प्रेरणा

अष्टादश विधाओं का उदभव है वेद

भारतीय ज्ञान-विज्ञान और संस्कृति की महत्ता एवं असीम व्यापकता की चर्चा पहले की गई है। यहाँ उसी क्रम के कुछ विशिष्ट पहलुओं का परिचय कराना आवश्यक हो जाता है। यह सर्वविदित है कि वेदमूर्ति के रूप में स्वयं परमपूज्य गुरुदेव का जीवन दर्शन हमारे समक्ष प्राचीन ऋषियों के सिद्धांतों व सनातन संस्कृति के आदर्शों का साक्षात् प्रकटीकरण है। उनके विचारों, अभियानों एवं क्रियाकलापों में कहीं भी वैदिक सिद्धांतों का अतिक्रमण नहीं हुआ है। भारतीय ज्ञानस्रोतों का केंद्र जिन अष्टादश विद्याओं को माना जाता है, उन सभी विद्याओं की मूलभूत विचारणाओं का समावेश उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व में दिखाई देता है। वैदिक साहित्य का भाष्य और युगानुरूप सरलतम व्याख्या उनके द्वारा लिखित अपरिमित साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण और विशिष्ट पक्ष है। वेद मानवीय ज्ञान-विज्ञान की सर्वोच्च धरोहर हैं तथा सर्वाधिक प्राचीन होने के साथ-साथ ये अद्यतन सर्वांगपूर्ण जीवन की पथ-प्रदर्शक ज्ञानराशि का अकूत भंडार भी हैं।

अतः वेद-ज्ञान की महत्ता और समयानुरूप सरलतम विवेचना के माध्यम से पूज्य गुरुदेव ने इसकी उपादेयता से जन-जन को जोड़े जा सकने का अद्वितीय पुरुषार्थ किया है। आज करोड़ों घरों एवं सार्वजनिक पुस्तकालयों व अध्ययन केंद्रों में गुरुदेव द्वारा लिखित आर्षग्रंथों के भाष्य की प्रतिष्ठापना व स्वाध्याय का क्रम प्रत्यक्ष देखा जा * सकता है। यहाँ पूज्यवर के वैदिक भाष्य ग्रंथों की चर्चा इसलिए भी आवश्यक है; क्योंकि वेद का ज्ञान – सूत्रात्मक, प्रतीकात्मक और गुह्य-रहस्यमय है तथा -उन पर किए गए भाष्यों, व्याख्याओं की सुदीर्घ – परंपरा में भी पर्याप्त भाषागत एवं भावगत दुरूहता – है। ऐसे में इस दिव्य ज्ञान का अवगाहन जनसाधारण के लिए सहज नहीं है।-अतः जनसामान्य के लिए सहजता और उपयुक्तता को ध्यान में रखकर ही गुरुदेव ने वेदों की सरलतम व्याख्या की है। वैदिक मंत्रों में समाहित ज्ञान-विज्ञान एवं विभिन्न उपयोगी जानकारी प्राप्त करने के लिए पूज्यवर के ग्रंथों की शरण लेना – सर्वोत्तम और सहज उपलब्ध उपाय है।—वेदों को भारतीय ज्ञान-परंपरा का प्रतिनिधित्व करने वाली अष्टादश विद्याओं में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त है।

भारतीय ज्ञान के उद्भव और विकास का मूल स्थान वेद ही हैं। वेद शब्द का अर्थ और स्वरूप अत्यंत व्यापक है। वेद अर्थात आत्मा के स्तर पर अनुभव किया जाने वाला अनुभूतिजन्य ज्ञान। यह व्यष्टि और समष्टि के रहस्य को अंतरात्मा के नेत्रों से देख सकने में समर्थ ऋषियों के विचारों का सार संग्रह है।नभारतीय संस्कृति की समस्त ज्ञान-धाराएँ और विद्याएँ बीज रूप में वेद की विचारणा में विद्यमान पं हैं। सुविधानुसार इस ज्ञानराशि को विषयानुरूप में संहिताओं के रूप में लिपिबद्ध किया गया है, जिन्हें हम ऋगू, यजु, साम और अथर्व के नाम से जानते हैं।श्रुति, निगम, आगम, छंदस, आम्नाय, स्वाध्याय आदि नामों से भी वेद-ज्ञान को प्रकट किया गया है। संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् ग्रंथों में संपूर्ण वैदिक साहित्य समाहित है। छह वेदांग, छह दर्शन, चार उपवेद-सभी इसी का विस्तार और व्याख्या-विवेचना हैं।ऋषियों की इस गुह्य ज्ञान-संपदा को विज्ञजनों ने तीन प्रमुख धाराओं में प्रवाहित किया है-कर्मकांड, ज्ञानकांड और उपासनाकांड परमपूज्य गुरुदेव के भाष्य में वैदिक साहित्य के ये तीनों आयाम सरलतम व्याख्या के साथ मौजूद हैं।

यह व्याख्या उक्त तीनों धाराओं को समान महत्त्व देते हुए समन्वय की दृष्टि उत्पन्न करती है; जबकि पूर्ववर्ती अनेक भाष्यकारों-व्याख्याकारों की दृष्टि में किसी एक धारा की प्रधानता देखी जा सकती है।वस्तुतः वेद जीवन व जगत् के समग्र, संपूर्ण और आध्यात्मिक ज्ञान का पर्याय हैं। कर्म, ज्ञान और भक्ति की समन्वयवादी दृष्टि को अपनाकर ही इसके महत्त्व और वैशिष्ठ्य को अधिक गहराई से आत्मसात् किया जा सकता है। समकालीन युग में वेदों के प्रति यह समन्वयवादी दृष्टिकोण महर्षि दयानंद के पश्चात परमपूज्य गुरुदेव के भाष्य में ही दिखाई देता है।वर्तमान समय में वैदिक ज्ञान-विज्ञान से परिचित नहीं होने के कारण ही भारतीय जीवन और समाज में अनेक विसंगतियाँ और मूल्यहीनता दिखाई देती हैं। जो संस्कृति सनातन-शाश्वत ज्ञान की धुरी पर पल्लवित-पुष्पित हुई और विश्वमानवता की प्रथ-प्रदर्शक बन विश्वगुरु का जिसने गौरव प्राप्त किया, वही संस्कृति आज अपनी ज्ञान-संपदा को सुरक्षित-संरक्षित रखने की चुनौतियों से जूझ रही है।

ऐसे में भारतीय संस्कृति के प्रति कृतज्ञता की भावना से ओत-प्रोत प्रत्येक जन का यह पावन कर्त्तव्य है कि वेदरूपी ज्ञान की अमूल्य ऋषि धरोहर को पुनः प्रतिष्ठित करने तथा इसके मर्म और महत्त्व से जन-जन को जोड़ने का कार्य युगधर्म समझकर संपन्न करे।जनसाधारण में यह भावना प्रगाढ़ है कि वेद, उपनिषद् आदि का संबंध मात्र धर्म-अध्यात्म के क्षेत्र से जुड़े लोगों से है न कि प्रत्येक व्यक्ति से। जबकि सच्चाई यह है कि यह ज्ञान समान रूप से संपूर्ण मानव जाति और उसके प्रत्येक वर्ग और स्तर के लिए उपयोगी है।जीवन के लौकिक और अलौकिक, दोनों पहलुओं की दृष्टि से इनमें अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रेरणाएँ और कल्याणकारी मार्गदर्शन मौजूद हैं। धार्मिक और आध्यात्मिक जीवन के साथ-साथ प्रत्येक व्यक्ति के एवं समाज के व्यावहारिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक पहलुओं के लिए भी वैदिक ज्ञान-संपदा का अत्यंत महत्त्व है।वस्तुतः मनुष्य जीवन के जितने भी आयाम हैं, उन सभी से वैदिक ज्ञान-विज्ञान का गहरा संबंध और महत्त्व है। मानव जीवन की नैतिकता और आचरण संबंधी कर्त्तव्य-बोध के लिए वेद ही सबसे प्रामाणिक स्रोत हैं।

इनमें करने योग्य कर्त्तव्यों को मानव धर्म से विभूषित कर धर्माचरण की विस्तृत व्याख्या मौजूद है।सऋषियों की यह आचरण संबंधी व्याख्या वर्तमान में चरित्रहीनता और मूल्यहीनता से त्रस्त समाज एवं विश्व के लिए अत्यंत उपादेयी है। उन्होंने मनुष्य जीवन के प्रत्येक कर्त्तव्य जैसे-पिता-पुत्र, माता-पिता, पति-पत्नी, गुरु-शिष्य, परिवार-समाज, व्यक्ति-राष्ट्र, राष्ट्रीयता, विश्व बंधुत्व, परोपकार, उद्योग, दान-धर्म, अतिथि-सत्कार, सेवा-सहायता आदि के संदर्भ में व्यक्ति का आचरण व धर्म क्या हो, इसका विस्तृत उपदेश दिया है। इसके साथ ही हमारी सनातन प्राचीन सभ्यता, संस्कृति और समाज के आदर्शस्वरूप का विस्तृत विवरण और सामाजिक व्यवस्था का मूल्य आधारित दिग्दर्शन भी इसमें मौजूद है।ऐतिहासिक एवं साहित्यिक महत्त्व की दृष्टि से भी वेद विश्व की सबसे प्राचीन लिखित धरोहर हैं। ऋग्वेद के सबसे प्राचीन ग्रंथ होने को विश्व के सभी विद्वानों ने स्वीकार किया है। वैदिक वाङ्मय को आधार बनाकर भाषा दर्शन और भाषा विज्ञान ने विकसित आकार प्राप्त किया है। प्राचीन सभ्यताओं, वंश, जातियों, गंगा आदि पवित्र नदियों, स्थानों के ऐतिहासिक एवं गौरवशाली साक्ष्य भी हमें वेद की ऋचाओं में ही प्रामाणिक रूप से प्राप्त होते हैं।वेदों के शास्त्रीय महत्त्व से तो सारे विश्व का विज्ञ समाज अभिभूत है।

इसका कारण यह है कि इनमें दार्शनिक सिद्धांत, अध्यात्म, मनोविज्ञान, आयुर्वेद, राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, गणित, रसायनशास्त्र, वनस्पतिशास्त्र, जंतुविज्ञान, भूगर्भविज्ञान, दृष्टिविज्ञान, अर्थशास्त्र, नाट्यशास्त्र, कामशास्त्र, प्रौद्योगिकी, भाषाविज्ञान और विभिन्न कलाओं से संबद्ध अनेक मंत्रों का साक्षात्कार होता है।सभी विद्याओं का स्रोत यहीं से प्रस्फुटित हुआ है। इसीलिए हमारे ऋषियों-मुनियों ने वेदों को ‘सर्वज्ञानमयो हि सः’ कहकर इनके अवगाहन और अनुशीलन की समृद्ध पद्धति का निर्माण किया तथा इसे पूर्ण दिव्यता के साथ जन-जन तक पहुँचाने की पवित्र परंपराओं की स्थापना की। प्राचीन गुरुकुलों, आरण्यकों, विश्वविद्यालयों आदि शिक्षण स्थलों के उद्भव, विकास और वैभव प्राप्ति के पीछे का मूल कारण वेदों में समाहित शास्त्रीय तत्त्वदर्शन ही रहा है।भारतीय समाज-व्यवस्था, न्याय व्यवस्था और राजनीतिशास्त्र के प्रारंभिक स्वर वेदों में ही गुंजायमान हुए हैं। राज्य सिद्धांत, राज्य व राजा के कर्त्तव्य, निर्वाचन, न्यायविधान, संचालन की नीतियाँ, दंड-प्रक्रिया, गुप्तचर एवं सैन्य-व्यवस्था, प्रजा के कर्त्तव्य, शासन की विभिन्न प्रणालियाँ जैसे अनेक राजनीतिशास्त्र से संबद्ध ज्ञान के स्रोत वैदिक साहित्य की महत्ता को बढ़ाते हैं।सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र की व्यवस्था के आदर्शवादी सूत्रों एवं सिद्धांतों के केंद्र भी वेदों में ही मौजूद हैं।

कृषि, व्यापार, वाणिज्य, नाप-तोल, मुद्राएँ, शिल्प, आभूषण आदि के संबंध में अनेक मंत्रों में वर्णन है।धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्त्व – की दृष्टि से तो वेदों का स्थान सर्वोपरि है। यह सनातन धर्म-संस्कृति की आधारशिला है। धर्म, योग और अध्यात्म तत्त्व के ज्ञान का एकमात्र प्रामाणित स्स्रोत वेद ही हैं। हिंदू धर्म के मूल तत्त्वों, सिद्धांतों व स्वरूप का उद्गमस्थल भी वेद ही हैं-‘वेदोऽखिलो धर्ममूलम्।’आधुनिक विज्ञान व वैज्ञानिक प्रणालियों की – दृष्टि से भी वैदिक ज्ञान-विज्ञान का अत्यंत महत्त्व – है। भौतिकी, रसायन, चिकित्सा, गणित, जंतुविज्ञान, – ब्रह्मांड विज्ञान जैसे विज्ञान के सभी प्रमुख क्षेत्रों के गुह्य एवं मार्मिक सूत्र व सिद्धांत के अन्वेषण एवं प्रकाशन से समूचा विश्वसमुदाय समय-समय पर विस्मित, चमत्कृत हो ऋषि प्रज्ञा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता आया है। सच्चे अर्थों में संपूर्ण मानव जाति को वैदिक ज्ञान के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए; क्योंकि ये ही एकमात्र ऐसे शास्त्र हैं, जिनका उद्देश्य विश्व-वसुधा का परम कल्याण और अखिल विश्व में मौजूद मानव जाति के सांसारिक व आध्यात्मिक जीवन के चरम विकास का उपदेश बिना किसी भेदभाव के देना है।यह ज्ञान आदिकाल से अद्यतन मानव मात्र की अंतः-बाह्य सभी चुनौतियों का समाधान करने में सक्षम रहा है और सतत एक आदर्श जीवन की प्रेरणा, प्रकाश और पथ-प्रदर्शक बन हमारे बीच विद्यमान है।

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