे अब सभी वैज्ञानिक शोध इस ओर -इशारा कर रहे हैं कि यह अनुभव एक भ्रम या – इल्यूजन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। भ्रम की – उत्पत्ति का कारण वैज्ञानिक क्रमिक विकासवाद या इवोल्यूशन को मानते हैं, परंतु भारतीय अवधारणा – इस दृष्टि से एकमत रही है कि संभवतया इस भ्रम – का कोई भी कारण नहीं।-यह भ्रम हमने मायारूपी आवरण के द्वारा स्वयं ही उत्पन्न किया है और अब उससे मुक्त होने का उपाय हम ढूँढ़ रहे हैं। वेदांत इसे मोक्ष या मुक्ति कहकर पुकारता है और संभव है कि अंततः समस्त वैज्ञानिक शोधें भी इसी एक स्थान पर या बिंदु पर आकर एकमत हो जाएँ। विगत दिनों के घटनाक्रम तो कुछ ऐसा ही परिलक्षित करते हैं।
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