भारत

देश में हर साल करीब 7.6% छात्र आत्महत्या करते रहे

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में छात्रों की आत्महत्याएँ चिंताजनक स्तर पर पहुँच गई हैं। देश में आत्महत्या करने वाले कुल लोगों में छात्रों की संख्या 7.6 प्रतिशत है। हाल ही में, ओडिशा के एक छात्र ने आत्महत्या कर ली थी। 2022 के आंकड़ों पर आधारित यह नई रिपोर्ट बताती है कि भारत में हर साल अनुमानित 13,000 छात्र आत्महत्या करते हैं। 2023 और 2024 में आत्महत्या के आधिकारिक आंकड़े अभी जारी नहीं किए गए हैं। शोध और सरकारी दस्तावेज़ बताते हैं कि छात्रों की आत्महत्या के पीछे मुख्य कारण शैक्षणिक और सामाजिक तनाव के साथ-साथ कॉलेजों या संस्थानों से मदद का अभाव और जागरूकता की कमी है। छात्रों की आत्महत्या के पीछे मुख्य कारण शैक्षणिक और सामाजिक तनाव के साथ-साथ कॉलेजों या संस्थानों से मदद का अभाव और जागरूकता की कमी है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति को आत्महत्या की महामारी बताया – भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस स्थिति को आत्महत्या की महामारी बताया। इसने मार्च में 10 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यबल का गठन किया। यह कार्यबल वर्तमान में कई जाँच, परामर्श और संस्थागत समीक्षाओं में लगा हुआ है। इसका उद्देश्य एक व्यापक नीतिगत ढाँचा तैयार करना है।

असफलता से सीखना सिखाया नहीं जाता- इस मुद्दे पर विस्तार से अध्ययन करने वाली न्यूरोसाइकियाट्रिस्ट अंजलि नागपाल ने डोडलू से कहा, “मैं इन आँकड़ों को महज़ आँकड़े नहीं मानती। बल्कि ये समाज की अपेक्षाओं और नियमों के तले दबी खामोश पीड़ा के संकेत हैं।” उन्होंने आगे कहा, “मैंने देखा है कि बच्चों को असफलता, निराशा या अनिश्चितता से निपटना नहीं सिखाया जाता। उन्हें जीवन भर के लिए नहीं, बल्कि बार-बार परीक्षा देने के लिए तैयार किया जाता है।” नागपाल ने कहा, “स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ नियमित रूप से प्रदान की जानी चाहिए, न कि सिर्फ़ कभी-कभार होने वाले सत्रों तक सीमित। इसे रोज़मर्रा की पढ़ाई में शामिल किया जाना चाहिए। बच्चों को एक ऐसे माहौल की ज़रूरत है जहाँ वे खुलकर अपनी बात कह सकें।”

मैंने देखा है कि बच्चों को असफलता, निराशा या अनिश्चितता से निपटना नहीं सिखाया जाता। उन्हें जीवन भर के लिए नहीं, बल्कि बार-बार होने वाले परीक्षाओं के लिए तैयार किया जाता है। नागपाल ने कहा कि स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ नियमित रूप से प्रदान की जानी चाहिए, न कि सिर्फ़ कभी-कभार होने वाले सत्रों तक सीमित। इसे रोज़मर्रा की पढ़ाई में शामिल किया जाना चाहिए। बच्चों को एक ऐसे माहौल की ज़रूरत है जहाँ वे खुलकर अपनी बात कह सकें।” असुरक्षित छात्रों के लिए ‘सुरक्षा कवच’ ज़रूरी

2019 में, भारत में कॉलेज के छात्रों में आत्महत्या के मामलों पर एक अध्ययन किया गया था। यह अध्ययन ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न विश्वविद्यालय, भारत के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान और कई भारतीय मेडिकल कॉलेजों द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था। इस अध्ययन का उद्देश्य यह पता लगाना था कि मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं ने छात्रों को किस हद तक प्रभावित किया है और उन्हें आत्महत्या जैसे खतरनाक कदम उठाने के लिए मजबूर कर रहा है। इस अध्ययन के लिए, भारत के नौ राज्यों के 30 विश्वविद्यालयों के 8,500 से अधिक छात्रों के बीच एक सर्वेक्षण किया गया था। इसमें पाया गया कि पिछले एक साल में 12 प्रतिशत से अधिक छात्रों के मन में आत्महत्या के विचार आए थे। 6.7 प्रतिशत ने अपने जीवन में कभी न कभी आत्महत्या का प्रयास किया था।

नए खबरों के लिए बने रहे सटीकता न्यूज के साथ।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
अडूसा: प्राकृतिक औषधि जो सर्दी, खांसी, घाव और दर्द में देती है राहत शादी में पुरुष क्या चाहते हैं? सुंदरता से ज़्यादा ये 5 गुण रिश्ते को बनाते हैं मज़बूत परीक्षा में सही टाइम मैनेजमेंट और स्मार्ट टाइम टेबल कैसे करे सर्दियों में इम्यूनिटी बढ़ाने का देसी तरीका, घर पर बनाएं सेहत से भरपूर कांजी स्वाद भी सेहत भी: बयु/बबुआ खाने के फायदे जानकर आप भी इसे डाइट में ज़रूर शामिल करेंगे गले की खराश से तुरंत राहत: अपनाएं ये असरदार घरेलू नुस्खे