फेफड़ों का कैंसर केवल धूम्रपान करने वालों को ही नहीं होता, बल्कि धूम्रपान न करने वालों को भी फेफड़ों के कैंसर का खतरा होता है — और इसके कई छिपे हुए कारण हो सकते हैं, जो आमतौर पर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। यहाँ मुख्य छिपे हुए कारण दिए गए हैं जो भारत में विशेष रूप से प्रासंगिक हैं:

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वायु प्रदूषण (Air Pollution) भारत के कई शहरों में वायु गुणवत्ता अत्यंत खराब होती है।  –  – PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कण फेफड़ों में प्रवेश कर जाते हैं। – WHO के अनुसार, वायु प्रदूषण फेफड़ों के कैंसर का एक बड़ा कारण है।

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ग्रामीण भारत में लकड़ी, गोबर, कोयला आदि से खाना पकाया जाता है। – इससे निकलने वाला धुआं प्रकार 1 कार्सिनोजेन (कैंसरकारी) माना गया है। – विशेषकर महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ता है।

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रैडॉन गैस (Radon Exposure) यह एक प्राकृतिक रेडियोधर्मी गैस है जो चट्टानों और मिट्टी से निकलती है। – भारत के कुछ क्षेत्रों (जैसे हिमालयी क्षेत्र) में इसका स्तर अधिक हो सकता है। – घरों के बेसमेंट या बिना वेंटिलेशन वाले कमरों में इसके कण जमा हो सकते हैं।– अगर व्यक्ति खुद धूम्रपान नहीं करता, लेकिन उसके आसपास धूम्रपान करने वाले लोग हैं, तो वह "पैसिव स्मोकर" कहलाता है। – इस प्रकार के धुएं में सैकड़ों हानिकारक रसायन होते हैं, जो कैंसर की संभावना बढ़ाते हैं।

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पैसिव स्मोकिंग (Second-hand Smoke) स्वयं धूम्रपान न करने पर भी अगर कोई व्यक्ति – लगातार किसी धूम्रपान करने वाले के पास रहता है, – या कार्यस्थल/घर में सिगरेट का धुआं मौजूद रहता है, तो पैसिव स्मोकिंग से भी कैंसर का खतरा उतना ही हो सकता है।

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अनुवांशिक कारण (Genetic Mutations) कुछ लोगों में विशेष जीन म्यूटेशन होते हैं, जैसे: – EGFR mutation, जो विशेष रूप से एशियाई महिलाओं में पाया गया है। – यह फेफड़ों के कैंसर का कारण बन सकता है, भले ही वे कभी धूम्रपान न करें।– कुछ लोगों के जीन में पहले से ही ऐसी गड़बड़ियां होती हैं जो उन्हें कैंसर के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती हैं, भले ही वे धूम्रपान न करें। – यदि परिवार में किसी को फेफड़ों का कैंसर हुआ है, तो जोखिम बढ़ जाता है।

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एस्बेस्टस और औद्योगिक रसायन (Occupational Exposure) कुछ उद्योगों में काम करने वाले लोग जैसे: – निर्माण कार्य, शिपयार्ड, माइनिंग आदि, – जहां एस्बेस्टस, आर्सेनिक, डीजल धुएं आदि का संपर्क होता है। यह लंबे समय में फेफड़ों के कैंसर का कारण बन सकता है।– कारखानों, खदानों, रसायनशालाओं में काम करने वाले लोग बेंजीन, सिलिका, डीज़ल एग्जॉस्ट जैसी हानिकारक गैसों और कणों के संपर्क में रहते हैं। – ये सभी पदार्थ फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकते हैं और कैंसर का कारण बन सकते हैं।

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वायरल संक्रमण और फेफड़ों की पुरानी बीमारीह्यूमन पैपिलोमा वायरस (HPV) या – टीबी (Tuberculosis) जैसी पुरानी फेफड़ों की बीमारियाँ भी फेफड़ों की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाकर कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकती हैं।

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धूम्रपान न करने वालों में भी फेफड़ों का कैंसर पर्यावरण, वंशानुगत और व्यावसायिक जोखिमों से हो सकता है। इससे बचने के लिए जरूरी है: – साफ हवा में रहना, – रसोई में उचित वेंटिलेशन, – नियमित स्वास्थ्य जांच, – और जोखिम क्षेत्रों में सुरक्षा उपकरणों का प्रयोग।

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